मेला हर बरस चैत में लगता था और दो दिन का होता था। उसमें जलेबी की तीन दुकानें लगती थीं, चूड़ी वाले आते थे, और सबसे किनारे पर लकड़ी का बड़ा झूला लगता था, जिसे चार आदमी हाथ से घुमाते थे।

झूला लकड़ी का था और उसमें छह पालने लगे थे, हर पालने में दो लोग। उसे घुमाने वाले चार आदमी नीचे खड़े होकर उसके डंडे पकड़कर उसे धकेलते थे और फिर उसके अपने वज़न से वह घूमता रहता था। ऊपर जाकर वह एक पल के लिए रुकता सा था और उसी पल में सबसे ज़्यादा मज़ा आता था, और यही बात सोहनी को पिछले बरस से याद थी।

एक चक्कर पाँच रुपये का था। सोहनी आठ बरस की थी और उसके पास कुछ नहीं था।

उसने अपनी माँ से नहीं माँगा। यह उसने तय करके किया, इसलिए नहीं कि माँ मना करती, बल्कि इसलिए कि उसे मालूम था कि माँ हाँ कर देती और फिर किसी और चीज़ में कमी पड़ जाती। पहला तरीक़ा उसने बोतलें बीनने का सोचा।

मेले में प्लास्टिक की बोतलें बहुत गिरती हैं और कबाड़ी उन्हें ख़रीदता है। उसने पहले दिन दोपहर से शाम तक बीनीं। उसे उन्नीस बोतलें मिलीं।

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बोतलें ढूँढ़ना दिखने में जितना आसान लगता है उतना है नहीं। मेले में जो बोतलें गिरती हैं वे भीड़ के पैरों के नीचे चली जाती हैं और चपटी हो जाती हैं, और चपटी बोतल का वज़न वही रहता है पर उसे उठाने के लिए झुकना पड़ता है। सोहनी की पीठ शाम तक दुखने लगी थी।

कबाड़ी ने उन्हें तौला और दो रुपये दिए। उन्नीस बोतलों के दो रुपये। सोहनी को यह कम लगा और वह सही थी, पर भाव वही था। दूसरा तरीक़ा उसने चूड़ी वाले के पास आज़माया। उसने उससे कहा कि वह उसकी दुकान पर बैठ जाएगी और चूड़ियाँ पकड़ाएगी।

चूड़ी वाले ने मना कर दिया। उसने कहा कि चूड़ी नाज़ुक होती है और टूटने पर नुक़सान उसी का होगा। यह भी ठीक था। दूसरे दिन सुबह सोहनी मेले में घूमती रही और उसने देखा। उसने यह देखा कि हर दुकान वाला बीच-बीच में अपनी जगह छोड़कर जाता है, और जब वह जाता है तो उसे किसी को बिठाकर जाना पड़ता है।

उसने यह भी देखा कि सबसे ज़्यादा दिक़्क़त पानी की है। मेले में एक ही नल था, दूर, और दुकान वाले अपनी जगह छोड़कर पानी लेने नहीं जा सकते थे।

तीसरा तरीक़ा यही था।

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उसने इसे सोचकर निकाला था और यही उसमें सबसे अच्छी बात थी। उसने दो दिन में यह देख लिया था कि मेले में किस चीज़ की कमी है, और वह चीज़ ऐसी थी जिसे एक आठ बरस की लड़की पूरा कर सकती थी। कोई और बच्चा उस मेले में पानी नहीं ढो रहा था।

उसने घर से एक बाल्टी ली और एक लोटा।

वह नल तक गई, बाल्टी भरी, और उसे उठाकर दुकानों की क़तार तक लाई। यह आसान नहीं था। भरी बाल्टी आठ बरस की लड़की के लिए भारी होती है और उसे बीच में तीन बार रखना पड़ा। पहली दुकान पर उसने कहा कि पानी चाहिए क्या।

जलेबी वाले ने लोटा भरवा लिया और उसे कुछ नहीं दिया। दूसरी दुकान पर भी यही हुआ। तीसरी दुकान वाले ने उसे एक रुपया दिया। चौथी ने दो दिए। पाँचवीं दुकान वाली एक औरत थी जो पापड़ बेच रही थी। उसने पानी लिया, सोहनी को देखा, और पूछा कि यह किसलिए कर रही है।

सोहनी ने बता दिया। औरत ने दो रुपये दिए और साथ में एक पापड़, जो सोहनी ने वहीं खा लिया। दोपहर तक उसके पास सात रुपये हो चुके थे। दो बोतलों के और पाँच पानी के। वह झूले तक गई।

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झूले वाले ने उसका हाथ देखा, जिसमें सिक्के थे, और उसने कुछ नहीं पूछा। उसने पाँच लिए और उसे बिठा दिया।

चक्कर तीन मिनट का था।

पालना पहले धीरे उठा, फिर तेज़ हुआ, और फिर वह ऊपर जाकर एक पल के लिए रुका। उस पल में सोहनी का पेट हल्का हो गया और उसने पट्टी और ज़ोर से पकड़ ली। नीचे से जो आवाज़ें आ रही थीं वे एक साथ मिलकर एक ही आवाज़ बन गई थीं, जिसमें से कुछ भी अलग नहीं सुनाई देता था।

ऊपर जाते वक़्त पूरा मेला एक साथ दिखता है और आवाज़ें नीचे रह जाती हैं। सोहनी ने दोनों हाथों से पट्टी पकड़ रखी थी और वह नीचे नहीं देख रही थी, वह दूर देख रही थी, जहाँ खेत थे और उनके पीछे उसका गाँव था।

उतरने के बाद उसके पास दो रुपये बचे थे। उसने उनसे कुछ नहीं ख़रीदा। वह घर गई और उसने वे दोनों सिक्के अपनी माँ को दे दिए, और माँ ने पूछा कि कहाँ से आए, और उसने कहा कि कमाए हैं।

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माँ ने और कुछ नहीं पूछा। उसने वे सिक्के अपने पल्लू में बाँध लिए।

बाल्टी अगले बरस भी काम आई। सोहनी ने अगले मेले में वही किया और इस बार उसे मालूम था कि किन दुकानों पर जाना है और किन पर नहीं, इसलिए उसने दोपहर तक बारह रुपये कर लिए। उसने उस बरस झूले का एक ही चक्कर लिया। बाक़ी पैसे उसने घर पर दे दिए।