चप्पल नीली थी और वह हरखा को छह महीने पहले मिली थी।
वह उसकी अपनी नहीं थी, यानी नई ख़रीदी हुई नहीं थी। वह उसके बड़े भाई की थी और भाई का पैर बड़ा हो जाने पर उसे मिली थी। इसी वजह से वह उसके पैर से थोड़ी बड़ी थी और चलते वक़्त एड़ी के पास से हवा भरती थी, जिसकी उसे आदत पड़ चुकी थी।
उस सुबह उसने पैर डाला, ज़ोर लगाया, और अँगूठे वाला फ़ीता ऊपर निकल आया।
रबर की चप्पल इसी तरह टूटती है। फ़ीते के नीचे एक गोल गुल्ली होती है जो चप्पल के छेद में फँसी रहती है, और वह छेद बड़ा हो जाए तो गुल्ली निकल जाती है। स्कूल जाने में बीस मिनट थे। रास्ता डेढ़ किलोमीटर था और उसमें आधा कच्चा था, जिस पर बबूल के काँटे पड़े रहते थे।
दूसरी चप्पल घर में नहीं थी।
यह पूरा सच नहीं था। उसकी माँ की चप्पल थी, पर वह बहुत बड़ी थी और उसमें डेढ़ किलोमीटर चलना मुमकिन नहीं था। उसके पिता की भी थी और वह घर में नहीं थी क्योंकि वे उसे पहनकर काम पर जा चुके थे। नंगे पैर जाने का रास्ता खुला था और उस रास्ते के आधे हिस्से पर बबूल के काँटे बिछे रहते थे, जो सूखकर सफ़ेद हो जाते हैं और मिट्टी में दिखते नहीं।
पहली कोशिश उसने सेफ़्टी पिन से की। उसकी माँ के पास सेफ़्टी पिन थी। उसने फ़ीते को नीचे से छेद में डाला और उसके नीचे पिन आर-पार लगा दी, जिससे वह ऊपर न निकल सके।
यह चार क़दम चला।
पाँचवें क़दम पर पिन का सिरा उसके तलवे में चुभा और वह रुक गया। पिन गोल नहीं होती और वह चप्पल के नीचे सपाट नहीं बैठती।
उसने पिन को उलटकर लगाने की कोशिश की, यानी उसका सिरा ऊपर की तरफ़ करके, और तब वह फ़ीते में चुभने लगा। दोनों तरफ़ से यही दिक़्क़त थी। पिन जिस भी तरफ़ रहती, वह किसी न किसी चीज़ में गड़ती थी, क्योंकि उसका काम ही गड़ना है।
उसने पिन निकाल दी। दूसरी कोशिश उसने तार से की। घर के पीछे बिजली का पुराना तार पड़ा था, पतला, जिसका प्लास्टिक हट चुका था। उसने उसका एक टुकड़ा काटा, उसे फ़ीते के नीचे लपेटा, और उसके दोनों सिरे मोड़ दिए।
यह पिन से बेहतर था और यह पंद्रह क़दम चला। फिर तार का एक सिरा खुल गया और उसने तलवे को खरोंच दिया, जो चुभने से कम बुरा था और चलने के लिए फिर भी काफ़ी बुरा था।
अब उसके पास दस मिनट थे।
इतने में वह भागकर मोची तक जा सकता था, जो चौराहे पर बैठता था। पर मोची सुबह नौ बजे से पहले नहीं बैठता और उस वक़्त सात बजकर चालीस मिनट थे। यह उसने सोचा और छोड़ दिया। उसने चप्पल हाथ में ली और उसे उलटकर देखा।
दिक़्क़त साफ़ थी। छेद बड़ा हो गया था और गुल्ली उसमें से निकल जाती थी। छेद छोटा नहीं किया जा सकता था। पर गुल्ली बड़ी की जा सकती थी। यह उसे तब सूझा जब उसकी नज़र कोने में पड़ी उस पुरानी टूटी चप्पल पर गई, जो महीनों से वहीं पड़ी थी और जिसे कोई फेंकता नहीं था।
उसने चाकू से उसमें से एक छोटा गोल टुकड़ा काटा, सिक्के के बराबर।
गोल काटना ज़रूरी था और यह उसने सोचकर किया। चौकोर टुकड़ा चप्पल के तलवे में सपाट नहीं बैठता, उसके कोने ऊपर उठ जाते हैं और वे चलते वक़्त महसूस होते हैं। पुरानी चप्पल का रबर नई से सख़्त था, क्योंकि वह धूप में बरसों पड़ा रह चुका था, और यही उसके काम आया।
वह मोटा था और रबर का था। उसने फ़ीता नीचे से छेद में डाला, उसके नीचे वह गोल टुकड़ा फँसाया, और फिर फ़ीते को ऊपर से खींचा। गुल्ली और वह टुकड़ा, दोनों मिलकर छेद से बड़े हो गए। फ़ीता कस गया।
उसने पैर डालकर देखा। नीचे कुछ चुभा नहीं, क्योंकि रबर सपाट था और वह चप्पल के तलवे में ही धँस गया। उसने चलकर देखा। दस क़दम, फिर बीस। वह चलती रही। वह स्कूल पहुँचा और उस दिन उसे देर नहीं हुई।
रास्ते में उसने दो बार रुककर देखा कि फ़ीता अपनी जगह है या नहीं। दोनों बार वह वहीं था। तीसरी बार उसने देखा नहीं, और उसके बाद उसने उस चप्पल की तरफ़ ध्यान देना बंद कर दिया, जो किसी भी मरम्मत के ठीक होने की सबसे पक्की निशानी है।
वह जोड़ चार महीने चला।
इन चार महीनों में उसने वह चप्पल हर रोज़ पहनी और उस जोड़ को कभी दोबारा नहीं देखा, क्योंकि उसे देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। दो बार बरसात में वह कीचड़ में धँसी और दोनों बार निकल आई, जो पहले वाली हालत में मुमकिन नहीं था।
जब चप्पल आख़िर में टूटी तो वह उस जगह से नहीं टूटी। वह बीच से फटी, जैसे पुरानी चप्पलें फटती हैं।
उस दिन हरखा ने उसमें से भी एक गोल टुकड़ा काटकर रख लिया, इस्तेमाल के लिए नहीं, बस रख लिया, और वह उसके स्कूल वाले थैले की जेब में काफ़ी दिनों तक पड़ा रहा।