उस आम के पेड़ पर उस बरस बहुत आम आए थे और ज़्यादातर हरे थे। एक पका हुआ था। सिर्फ़ एक। वह सबसे ऊपर वाली डाल पर था, पूरब की तरफ़, और उसका आधा हिस्सा पीला हो चुका था और उस पर एक लाल छींटा था।

सबीहा उसे तीन दिन से देख रही थी।

आम के पेड़ पर पका हुआ फल दूर से भी दिख जाता है, क्योंकि हरे पत्तों के बीच पीला रंग अलग पड़ता है। उस पेड़ के नीचे से गाँव का रास्ता जाता था और सबीहा के अलावा भी कई लोगों ने उसे देखा हुआ था। पेड़ किसी का नहीं था, यानी वह गाँव की परती ज़मीन पर था, और उस पर पहला हक़ उसी का होता है जो पहले तोड़ ले।

पहले दिन वह हल्का पीला था। दूसरे दिन ज़्यादा। तीसरे दिन वह उस हालत में था जिसमें आम या तो तोड़ लिया जाता है या अपने आप गिरकर फट जाता है। पहली कोशिश उसने पत्थर से की। यह सबसे पहला तरीक़ा है जो हर बच्चे को सूझता है और वह सबसे कम काम करता है।

उसने चार पत्थर मारे। पहला डाल से नीचे से निकल गया। दूसरा पत्तों में जाकर रुक गया। तीसरा डाल पर लगा और आम हिला और गिरा नहीं। चौथा पत्थर पड़ोस के छप्पर पर गिरा और वहाँ से एक आवाज़ आई, जिसके बाद सबीहा ने पत्थर मारना बंद कर दिया।

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पत्थर से आम गिराने में एक और दिक़्क़त है जो बच्चों को देर से समझ आती है। मान लो पत्थर लग भी जाए, तो आम ऊपर से नीचे तक गिरता है और ज़मीन पर आकर फट जाता है। पका हुआ आम उस गिरावट को नहीं सँभालता। सबीहा को यह मालूम था और इसीलिए उसने पहले तीन पत्थर डंठल की तरफ़ मारे थे, न कि आम पर।

दूसरी कोशिश उसने चढ़कर की।

आम का पेड़ चढ़ने के लिए अच्छा होता है क्योंकि उसकी डालें नीचे से ही फैलनी शुरू हो जाती हैं। वह तीसरी डाल तक आसानी से पहुँच गई। चौथी डाल पतली थी।

उसने उस पर पैर रखकर देखा और वह झुक गई। यह वह झुकना नहीं था जो डाल के मज़बूत होने पर होता है। यह वह झुकना था जिसके बाद चटकने की आवाज़ आती है। उसने पैर हटा लिया और वह नीचे उतर आई।

उतरना चढ़ने से मुश्किल होता है, क्योंकि नीचे देखना पड़ता है और पैर के लिए जगह टटोलनी पड़ती है। वह तीसरी डाल पर बैठ गई और उसने वहीं से नीचे देखा और अपना अगला क़दम तय किया, और उसमें उसे कुछ मिनट लगे।

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यह उसने डरकर नहीं किया। वह पहले भी एक बार गिर चुकी थी, दो बरस पहले, और उसे यह याद था कि नीचे क्या था और गिरने में कितना वक़्त लगा था।

तीसरी कोशिश में उसने बाँस लिया।

घर के पीछे कपड़े सुखाने वाला बाँस था और वह लंबा था, पर आम तक पहुँचकर भी उससे कुछ नहीं होता, क्योंकि सीधे बाँस से आम गिरता नहीं, वह बस हिलता है। आम तोड़ने का जो असली औज़ार होता है उसे लग्गी कहते हैं।

उसमें बाँस के सिरे पर एक टेढ़ी शाखा बाँधी जाती है, हुक की तरह, और उसके नीचे कपड़े की एक थैली लगाई जाती है। हुक डंठल पकड़ता है, आम टूटता है, और वह नीचे थैली में गिर जाता है। सबीहा ने यह देखा हुआ था। बग़ीचे वाले इसी से तोड़ते हैं।

उसने बनाई।

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टेढ़ी शाखा उसे अमरूद के पेड़ से मिली, जो सूखी पड़ी थी। उसने उसे बाँस के सिरे पर सुतली से बाँधा, दो जगह से, और उसका काँटा बाहर की तरफ़ रखा।

सूखी शाखा इसलिए ठीक थी कि वह मुड़ती नहीं। हरी शाखा दबाव पड़ने पर सीधी हो जाती है और हुक का काम नहीं करती। यह उसने पहली बार में नहीं सोचा था। उसने पहले एक हरी टहनी बाँधी थी और वह डंठल पर लगते ही खुल गई थी।

थैली के लिए उसने अपना पुराना दुपट्टा लिया और उसे नीचे बाँध दिया। पहली बार में हुक डंठल तक नहीं पहुँचा। बाँस भारी हो गया था और उसे सीधा रखना मुश्किल था।

लग्गी का असली हुनर यही है। बाँस जितना लंबा हो, उसका सिरा उतना ही हिलता है, और ऊपर एक इंच का निशाना लगाने के लिए नीचे हाथ को बिलकुल स्थिर रखना पड़ता है। बग़ीचे वाले इसे बरसों में सीखते हैं और वे बाँस को हाथ से नहीं, कंधे और कमर से सँभालते हैं।

उसने बाँस का निचला सिरा ज़मीन पर टिकाया और उसे कंधे से सहारा देकर उठाया, जिससे उसका वज़न हाथ पर कम आया। दूसरी बार हुक डंठल पर लगा। ठीक बैठ गया। उसने घुमाया। हल्के से। डंठल मुड़ा और आम टूट गया।

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वह नीचे आया, थैली से टकराया, और उसी में रुक गया। सबीहा ने बाँस नीचे किया और आम निकाला। वह उसके हाथ में गरम था। तीन दिन की धूप उसमें भरी हुई थी। उसने उसे वहीं खा लिया, खड़े-खड़े, और उसका रस उसकी कलाई तक बहा।

बाक़ी आम उस पेड़ पर हरे ही रहे और अगले दस दिन में एक-एक करके पके। सबीहा ने उन सबको उसी लग्गी से तोड़ा। लग्गी उसने खोली नहीं। वह घर के पीछे दीवार से टिकी रही, दुपट्टे वाली थैली समेत, और अगली गर्मी में भी वहीं थी।