दिवाली अगले दिन थी और आँगन लिप चुका था। रंगोली देवयानी बनाती थी। यह उसके ज़िम्मे पिछले तीन बरस से था, जब से उसकी बड़ी बहन की शादी हुई थी।

उससे पहले वह बहन के बग़ल में बैठकर देखती थी और उसे रंग पकड़ाती थी। पकड़ाना अपने आप में एक काम है, क्योंकि रंगोली बनाते वक़्त हाथ रुकना नहीं चाहिए और बनाने वाला ऊपर नहीं देखता, वह सिर्फ़ हाथ बढ़ाता है और रंग उसकी हथेली में आ जाना चाहिए। तीन बरस यह करने के बाद उसे यह भी मालूम हो गया था कि कौन सा रंग कितना लगता है।

रंग बाज़ार से आते थे। छोटी-छोटी पुड़ियों में, आठ रंग, और पूरे सेट के तीस रुपये लगते थे। उस बरस वे नहीं आए। इसकी वजह यह थी कि उसके पिता का काम उस महीने कम रहा था और घर में जो पैसा था वह मिठाई और दीयों में चला गया।

यह किसी ने उसे बैठाकर नहीं बताया। उसने ख़ुद देख लिया, क्योंकि बाज़ार से जो थैला आया उसमें रंग नहीं थे और किसी ने उसका ज़िक्र भी नहीं किया। उसने माँगा नहीं। एक बार भी नहीं। पहली कोशिश उसने पड़ोस में की।

बग़ल वाले घर में रंग थे और वहाँ रंगोली उसी शाम बन चुकी थी। उसने बचा हुआ रंग माँगा। उन्होंने दिया, पर जो बचा था वह बहुत कम था और दो ही रंग थे, हरा और गुलाबी, और वे दोनों पुड़ियों में इतने थे कि एक चुटकी भर।

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उसने वे दोनों पुड़ियाँ लौटाई नहीं। उसने उन्हें सँभालकर रख लिया और उसे यह अच्छा नहीं लगा कि उसे माँगना पड़ा। बग़ल वाली चाची ने देते वक़्त कुछ नहीं कहा, न अच्छा न बुरा, और यही सबसे ठीक था। इससे रंगोली नहीं बनती। यह उसे देखते ही मालूम हो गया।

दूसरी कोशिश उसने चॉक की सोची। स्कूल वाली सफ़ेद चॉक उसके पास थी और उसने उसे पत्थर पर रगड़कर चूरा बनाया। चूरा बना, पर वह इतना कम था कि उससे एक लकीर भी पूरी नहीं होती, और तीन चॉक रगड़ने के बाद उसकी उँगलियाँ छिल गईं।

अब शाम हो रही थी। वह आँगन में बैठ गई और उसने चारों तरफ़ देखा। और तब उसे वह बात समझ आई जो उसके सामने पूरे वक़्त थी। रंग ख़रीदे नहीं जाते। रंग किसी चीज़ का चूरा होता है।

यह बात उसे इसलिए सूझी क्योंकि उसकी नज़र चूल्हे पर पड़ी थी और उसके नीचे जो कालिख जमी थी वह काली थी, बिलकुल काली, उससे काली जितनी दुकान वाली पुड़ी में होती है। और अगर कालिख काली है तो वह रंग है, चाहे वह पुड़ी में बंद न हो।

सफ़ेद के लिए उसने चावल का आटा लिया। यह रसोई में था और यह वैसे भी रंगोली में इस्तेमाल होता है, और उसे यह मालूम था क्योंकि उसकी दादी सिर्फ़ इसी से बनाती थीं।

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पीले के लिए उसने हल्दी ली।

हल्दी का रंग गहरा होता है और वह थोड़ी सी में बहुत हो जाती है, इसलिए उसने उसे चावल के आटे में मिलाकर हल्का किया, ताकि वह ज़्यादा चले। लाल के लिए उसे कुछ नहीं मिला। रसोई में लाल कुछ नहीं होता।

फिर उसे पिछवाड़े का वह ढेर याद आया जहाँ पुरानी टूटी ईंटें पड़ी थीं। उसने एक टुकड़ा लिया और उसे दूसरे पत्थर से पीसा। ईंट का चूरा लाल नहीं होता, वह गेरुआ होता है, और वह रंगोली में अच्छा लगता है क्योंकि उसका रंग मिट्टी से मिलता है।

काले के लिए उसने चूल्हे के नीचे से कोयला निकाला और उसे पीसा।

हरे के लिए उसने नीम की पत्तियाँ ली और उन्हें सिल पर पीसा, और उससे जो निकला वह गीला था और उसे सुखाना पड़ता, इसलिए उसने उसे छोड़ दिया और पड़ोस वाला हरा उसी जगह बचाकर रखा जहाँ सबसे कम चाहिए था।

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पाँच रंग हो गए।

उसने पाँचों को अलग-अलग कटोरियों में रखा और हर कटोरी को उँगली से छूकर देखा। चावल का आटा सबसे बारीक था और वह हाथ से बहुत आसानी से गिरता था। ईंट का चूरा मोटा था और उसे और पीसना पड़ा, क्योंकि मोटा चूरा लकीर में गिरता नहीं, ढेर बना देता है। कोयला सबसे कम था, इसलिए उसने तय किया कि वह सिर्फ़ बिंदुओं में जाएगा।

उसने रंगोली रात में बनाई, लालटेन की रोशनी में, क्योंकि दिन ख़त्म हो चुका था। वह बड़ी नहीं बनी। जितने रंग थे उतनी ही बनी।

बीच में कमल था, सफ़ेद, और उसकी पंखुड़ियों के किनारे गेरुए थे। बाहर की गोल पट्टी हल्दी वाली थी और उसके भीतर काले बिंदु थे। हरा उसने सिर्फ़ बीच वाले कमल की डंडी में लगाया, एक पतली लकीर। सुबह लोगों ने उसे देखा।

बग़ल वाली चाची ने पूछा कि रंग कहाँ से लाई। देवयानी ने बता दिया, पूरा, ईंट वाली बात भी। चाची ने अगले बरस अपनी रंगोली में ईंट का चूरा इस्तेमाल किया और उसने यह किसी को बताया नहीं। दिवाली के बाद रंगोली तीन दिन में मिट जाती है, क्योंकि उस पर से लोग गुज़रते हैं।

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गेरुआ रंग सबसे बाद में गया। वह आँगन की लिपी हुई मिट्टी में बैठ गया था और उसकी हल्की सी छाप उस जगह पर अगली लिपाई तक दिखती रही।