दिन में उस पेड़ के नीचे बच्चे खेलते थे और उसकी छाँव पूरे मोड़ को ढक लेती थी। रात को उधर कोई नहीं जाता था। कहा जाता था कि अँधेरे के बाद उस पेड़ के नीचे एक काला साया घूमता है। इस बात पर कोई खुलकर यक़ीन नहीं करता था। पर यह भी सच था कि रात में उस रास्ते से गुज़रने वाला हर आदमी दूसरी तरफ़ से घूमकर जाता था।
एक बात और सच थी, और वह यह कि पहली बस उसी पेड़ के नीचे रुकती है। वहीं से क़स्बे का रास्ता निकलता है और वहीं मोड़ है, इसलिए बस वहीं रुकेगी, चाहे कोई कुछ भी कहे। बस पाँच बजकर दस मिनट पर आती है।
जाड़ों में पाँच बजकर दस मिनट पर उजाला नहीं होता। पूस में तो बिल्कुल नहीं। साढ़े चार बजे तो रात ही होती है, और जिसे बस पकड़नी हो उसे साढ़े चार तक पहुँचना पड़ता है, क्योंकि बस कभी-कभी पहले आ जाती है और रुकती नहीं।
कालिंदी क़स्बे के अस्पताल में सफ़ाई का काम करती थी और उसकी ड्यूटी सात बजे से थी। यानी उसे यह बस रोज़ पकड़नी थी। यानी उसे रोज़ साढ़े चार बजे उस पेड़ के नीचे खड़ा होना था। इस बात पर घर में बहस हो चुकी थी और बहस का कोई नतीजा नहीं निकला था, क्योंकि नौकरी की जगह बदली नहीं जा सकती और बस का समय भी नहीं।
जाड़ों में वहाँ चार-पाँच लोग और होते हैं। सब कंबल या शॉल में सिर तक लिपटे रहते हैं और कोई किसी से बात नहीं करता। ठंड में लोग बात नहीं करते, क्योंकि मुँह खोलने से भीतर की गर्मी निकलती है। सब बस अपनी-अपनी जगह खड़े रहते हैं और सड़क की तरफ़ देखते रहते हैं।
उस सुबह कालिंदी सबसे पहले पहुँची। यह उसे इसलिए मालूम था कि वह पहुँची तो कोई नहीं था। पेड़ के नीचे अँधेरा था।
थोड़ी देर बाद एक और आया और पेड़ के तने की दूसरी तरफ़ जाकर खड़ा हो गया। कालिंदी ने उसकी तरफ़ ध्यान नहीं दिया। शॉल में लिपटा आदमी, तने के उस पार, सड़क की तरफ़ मुँह किए। ऐसे ही सब खड़े होते हैं।
पंद्रह मिनट बाद उसने यूँ ही इतना कहा कि आज ठंड ज़्यादा है। जवाब चाहिए नहीं था। बस अपनी आवाज़ सुननी थी।
उधर से कुछ नहीं आया।
कालिंदी को बुरा नहीं लगा। सुबह साढ़े चार बजे कोई जवाब न दे तो यह अशिष्टता नहीं मानी जाती। वह अपनी जगह खड़ी रही और सड़क की तरफ़ देखती रही।
बस पाँच बजकर सात मिनट पर आई। कालिंदी चढ़ी। उसके पीछे कोई नहीं चढ़ा।
बस चलने पर उसने खिड़की से बाहर देखा। बैठने के बाद आदमी बाहर देखता ही है, चाहे देखने को कुछ हो या न हो। पेड़ पीछे छूटता जा रहा था। तने की दूसरी तरफ़ वह आदमी अब भी खड़ा था, उसी तरह, सड़क की तरफ़ मुँह किए।
बस उसके सामने से निकल चुकी थी। सड़क की तरफ़ मुँह किए खड़ा आदमी बस को जाते हुए देखता, या मुड़ जाता, या घर की तरफ़ चल देता। वह ऐसे खड़ा था जैसे बस अभी आई ही न हो।
कालिंदी ने कंडक्टर से पूछा कि पेड़ वाले स्टॉप से और कोई नहीं चढ़ा। कंडक्टर ने कहा कि वहाँ तो आप अकेली खड़ी थीं।
घर पर उसने ज़िक्र तक नहीं किया। अस्पताल में भी नहीं। दोनों जगह का नतीजा उसे पहले से मालूम था। घर पर नौकरी छुड़ाने की बात चलती और अस्पताल में लोग हँसते।
अगली सुबह वह फिर साढ़े चार पर ही पहुँची। वहाँ दो औरतें पहले से खड़ी थीं और उसे इतनी राहत हुई कि रास्ते भर की ठंड एक बार में उतर गई। तीसरे दिन वहाँ एक ही आदमी था। शॉल में। तने की उसी तरफ़।
वह उससे पूछ सकती थी कि किस गाँव से आते हो। पूछ लेती तो जवाब मिलता, या न मिलता। दोनों सूरतों में उसे अगली सुबह फिर वहीं खड़ा होना था, उसी अँधेरे में, और शॉल में लिपटा कोई न कोई फिर वहीं होता। पूछने का कोई फ़ायदा नहीं था। जानने का कोई रास्ता भी नहीं था।
इसके बाद वह साढ़े चार पर नहीं निकली। वह पौने पाँच पर निकली, लगभग दौड़ती हुई, और जब वह पहुँची तो वहाँ तीन लोग पहले से खड़े थे। यह उसने जान-बूझकर किया और इसके बाद रोज़ यही करती रही।
इसमें ख़तरा था और उसे मालूम था। बस कभी-कभी पहले आ जाती है। दो बार वह छूटी भी। दोनों बार उसे पैदल तीन किलोमीटर चलकर दूसरे स्टॉप तक जाना पड़ा और दोनों बार वह देर से पहुँची, और दूसरी बार उसकी तनख़्वाह से आधे दिन का पैसा कटा।
आधे दिन का पैसा कटने के बाद उसने एक काम किया। उसने अस्पताल में अपनी एक साथी से कहा कि वह भी उसी गाँव से आती है क्या, और उसने कहा कि नहीं, पर अगले गाँव से एक आती है। कालिंदी ने उससे बात की और अगले हफ़्ते से दोनों साथ खड़ी होने लगीं।
यह बात धीरे-धीरे फैली, वैसे ही जैसे ऐसी बातें फैलती हैं, यानी बिना किसी के कुछ कहे। साल भर के अंदर उस स्टॉप पर सुबह अकेला कोई खड़ा नहीं होता था। जिसे जल्दी पहुँचना होता, वह किसी न किसी का इंतज़ार करके साथ जाता।
तीन साल बाद पंचायत ने उस स्टॉप पर एक छोटा छप्पर बनवा दिया और उस पर एक बत्ती लगवा दी, जो सौर वाली है और रात भर जलती है। छप्पर पेड़ से दस क़दम हटकर है, सड़क के इस तरफ़।
बारिश में पेड़ के नीचे ज़्यादा बचाव होता है। यह सब जानते हैं। फिर भी लोग छप्पर के नीचे ही खड़े रहते हैं, चाहे कंधे भीगते रहें। कालिंदी अब सबसे पहले पहुँचती है। बत्ती दूर से दिख जाती है, और जो पहले पहुँचता है वह बाक़ी लोगों के आने तक वहीं खड़ा रहता है।