पतंग हरी थी और उसकी पूँछ पीली थी।
वह काग़ज़ की थी और उसकी तीलियाँ पतली थीं, इसलिए वह हल्की थी। दुकान पर ऐसी पतंगें ढेर में रखी रहती हैं और उनमें से अच्छी चुनने का एक तरीक़ा होता है, यानी उसे उँगली पर बीच से टिकाकर देखना कि वह दोनों तरफ़ बराबर झुकती है या नहीं। दत्तू ने यही किया था और इसीलिए वह उसकी सबसे अच्छी पतंग थी।
दत्तू ने उसे तीन दिन पहले ख़रीदा था और वह उसकी सबसे अच्छी पतंग थी, क्योंकि वह हल्की हवा में भी उठ जाती थी। उस शाम हवा बदल गई। पतंग नीचे आई, एक तरफ़ को झुकी, और सीधे बिजली के तार पर जा गिरी।
वह वहीं अटक गई और हवा में हिलती रही। पूँछ तार पर लिपट गई और डोर नीचे लटक गई। दत्तू दस बरस का था और उसे यह अच्छी तरह मालूम था कि तार को छूना नहीं है।
यह उसे उसके बाबा ने बताया था और स्कूल में भी बताया गया था और मोहल्ले में एक आदमी के साथ यह हो चुका था, बहुत पहले, और उसकी बात अब भी होती थी। इसलिए उसने सबसे पहले जो किया वह यह था कि उसने लटकी हुई डोर नहीं पकड़ी।
उसने अपने छोटे भाई को भी रोक दिया, जो उसे पकड़ने ही वाला था। फिर दोनों नीचे खड़े होकर ऊपर देखते रहे।
तार वहाँ तीन थे और वे मोहल्ले की गली के ऊपर से गुज़रते थे, खंभे से खंभे तक। शाम के उस वक़्त उन पर धूप पड़ रही थी और वे चमक रहे थे। पतंग बीच वाले तार पर थी और उसकी पूँछ नीचे लटककर सबसे नीचे वाले तार को छू रही थी।
पहली कोशिश उसने बाँस से की। पड़ोस में एक लंबा बाँस पड़ा था, जो छत पर कपड़े सुखाने के काम आता था। उसने उसे उठाया और खड़ा किया। फिर उसने उसे नीचे रख दिया।
बाँस लंबा था और तार तक पहुँचता था, और यही दिक़्क़त थी। बाँस गीला था, क्योंकि उस पर सुबह के धुले कपड़े टँगे थे, और गीले बाँस के बारे में उसे मालूम था।
दूसरी कोशिश उसने कूदकर की।
डोर का सिरा ज़मीन से लगभग सात फ़ुट ऊपर लटक रहा था। उसने सोचा कि अगर वह डोर पकड़कर खींच ले तो पतंग छूट जाएगी। फिर उसे याद आया कि डोर मंझे की है और मंझे में काँच होता है और वह चिपका रहता है, और वह तार से भी छू रही है।
उसने यह भी छोड़ दिया।
यह सोचना उसे मुश्किल नहीं लगा। यह सब उसे मालूम था। मुश्किल यह थी कि पतंग वहीं थी और शाम ढल रही थी।
तीसरी कोशिश में उसने पत्थर बाँधा।
पत्थर उसने ऐसा चुना जो न बहुत भारी हो और न बहुत हल्का। भारी पत्थर धागा तोड़ देता और हल्का ऊपर तक नहीं जाता। उसने आँगन से एक कंकड़ उठाया जो अखरोट के बराबर था और उसे धागे में दो बार लपेटकर गाँठ लगाई, ताकि फेंकते वक़्त वह निकल न जाए।
यह उसकी अपनी सोच थी। उसने घर से सूती धागे का गोला लिया, जो उसकी माँ के पास सिलाई का था और जो सूखा था। उसने उसके सिरे पर एक छोटा पत्थर बाँधा। फिर उसने निशाना लगाया, तार पर नहीं, पतंग की पूँछ के ऊपर वाली ख़ाली जगह पर।
पहली बार पत्थर बहुत नीचे गया और धागा बीच रास्ते में ही लौट आया।
दूसरी बार वह पतंग के पार चला गया और धागा तार से छू गया, और दत्तू ने तुरंत धागा छोड़ दिया, क्योंकि सूखा सूती धागा भी उसे भरोसे लायक़ नहीं लगा। तीसरी बार पत्थर ठीक जगह गिरा। धागा पतंग की पूँछ के ऊपर से गुज़रा और दूसरी तरफ़ लटक गया।
अब उसके पास धागे के दोनों सिरे थे और बीच का हिस्सा पतंग के ऊपर था। उसने दोनों सिरे पकड़े और धीरे-धीरे खींचा। ऊपर नहीं। बग़ल में। पतंग तार पर सरकी। वह एक बार अटकी, फिर सरकी, और फिर तार के सिरे तक पहुँचकर नीचे गिर गई।
उसकी पूँछ फट चुकी थी और एक तीली टूट गई थी। दत्तू ने उसे उठाया और घर ले गया।
उसने उसी रात उसे ठीक किया। पूँछ के लिए उसने पुराने अख़बार की पट्टी काटी और तीली के लिए झाड़ू की एक सींक ली, जो पतंग की तीली से थोड़ी मोटी थी।
अगले दिन वह पतंग फिर उड़ी।
उसे उड़ाने में उस दिन तीन बार कोशिश करनी पड़ी। पहली बार वह ज़मीन से दस फ़ुट ऊपर जाकर एक तरफ़ को गिर गई। दूसरी बार भी। तीसरी बार उसके छोटे भाई ने उसे पकड़कर दौड़ लगाई और तब वह हवा पकड़ गई।
वह पहले जैसी नहीं उड़ी। मोटी सींक की वजह से वह एक तरफ़ को खिंचती थी और उसे सीधा रखने के लिए दत्तू को डोर बीच-बीच में ढीली छोड़नी पड़ती थी। उसने उसे उस पूरे मौसम उड़ाया और नई नहीं ख़रीदी।
सूती धागे का वह गोला उसकी माँ के डिब्बे में वापस चला गया और उसमें से जितना धागा गया था वह उसे कभी पता नहीं चला।