चिरौंजी के पास सत्रह कंचे थे। सोलह साधारण थे। एक नीला था।

नीला वाला बाक़ी सबसे बड़ा था और उसके भीतर काँच के अंदर एक टेढ़ी सी नीली लकीर थी, जो रोशनी के सामने घुमाने पर अपनी शक्ल बदलती हुई लगती थी। वह उसे अपनी जेब में रखती थी, अलग, बाक़ी सबसे अलग।

उस दिन वह गली में खेल रही थी।

गली में उस दिन चार बच्चे थे और खेल वही पुराना था जिसमें ज़मीन पर एक गड्ढा खोदा जाता है और उसमें कंचा डालना होता है। सुबह पानी बरसा था, इसलिए मिट्टी नरम थी और गड्ढा आसानी से बन गया था। चिरौंजी का नंबर तीसरा था और उसे तीन बार में दो बार गड्ढे में डालना था।

उसने अंगूठे पर कंचा टिकाया और निशाना लगाया, और ठीक उसी वक़्त उसका हाथ गीली मिट्टी पर फिसल गया। नीला कंचा उछला, दो बार लुढ़का, और नाली में गिर गया।

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नाली पक्की थी और इतनी सँकरी थी कि उसमें हाथ सीधा नीचे ही जा सकता था, टेढ़ा नहीं। उसमें पानी बह रहा था, थोड़ा सा, और तली में काली गाद जमी थी। चिरौंजी नीचे बैठ गई और उसने झाँका। नीला दिख रहा था। वह गाद में आधा धँसा था और उस पर पानी बह रहा था। हाथ नहीं पहुँचता था। नाली गहरी थी और उसका मुँह छोटा था।

नाली में जो पानी बहता है वह साफ़ नहीं होता, पर बरसात के बाद वह पतला हो जाता है और उसके नीचे की चीज़ें दिखने लगती हैं। नीला कंचा उसी में पड़ा था, आधा गाद में, और उस पर पानी की एक पतली परत बह रही थी जिससे वह हिलता हुआ दिखता था, हालाँकि वह हिल नहीं रहा था।

पहली कोशिश उसने तार से की।

उसे पीछे वाले घर की दीवार के पास एक तार पड़ा मिला। उसने उसका सिरा मोड़कर हुक बनाया और उसे नीचे उतारा। हुक गोली तक पहुँचा। उसने खींचा। गोली फिसल गई और थोड़ी और आगे चली गई। उसने चार बार कोशिश की। हर बार वही हुआ। कंचा गोल होता है और हुक उस पर टिकता नहीं।

चौथी बार में तार का सिरा गाद में फँस गया और उसे खींचने में सीधा हो गया, और उसके बाद वह हुक की तरह काम का नहीं रहा। चिरौंजी ने उसे दोबारा मोड़ने की कोशिश की, पर तार पतला था और एक ही जगह से दो बार मुड़ने पर वह वहीं से टूट गया।

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दूसरी कोशिश उसने च्युइंगम से की।

यह उसकी अपनी सोच थी। उसके पास एक च्युइंगम थी, जो सुबह की चबाई हुई थी और जिसे उसने खिड़की की चौखट पर चिपका रखा था। उसने उसे तीली के सिरे पर लगाया और नीचे उतारा। च्युइंगम गोली से चिपकी। उसने ऊपर खींचा। गोली दो इंच ऊपर आई और छूट गई।

उसने दोबारा किया। इस बार पानी ने च्युइंगम धो दी और वह सख़्त हो गई। दोपहर हो चुकी थी, धूप सिर पर आ गई थी, और गली के बाक़ी बच्चे खाना खाने अपने-अपने घर जा चुके थे। उसकी माँ ने उसे दो बार पुकारा और दोनों बार उसने कहा कि आ रही हूँ।

तीसरी कोशिश से पहले वह कुछ देर बैठी रही और उसने सोचा।

उसे यह समझ आ गया था कि दिक़्क़त क्या है। जो चीज़ चिपकती है वह पानी में धुल जाती है। जो चीज़ पकड़ती है वह गोल चीज़ पर फिसलती है। उसे चाहिए था कुछ ऐसा जो गीला भी हो और चिपके भी।

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गली के मोड़ पर एक जगह मिट्टी खोदी हुई पड़ी थी, जहाँ पाइप डालने के लिए गड्ढा खोदा गया था। वहाँ की मिट्टी चिकनी थी। पीली, गीली, और हाथ में लेने पर वह हाथ में रह जाती थी। चिरौंजी ने उसका एक लोंदा उठाया।

उसने उसे तीली के सिरे पर लपेटा, ख़ूब मोटा, और फिर उसे नीचे उतारा। उसने तीली को सीधा नीचे दबाया, गोली के ऊपर, और थोड़ा घुमाया। मिट्टी ने गोली को चारों तरफ़ से पकड़ लिया। वह धीरे-धीरे ऊपर आई। तीली, फिर मिट्टी का लोंदा, और उसके भीतर कहीं नीला।

चिरौंजी ने उसे हाथ में लिया और मिट्टी हटाई। गोली काली हो चुकी थी। उसने उसे नल के नीचे रखा और रगड़ा। नीला वापस आ गया और भीतर वाली टेढ़ी लकीर भी। वह भागकर घर गई और खाना खाया, और खाते वक़्त उसकी माँ ने पूछा कि इतनी देर क्या कर रही थी।

उसके नाख़ूनों में पीली मिट्टी भरी हुई थी और उसे निकालने में उसे खाने के बाद काफ़ी देर लगी। उसकी फ़्रॉक के घुटने वाले हिस्से पर भी वही मिट्टी लगी थी, दोनों तरफ़, क्योंकि वह तीन घंटे उसी तरह बैठी रही थी।

उसने कहा कि कुछ नहीं।

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उस दिन के बाद वह नीली गोली से खेलती नहीं थी। वह उसे साथ ले जाती थी और जेब में रखती थी, और खेलने के लिए बाक़ी सोलह ही निकालती थी। तीली उसने फेंकी नहीं। उसका एक सिरा अब भी पीला है, क्योंकि चिकनी मिट्टी सूखने के बाद आसानी से नहीं छूटती।