गोलू भंवरा सुबह सबसे पहले उठता था, और उठते ही गाना शुरू कर देता था। गुनगुनाहट कहीं भी शुरू हो जाती: फूल की तरफ़ उड़ते हुए, रस पीते हुए, वापस लौटते हुए। उसे इस बात का ध्यान ही नहीं रहता था कि वह गा रहा है। जो सुनते थे उन्हें ज़रूर रहता था।

'यह फिर शुरू हो गया,' मेंढक कहता। 'भंवरे की आवाज़ भी कोई आवाज़ है?' गिलहरी कहती। 'इतनी पतली कि दो क़दम दूर से सुनाई नहीं देती।' गोलू सुन लेता और थोड़ी देर के लिए चुप हो जाता। फिर किसी नए फूल पर बैठता और भूल जाता कि उसे चुप रहना था।

गोलू के पास एक जगह थी जहाँ वह सबसे ज़्यादा गाता था: बगीचे के कोने वाला वह पुराना गुलाब, जो अब बहुत कम फूल देता था और जिसके पास कोई नहीं आता था। वहाँ उसे कोई टोकता नहीं था। कभी-कभी उसे लगता कि गुलाब सुन रहा है।

जब दोस्ती काम आई

उस साल गाँव में मेला लगा। ढोल, झूले, मिठाई की दुकानें, और शाम को गाने का मुक़ाबला। जंगल के सब जानवर उधर चले गए। गोलू भी गया, पर भीड़ में उसे कुछ अच्छा नहीं लगा। वह किनारे वाले बगीचे में चला आया, जहाँ कोई नहीं था, और वहीं गाने लगा।

थोड़ी देर बाद उसे लगा कि कोई उसे देख रहा है। पास वाले फूल पर एक तितली बैठी थी। 'माफ़ करना,' उसने कहा। 'मैं सुन रही थी।' गोलू शरमा गया। 'मैं तो बस ऐसे ही...' 'कितनी देर से गा रहे हो?' 'बचपन से।' तितली ने अपना नाम बताया: माला।

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'तुम्हें कोई सुनता क्यों नहीं?' माला ने पूछा। 'क्योंकि मेरी आवाज़ छोटी है।' 'छोटी है,' माला ने कहा, 'या सुनने वाले दूर खड़े हैं?' गोलू ने ऐसा कभी सोचा ही नहीं था।

माला ने एक बात कही जो गोलू को उस वक़्त समझ नहीं आई। उसने कहा कि आवाज़ को बड़ा नहीं करना पड़ता, बस उसे सही जगह तक पहुँचाना पड़ता है। फिर उसने पूछा कि क्या गोलू कल शाम इसी बगीचे में आ सकता है। गोलू ने हाँ कह दी, बिना यह जाने कि वह हाँ क्यों कह रहा है।

अगली शाम गोलू पहुँचा तो बगीचा भरा हुआ था। माला ने जंगल भर के जानवरों को बुला लिया था। मेंढक था, गिलहरी थी, खरगोश, हिरन, और पीछे की तरफ़ कुछ पक्षी। गोलू के पंख काँपने लगे। उसने माला की तरफ़ देखा। 'शुरू करो,' माला ने कहा। 'और सबसे पास आने को कहो।'

जब डर भाग गया

गोलू ने कहा कि सब थोड़ा पास आ जाएँ। सब पास आ गए, फूलों की क्यारी के चारों तरफ़, एकदम चुप। तब गोलू ने गाना शुरू किया।

गोलू ने गाया: 'फूलों की खुशबू, हवा का गीत, दिलों में बसी हो ये मीठी सी रीत। भंवरे का गीत, है सबका साथी, दिल से दिल तक, पहुंचे हर बाती।'

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जब वह ख़त्म हुआ तो कुछ देर तक कोई नहीं बोला। फिर मेंढक ने खाँसकर गला साफ़ किया और कहा कि उसे ठीक से सुनाई नहीं दिया क्योंकि वह पीछे बैठा था, और क्या गोलू दोबारा गा सकता है। गोलू ने दोबारा गाया। फिर तीसरी बार। तीसरी बार तक गिलहरी की आँखें भीगी हुई थीं।

मेंढक ने बाद में किसी से कहा कि उसे गाना पूरा समझ नहीं आया, बस अच्छा लगा। गिलहरी ने किसी से कुछ नहीं कहा। पर अगली शाम वह सबसे पहले पहुँची, और सबसे आगे बैठी।

उस रात गोलू को नींद नहीं आई। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतने लोगों के सामने कभी नहीं गाया था, और सबसे अजीब बात यह थी कि उसे डर नहीं लगा था। उसने माला से यह कहा। माला ने कहा कि डर तब लगता है जब लगे कि कोई सुन नहीं रहा। जब सब पास बैठे हों तो डर की जगह ही नहीं बचती।

'तुम्हारी आवाज़ छोटी नहीं है,' माला ने बाद में कहा। 'बस उसे पास से सुनना पड़ता है। और जो चीज़ पास से सुननी पड़े, उसके लिए लोग रुकते हैं। यही उसकी असली ताक़त है।'

उसके बाद हर शाम बगीचे में कुछ न कुछ जानवर आ जाते। कोई बहुत भीड़ नहीं होती, दस-बारह, जो पास बैठकर सुनते। गोलू ने कभी ज़ोर से गाने की कोशिश नहीं की। उसे अब इसकी ज़रूरत भी नहीं थी।

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बगीचे के कोने वाला वह पुराना गुलाब उस साल फिर से खिला। गोलू को पता था कि इसका उसके गाने से कोई लेना-देना नहीं है। पर वह हर शाम गाना उसी के पास से शुरू करता था। अगले साल जब मेले में गाने का मुक़ाबला हुआ, तो किसी ने गोलू को नहीं बुलाया। वह उस शाम भी बगीचे में ही था। मेला ख़त्म होने के बाद कई जानवर सीधे वहीं आ गए, और देर रात तक बैठे रहे।