माघ में कुछ दिन ऐसे आते हैं जब उजाला हो जाता है और दिखना शुरू नहीं होता। सड़क बीस क़दम पर है और वह दिखती नहीं। सिर्फ़ सुनाई देती है। ट्रक गुज़रता है और उसकी आवाज़ पहले आती है, फिर वह ख़ुद, फिर उसकी हवा, और फिर वह सफ़ेद में घुल जाता है।
शिवचरन की चाय की दुकान पुलिया के पास थी, सड़क से पंद्रह क़दम हटकर। जगह इसलिए अच्छी थी कि पुलिया पर गाड़ियाँ धीमी होती हैं। धीमी गाड़ी ही रुकती है। जो नहीं रुकती, वह चाय नहीं पीती।
कोहरे के दिनों में उस सड़क पर काम बढ़ जाता है और वह काम चाय बेचने का नहीं होता।
जब कोई गाड़ी भिड़ती है तो सबसे बड़ा ख़तरा भिड़ने वाली गाड़ी को नहीं होता। ख़तरा उसके पीछे आने वाले को होता है, जो कुछ नहीं देख रहा और जो अस्सी पर चल रहा है, क्योंकि कोहरे में सब आगे वाली गाड़ी की लाल बत्ती देखकर चलते हैं। इसलिए भिड़ने के बाद गाँव से कोई न कोई सड़क पर पीछे की तरफ़ दौड़ता है।
दौड़कर उसे इतनी दूर जाना पड़ता है कि लदा हुआ ट्रक रुक सके। दो सौ क़दम कम पड़ते हैं। तीन सौ ठीक रहते हैं। वहाँ खड़े होकर दोनों हाथ हिलाने पड़ते हैं और यही एकमात्र तरीक़ा है, क्योंकि और कुछ है ही नहीं। कुछ लोग टॉर्च ले जाते हैं। कुछ डंडे में लाल कपड़ा बाँध लेते हैं।
यह काम ख़तरनाक है और गाँव में इसे कोई काम नहीं मानता। शिवचरन ज़्यादातर बार ख़ुद जाता था, इसलिए कि दुकान सबसे पास थी और वह सबसे पहले सुन लेता था।
उस साल के पहले बड़े कोहरे में तीन गाड़ियाँ आपस में लगीं। शिवचरन ने आवाज़ सुनी और दौड़ा।
तीन सौ क़दम गिनकर नहीं जाते। एक जगह है जहाँ सड़क का किनारा टूटा हुआ है और वहीं से नीम दिखने लगता है। वहीं तक जाना होता है। शिवचरन वहाँ पहुँचने ही वाला था कि उसे आगे कोई खड़ा दिखा।
आदमी था। सफ़ेद में धुँधला, पर आदमी। वह सड़क के बीचोबीच नहीं, किनारे पर खड़ा था और आती हुई गाड़ियों की तरफ़ मुँह किए था।
पर वह हाथ नहीं हिला रहा था।
शिवचरन को यह अजीब लगा, क्योंकि वहाँ खड़े होने की एक ही वजह होती है और वह वजह हाथ हिलाना है। उसने ज़ोर से आवाज़ दी कि हाथ हिलाओ, ट्रक आ रहा है। उधर से कुछ नहीं हुआ। वह और आगे बढ़ा, बीस क़दम, और तब वहाँ कोई नहीं था। सड़क थी और टूटा हुआ किनारा था।
फिर भी उसे वहीं खड़ा होना था, क्योंकि पीछे से गाड़ियाँ आ रही थीं। वह टूटे किनारे पर खड़ा हुआ और दोनों हाथ हिलाने लगा। पहला ट्रक उससे इतने पास से निकला कि हवा से उसका मुँह घूम गया। दूसरा रुक गया। यह काम ऐसा ही है।
उस दिन उसने यह बात गाँव में बता दी। लोग हँसे। एक ने कहा कि कोहरे में खंभा भी आदमी लगता है। और एक बुज़ुर्ग ने कहा कि यही बात तुम्हारा बाप भी कहा करता था। इसके बाद वे दूसरी बातों में लग गए और चाय पीते रहे।
दूसरी बार तीन हफ़्ते बाद हुआ, और इस बार कोई गाड़ी नहीं भिड़ी थी।
सुबह के दस बजे थे और कोहरा उसी तरह खड़ा था। शिवचरन दूध लेने जा रहा था कि उसे नीम के पास वही चीज़ दिखी। वही खड़ा रहना, वही सड़क की तरफ़ मुँह। उसने इस बार आवाज़ नहीं दी। वह वहीं रुका रहा जब तक वह घुल नहीं गई।
दो दिन बाद उसी जगह पर एक बस और एक ट्रक आमने-सामने लगे। नौ लोग अस्पताल गए और दो नहीं गए।
इसके बाद शिवचरन की सर्दियाँ बदल गईं। कोहरे वाले हर दिन वह सड़क को देखता रहता था, दुकान के काम के बीच, बार-बार, बिना बताए। तीन साल में उसने वह चीज़ छह बार देखी। छह में से पाँच बार दस दिन के अंदर उसी जगह कुछ हुआ। छठी बार कुछ नहीं हुआ, और उस एक बार का उसे कभी हिसाब नहीं मिला।
वह किसी को रोक नहीं सकता था। यह उसने शुरू में ही समझ लिया था। सड़क पर खड़े होकर आती हुई हर गाड़ी को यह कहना कि यहाँ मत रुकना, यहाँ धीरे चलना, इसका कोई मतलब नहीं है। कोई नहीं सुनता, और सुन भी ले तो कोहरे में सबकी मजबूरी एक ही है।
चौथे साल की एक सुबह वह पानी गरम कर रहा था। उसने सिर उठाया तो वह चीज़ पुलिया पर खड़ी थी। नीम के पास नहीं। टूटे किनारे पर नहीं।
और इस बार उसका मुँह सड़क की तरफ़ नहीं था।
शिवचरन ने उस दिन दुकान नहीं खोली। उसने भोलू को बुलाया और दोनों ने सामान उतारा। चूल्हा, टीन, बेंच, केतली, सब। छह सौ क़दम आगे, जहाँ सड़क सीधी है और कोई गाड़ी धीमी नहीं होती, वहाँ उसने दुकान दोबारा खड़ी की।
भोलू ने बहुत कहा। बात सही थी। नई जगह पर दिन की बिक्री पुरानी जगह से आधी रह गई और आज तक आधी ही है, क्योंकि जो गाड़ी धीमी नहीं होती वह रुकती भी नहीं। घर में इस बात पर बरसों बहस चली और शिवचरन ने कभी कोई ऐसी वजह नहीं बताई जिसे कोई मान सके।
पुलिया के पास चूल्हे वाला पक्का चबूतरा अब भी है। उस पर कुछ नहीं रखा। उस जगह पर आज तक कोई हादसा नहीं हुआ, एक बार भी नहीं, और शिवचरन को अच्छी तरह मालूम है कि इससे कुछ साबित नहीं होता। वह फिर भी वापस नहीं जा रहा।