बारिश रात में आई और सुबह तक रुक चुकी थी।
रुकमा का थैला बरामदे में टँगा था और बरामदे की छत के एक कोने से पानी टपकता था, जिसका उसे मालूम था और जो उस रात उसे याद नहीं रहा। सुबह उसने थैला उतारा और वह भारी था। भीतर तीन कॉपियाँ थीं और दो किताबें।
कॉपियों का काम चल जाता। किताबों में से एक बुरी तरह भीगी थी।
वह गणित की थी और वह इस बरस मिली थी, नई, और वह घर में तीन बहनों में सबसे बड़ी होने की वजह से रुकमा को मिली थी और उसके बाद छोटी को जानी थी।
सरकारी स्कूल में किताबें मुफ़्त मिलती हैं, पर वे साल में एक बार मिलती हैं और खो जाने या ख़राब हो जाने पर दोबारा नहीं मिलतीं। बाज़ार से वही किताब ख़रीदने पर पैंतालीस रुपये लगते और यह बात रुकमा के दिमाग़ में उसी वक़्त आ गई जब उसने थैले का वज़न महसूस किया।
गीली किताब की सबसे बड़ी दिक़्क़त यह नहीं होती कि वह गीली है। दिक़्क़त यह होती है कि सूखने पर उसके पन्ने आपस में चिपक जाते हैं और फिर खोलने पर फट जाते हैं।
इसकी वजह काग़ज़ में लगी लेई होती है। गीला होने पर वह घुल जाती है और दो पन्नों के बीच आ जाती है, और सूखते वक़्त वह दोनों को जोड़ देती है। यह रुकमा को किसी ने बताया नहीं था। उसे इतना मालूम था कि पिछले बरस उसकी एक कॉपी भीगी थी और सूखने के बाद वह एक ही मोटा टुकड़ा बनकर रह गई थी।
पहली कोशिश उसने धूप की सोची। धूप नहीं थी। बिलकुल नहीं थी। आसमान पूरा बादलों से भरा था और उस दिन धूप निकलने के आसार भी नहीं थे, क्योंकि यही मौसम था। दूसरी कोशिश उसने चूल्हे के पास की। उसने किताब खोलकर चूल्हे से कुछ दूरी पर रखी।
पंद्रह मिनट बाद उसने देखा तो जो पन्ने आग की तरफ़ थे वे मुड़ने लगे थे और उनका किनारा भूरा पड़ रहा था, जबकि बीच वाले पन्ने अब भी उतने ही गीले थे।
यह हर उस चीज़ के साथ होता है जिसे तेज़ आँच पर सुखाया जाए। बाहर की परत जल्दी सूखती है और भीतर की नमी वहीं फँसी रह जाती है, और बाहर की परत सिकुड़कर मुड़ जाती है। रुकमा ने यह कहीं पढ़ा नहीं था, उसने यह होते हुए देखा और वहीं समझ लिया।
उसने उसे हटा लिया। तीसरी कोशिश उसने पंखे की सोची। बिजली नहीं थी। अब उसके पास एक ही रास्ता बचा था और वह वक़्त लेने वाला था। उसे यह याद आया कि उसकी माँ मेथी और धनिया सुखाने के लिए क्या करती है। वह उन्हें अख़बार पर फैलाती है, क्योंकि अख़बार पानी खींच लेता है।
रुकमा ने घर में जितने पुराने अख़बार थे सब निकाले। उसने उनके छोटे-छोटे टुकड़े फाड़े, किताब के पन्ने के बराबर। फिर उसने किताब का पहला पन्ना उठाया और उसके नीचे एक टुकड़ा रखा। दूसरा पन्ना उठाया, उसके नीचे दूसरा टुकड़ा।
यह उसने पूरी किताब में किया।
किताब में एक सौ छियालीस पन्ने थे और इसमें उसे लगभग एक घंटा लगा, क्योंकि गीला पन्ना उठाने में सँभालना पड़ता है और जल्दी करने पर वह वहीं फट जाता है।
पन्ना उठाने का तरीक़ा उसने पहले पाँच पन्नों में सीख लिया। कोने से नहीं उठाना है, क्योंकि कोना सबसे पहले फटता है। किनारे के बीच से, दोनों उँगलियों को सटाकर, और उठाते वक़्त पन्ने को हवा में नहीं छोड़ना है। वह इस काम में इतनी धीमी हो गई कि उसकी छोटी बहन दो बार देखकर बोर होकर चली गई।
किताब मोटी होकर लगभग दुगुनी हो गई। फिर उसने उसे बंद किया और उसके ऊपर वज़न रखा। वज़न के लिए उसने सिल रखी, जो रसोई से लानी पड़ी और जो भारी थी।
सिल लाने में उसे दो बार रुकना पड़ा। वह इतनी भारी थी कि उसे उठाकर चला नहीं जा सकता था, इसलिए उसने उसे ज़मीन पर घसीटा और चौखट पर उठाकर पार किया। उसकी माँ ने यह देखा और उसने पूछा कि क्या कर रही है, और सुनकर उसने सिर हिला दिया और उसे लौटाने को नहीं कहा।
यह सबसे ज़रूरी हिस्सा था। दबाव से पन्ने सीधे रहते हैं और सूखते वक़्त सिकुड़ते नहीं। शाम को उसने अख़बार के टुकड़े बदले। सब गीले हो चुके थे। उसने नए रखे और वज़न वापस रख दिया। रात में उसने एक बार और बदले।
यह उसने सोकर उठकर किया। उसने ध्यान से गिना था कि शाम वाले टुकड़े कितनी देर में गीले हुए और उसी हिसाब से उसने अंदाज़ा लगाया कि रात में एक बार और बदलना पड़ेगा। पुराने टुकड़े उसने फेंके नहीं, उन्हें अलग रखकर सुखा लिया, क्योंकि सूखने के बाद वे दोबारा काम आ सकते थे।
अगली सुबह किताब लगभग सूख चुकी थी। वह पहले जैसी सीधी नहीं थी। उसके पन्ने थोड़े लहरदार थे और उनका रंग कहीं-कहीं हल्का पीला पड़ गया था। पर वे चिपके नहीं थे और वे फटे नहीं थे। किताब चलती रही। पूरे बरस।
अगले बरस वह छोटी बहन के पास गई और उसमें पढ़ाई हुई।
बरामदे की छत का वह कोना उस बरसात में ठीक नहीं हुआ। रुकमा ने थैला टाँगने की कील बदल दी और वह अब दूसरे कोने में लगी है, जहाँ से पानी नहीं टपकता।