उर्मिला को तितलियाँ गिनने की आदत थी। स्कूल जाते वक़्त, लौटते वक़्त, और छुट्टी वाले दिन तो पूरी दोपहर। उसे पता था कि किस फूल पर कौन सी आती है, और कौन सी सिर्फ़ सुबह दिखती है। गाँव के बाकी बच्चों को यह बेकार का काम लगता था। उर्मिला उन्हें समझाने की कोशिश नहीं करती थी। वह बस गिनती रहती थी। उसकी कॉपी के आख़िरी पन्ने पर एक सूची बनी हुई थी, जिसमें उसने अपने ढंग से नाम रख छोड़े थे। नारंगी वाली, धारीदार वाली, और वह छोटी काली जो सिर्फ़ बारिश के बाद आती है और दो दिन में गायब हो जाती है। उस सूची को उर्मिला ने आज तक किसी को नहीं दिखाया था।
उर्मिला की सूची में एक ही तितली ऐसी थी जिसके आगे कुछ लिखा नहीं था। वह छोटी काली वाली। वह हर बरसात के बाद आती, दो दिन दिखती, और फिर ग़ायब हो जाती। उर्मिला ने तीन साल से यही देखा था। वह जानना चाहती थी कि वह जाती कहाँ है। एक बार उसने मास्टर जी से पूछा था। मास्टर जी ने कहा था कि तितलियाँ मर जाती हैं और अगली बरसात में नई आ जाती हैं। उर्मिला को यह जवाब ठीक नहीं लगा, पर वह बहस नहीं कर पाई।
उस साल पहली बारिश जून के आख़िर में हुई। दूसरे दिन धूप निकली और काली तितलियाँ आ गईं। उर्मिला ने कॉपी बंद की और उनके पीछे चल दी। यह आसान नहीं था। तितली सीधी नहीं उड़ती। वह ऊपर जाती है, नीचे आती है, किसी चीज़ पर बैठती है, और फिर बिना किसी वजह उड़ जाती है। दो घंटे में उर्मिला मुश्किल से खेत के दूसरे कोने तक पहुँची, और वहाँ उसने तितली को खो दिया।
दूसरे दिन उसने फिर पीछा किया और फिर खो दिया। इस बार वह पहले से पास तक गई थी। तितली एक बार भैंस की पीठ पर बैठी, फिर उड़ी, और फिर उर्मिला की अपनी चुन्नी पर बैठ गई। हिलने पर वह उड़ जाती, इसलिए उर्मिला बहुत देर तक नहीं हिली। फिर भी वह उड़ गई।
अगले दिन उसने तरीक़ा बदला। उसने पीछा करना छोड़ दिया और बैठ गई। वह ठीक उसी जगह बैठी रही जहाँ कल तितली खोई थी, और सिर्फ़ देखती रही। दोपहर तक कुछ नहीं हुआ। फिर एक तितली आई और मेड़ पर उगी एक झाड़ी की पत्ती पर बैठ गई। वह उड़ी नहीं। वह वहीं रुकी रही, बहुत देर, अपने पेट को पत्ती से छुआती हुई।
उर्मिला घुटनों के बल आगे बढ़ी और पत्ती को पलटकर नीचे देखा। वहाँ अंडे थे। इतने छोटे कि गिनने के लिए उसे आँखें सिकोड़नी पड़ीं। उसने सात गिने। फिर आठवाँ दिखा। फिर उसने गिनना छोड़ दिया। वह झाड़ी वहाँ हमेशा से थी और उर्मिला उसके पास से सैकड़ों बार गुज़र चुकी थी। उस दिन वह अँधेरा होने तक वहीं बैठी रही।
उसने पास वाली पत्तियाँ भी पलटकर देखीं। तीन और पत्तियों के नीचे अंडे थे और बाकी पर कुछ नहीं था। उर्मिला को समझ नहीं आया कि तितली ने ये तीन क्यों चुनीं और बाकी क्यों छोड़ दीं। उसने उन तीनों पत्तियों को ध्यान से देखा। वे बाकी से न बड़ी थीं, न छोटी। यह सवाल उसने कॉपी में सबसे नीचे लिख लिया, बिना जवाब के, जैसे वह पहले भी कई सवाल लिख चुकी थी।
घर आकर उसने कॉपी खोली और छोटी काली वाली के आगे लिखा: मेड़ वाली झाड़ी, पत्ती के नीचे। फिर उसने तारीख़ भी डाल दी। उसकी सूची में यह पहली ऐसी लाइन थी जो सिर्फ़ एक नाम नहीं थी। उसने कॉपी बंद की, फिर खोलकर उसे दोबारा पढ़ा।
दो हफ़्ते बाद उसके पिता मेड़ साफ़ करने निकले, क्योंकि बोआई का वक़्त था और झाड़ियाँ खेत का पानी खींचती हैं। उर्मिला दौड़कर गई और उस झाड़ी के आगे खड़ी हो गई। उसने वजह नहीं बताई, क्योंकि बताने पर हँसी उड़ती। उसने बस कहा, "यह वाली रहने दो।" पिता ने उसे देखा। फिर झाड़ी को देखा। फिर हँसिया नीचे कर लिया। उस दिन पूरी मेड़ साफ़ हो गई। वह झाड़ी खड़ी रही।
अगली बरसात में काली तितलियाँ फिर आईं और इस बार उर्मिला को पता था कि कहाँ देखना है। उन्हीं दिनों गाँव की एक छोटी लड़की, गुड्डी, उसके पीछे-पीछे लगने लगी। गुड्डी छह साल की थी और उसे तितलियों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे उर्मिला में दिलचस्पी थी, जो अकेली रहती थी और घंटों एक जगह बैठी रह सकती थी। गुड्डी ने पूछा कि वह देख क्या रही है। उर्मिला ने पहले दिन टाल दिया।
तीसरे दिन उर्मिला ने कॉपी निकाली और आख़िरी पन्ना खोलकर गुड्डी के सामने रख दिया। यह पन्ना उसने आज तक किसी को नहीं दिखाया था। गुड्डी पढ़ नहीं पाई, क्योंकि उसे अभी ठीक से पढ़ना नहीं आता था। तब उर्मिला ने एक-एक नाम पढ़कर सुनाया। फिर उसने एक कोरा पन्ना फाड़कर गुड्डी को दिया और कहा कि खेत के उस तरफ़ जाकर नारंगी वाली गिने, और जितनी गिने उतनी लकीरें खींच दे।
गुड्डी उस दोपहर इकतीस लकीरें खींचकर लाई, जिनमें से कम से कम दस उसने दोबारा गिन ली थीं। उर्मिला ने उन्हें बिना जाँचे सूची में चढ़ा लिया। अब गाँव में दो लोग हैं जिन्हें पता है कि बरसात के बाद आने वाली छोटी काली तितली कहाँ जाती है। इनमें से एक अभी ठीक से पढ़ नहीं पाती।