आस्था आठ साल की थी और उसके पास रंगों के नाम बाकी बच्चों से ज़्यादा थे। दूसरे बच्चे नीला कहते; वह पूछती कौन सा नीला, आसमान वाला या कमीज़ वाला। लोग हँस देते। स्कूल से लौटते वक़्त वह अक्सर रुक जाती, किसी दीवार के सामने, किसी फूल के सामने, और देर तक देखती रहती। माँ आवाज़ लगातीं, तब वह चलती। घर में उसके पास रंगों की कोई डिबिया नहीं थी। जो रंग उसे दिखते थे, वे सब बाहर थे, और उन्हें इकट्ठा करने का कोई तरीक़ा उसे अब तक नहीं मिला था। यही बात उसे सबसे ज़्यादा खटकती थी। वह चाहती थी कि जो रंग उसे दिखते हैं, वे किसी तरह उसके पास रह जाएँ, और शाम को जब अँधेरा हो जाए, तब भी दिखते रहें।

पहली कोशिश उसने फूलों से की। स्कूल के रास्ते में गुड़हल के फूल गिरे रहते थे और आस्था ने मुट्ठी भर उठाकर कॉपी के बीच दबा दिए। तीन दिन बाद उसने कॉपी खोली। फूल चिपक चुके थे और उनका लाल भूरा हो गया था। कागज़ पर एक धब्बा रह गया था, गंदा सा। आस्था ने वह पन्ना फाड़कर फेंका नहीं। वह उसे देखती रही और सोचती रही कि रंग गया कहाँ।

जवाब उसे रसोई में मिला, बिना ढूँढ़े। दादी हल्दी पीस रही थीं और सिल पर जो पीला बचा था वह इतना चमकीला था कि आस्था वहीं रुक गई। उसने उँगली फेरी और उँगली पीली हो गई। उसने हाथ धोया और पीलापन पूरा नहीं गया। यह पहली बार था जब कोई रंग उसके पास रुका था।

सबसे अच्छी तरकीब

उस रात उसने सोचने में देर लगाई। हल्दी रुक गई थी। फूल नहीं रुका था। दोनों में फ़र्क़ क्या था। सुबह उठते ही उसने दादी से पूछा कि हल्दी कपड़े पर लग जाए तो जाती क्यों नहीं। दादी ने कहा कि नहीं जाती, बस इतना ही। यह कोई जवाब नहीं था। पर आस्था के लिए इतना काफ़ी था। जो चीज़ कपड़े पर से नहीं जाती, उसे वही चाहिए थी।

उसके बाद वह चीज़ें माँगने लगी। दादी से हल्दी। पड़ोस की काकी से चुकंदर का एक टुकड़ा, जिसे सिल पर घिसा तो गहरा गुलाबी रस निकला। धोबी के यहाँ से नील की एक टिकिया, जो पानी में डालते ही ऐसा नीला बनाती थी कि आस्था ने बाल्टी में हाथ डालकर उसे देर तक हिलाया। मेहँदी के पत्ते पीछे वाले खेत में ही थे। गेरू उसे कुम्हार के चाक के पास मिला, मुफ़्त, क्योंकि उसकी किसी को ज़रूरत नहीं थी।

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पुरानी शीशियाँ इकट्ठा करने में उसे दो हफ़्ते लगे। दवा की, अचार की, एक तेल की। उसने हर शीशी में एक रंग घोला और उन्हें कमरे की खिड़की पर क़तार में रख दिया। दिन में वे साधारण दिखती थीं। पर शाम को जब लालटेन जलती और उसकी रोशनी पीछे से आती, तो शीशियाँ जल उठतीं। पीला, गुलाबी, नीला, हरा, गेरुआ। आस्था ज़मीन पर लेटकर उन्हें देखती रहती।

रंग बनाना उतना आसान नहीं था जितना उसने सोचा था। हल्दी पानी में बैठ जाती और नीचे जम जाती। चुकंदर का रस दो दिन में काला पड़ गया और उसमें से बू आने लगी, तो वह शीशी फेंककर दूसरी बनानी पड़ी। मेहँदी के पत्ते उसने पहले सुखाए, फिर सिल पर पीसे, और तब जाकर हरा निकला। हर रंग की अपनी शर्त थी, और आस्था ने वे शर्तें एक-एक करके पता कीं।

माँ को यह पसंद नहीं आया, क्योंकि खिड़की पर शीशियाँ रखने से हवा रुकती है और गिरने का डर रहता है। एक शीशी गिरी भी, नील वाली, और फ़र्श पर ऐसा नीला दाग़ छोड़ गई जो दो महीने नहीं गया। आस्था को डाँट पड़ी। उसने शीशियाँ हटा लीं और चारपाई के नीचे रख दीं, और वहीं से हर शाम एक-एक करके निकालकर देखती रही।

एक प्यारा सा सबक

डाँट के बाद भी उसने रंग बनाना बंद नहीं किया। बस अब वह उन्हें बनाकर तुरंत चारपाई के नीचे रख देती और ढक्कन कसकर बंद रखती। जनवरी तक उसके पास ग्यारह शीशियाँ हो चुकी थीं, जिनमें से चार एक ही रंग की थीं, अलग-अलग गहराई में। यह फ़र्क़ घर में सिर्फ़ उसे दिखता था।

होली उस साल मार्च के पहले हफ़्ते में पड़ी। सुबह-सुबह जब बाकी बच्चे बाज़ार वाले रंग लेकर निकले, आस्था चारपाई के नीचे से पाँच शीशियाँ लेकर बाहर आई। उसके रंग बाज़ार वालों जितने चटख़ नहीं थे। वे हल्के थे, और हाथों पर फैलते नहीं थे, टिक जाते थे। दोपहर तक मोहल्ले के आधे बच्चे उसी के पीछे थे। शाम को जब सब नहा-धोकर बैठे, तो सबसे ज़्यादा रंग आस्था की अपनी हथेलियों में बचा हुआ था। उसने उन्हें लालटेन के सामने किया और देर तक देखती रही। उस शाम उसकी हथेलियाँ पाँच रंगों की थीं, और लालटेन के आगे वे अँधेरा हो जाने के बाद भी दिखती रहीं।