बरसात की उस रात बिजली आठ बजे गई।

दिन में पानी बरसा था और शाम को रुक गया था। ऐसी रातों में हवा भारी हो जाती है और घर के भीतर बैठना मुश्किल हो जाता है, इसलिए ज़्यादातर घरों में चारपाइयाँ आँगन में डाल दी जाती थीं। मेंढक बोल रहे थे और उनकी आवाज़ खेतों की तरफ़ से आ रही थी, लगातार, रुक-रुक कर नहीं।

गाँव में बिजली जाना कोई ख़बर नहीं होती। वह रोज़ जाती है और आ जाती है। उस रात वह नहीं आई। नौ बजे तक भी नहीं आई और दस बजे तक भी नहीं, और तब तक मोहल्ले के ज़्यादातर घरों में लोग बाहर निकल आए थे।

अंकुश सात बरस का था और उसकी बहन हुसैना चार की थी।

हुसैना को अँधेरे से डर लगता था और वह इसे छिपाती नहीं थी। वह रोने नहीं लगती थी। वह बस चुप हो जाती थी और अपनी माँ का आँचल पकड़ लेती थी, और उस रात माँ बाहर आँगन में थी क्योंकि भीतर गर्मी थी।

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अंकुश ने पहले मोमबत्ती ढूँढ़ी।

मोमबत्ती कहीं नहीं मिली, न ताक़ पर, न रसोई के डिब्बे में, न उस थैले में जिसमें ऐसी चीज़ें रखी जाती हैं। पिछली बार जो जली थी वह पूरी जल चुकी थी और नई नहीं आई थी।

फिर उसने टॉर्च देखी।

टॉर्च थी। उसमें सेल भी थे। उसने बटन दबाया और कुछ नहीं हुआ। उसने सेल निकालकर हथेली पर रगड़े, जो उसने अपने बाबा को करते देखा था, और फिर लगाए। रोशनी एक पल के लिए आई और चली गई। तीसरी चीज़ जो उसे सूझी वह चाँद था।

वह हुसैना को लेकर आँगन में गया और उसने ऊपर देखा। बादल थे। पूरे आसमान पर। चाँद कहीं नहीं था। हुसैना ने कुछ नहीं कहा और वह उसका हाथ पकड़े खड़ी रही। तभी अंकुश ने एक चीज़ देखी। आँगन के कोने में, तुलसी वाले चबूतरे के पास, हवा में कुछ चमका।

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फिर वह बुझ गया और कुछ पल तक वहाँ सिर्फ़ अँधेरा रहा। फिर थोड़ी दूर पर चमका। जुगनू।

बरसात के दिनों में गाँव के आँगनों में जुगनू आ जाते हैं और वे गीली घास के पास सबसे ज़्यादा होते हैं। उनकी रोशनी हरी होती है और वह पूरी तरह हरी नहीं होती, उसमें थोड़ा पीलापन रहता है। वे एक जगह टिकते नहीं और उनका चमकना किसी क्रम से नहीं होता, इसलिए उन्हें देखते रहने पर लगता है कि अँधेरा हिल रहा है।

बरसात में वे आ जाते हैं और उस रात वे बहुत थे, क्योंकि दिन में पानी पड़ा था और घास गीली थी। अंकुश यह देखते ही भीतर की तरफ़ भागा और उसने हुसैना से कहा कि वहीं खड़ी रहना। रसोई में काँच का एक मर्तबान था जिसमें अचार रहता था और जो उस वक़्त ख़ाली था। उसने उसे लिया और उसका ढक्कन छोड़ दिया।

उसने हुसैना से कहा कि पकड़ो। हुसैना ने पहले मना किया, क्योंकि उसे कीड़े अच्छे नहीं लगते। अंकुश ने कहा कि ये काटते नहीं। फिर उसने ख़ुद एक पकड़कर दिखाया। उसने उसे मुट्ठी में लिया, हुसैना के सामने मुट्ठी खोली, और मुट्ठी के भीतर हरी रोशनी जल गई।

हुसैना हँस पड़ी और उसने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया। उसके बाद दोनों ने मिलकर पकड़े।

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यह आसान नहीं था। जुगनू चमकते हैं और फिर बुझ जाते हैं, और बुझने के बाद वे वहाँ नहीं रहते जहाँ चमके थे। दोनों बार-बार ख़ाली हाथ रह जाते थे। अंकुश ने तरीक़ा निकाला। वह चमकने का इंतज़ार करता, फिर उस जगह से थोड़ा आगे हाथ बढ़ाता, क्योंकि जुगनू उसी तरफ़ बढ़ रहा होता था।

इस तरह उन्होंने ग्यारह पकड़े।

मर्तबान में डालते वक़्त सबसे ज़्यादा ध्यान रखना पड़ता था, क्योंकि ढक्कन खोलते ही जो पहले से भीतर थे वे निकलने की कोशिश करते थे। दोनों ने मिलकर तरीक़ा निकाला। हुसैना मर्तबान का मुँह अपनी हथेली से आधा ढँके रहती थी और अंकुश दूसरी तरफ़ से हाथ खोलता था। यह उन्होंने किसी से सीखा नहीं था।

मर्तबान में ग्यारह जुगनू ज़्यादा नहीं लगते। वे सब एक साथ नहीं चमकते। कोई चमकता है, फिर दूसरा, फिर तीसरा। उन्होंने उसके मुँह पर पतला कपड़ा बाँध दिया, ताकि हवा जाती रहे। मर्तबान कमरे में, चारपाई के पास रखा गया।

उससे पढ़ा नहीं जा सकता था। उससे कमरा भी नहीं दिखता था। पर वह अँधेरा नहीं था।

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कमरे की दीवार पर उसकी हल्की सी हरी रोशनी पड़ती थी और वह हिलती रहती थी, कभी थोड़ी तेज़, कभी लगभग ग़ायब। चारपाई पर लेटकर उसे देखने से यह पता नहीं चलता था कि अगली बार रोशनी कहाँ से आएगी, और यही उसमें देखने लायक़ बात थी।

हुसैना उसी को देखते-देखते सो गई। बिजली रात के दो बजे आई और अंकुश की आँख खुल गई। बल्ब जल रहा था। उसने उठकर बल्ब बंद कर दिया और वापस आकर लेट गया।

सुबह उसने मर्तबान लेकर आँगन में जाकर कपड़ा खोल दिया। ग्यारह में से नौ उड़ गए। दो नीचे रह गए और वे धूप में हरे नहीं थे, वे भूरे थे, किसी भी दूसरे कीड़े जैसे। उसने उन दोनों को घास पर रख दिया।

वह मर्तबान उसके बाद रसोई में वापस नहीं गया। वह खिड़की की ताक़ पर रखा रहा, ख़ाली, और हुसैना उसमें बरसात में जुगनू रखती रही, हर बरस, जब तक वह उतनी बड़ी नहीं हो गई कि उसे अँधेरे से डर लगना बंद हो जाए।