अस्पताल में तीमारदार को बिस्तर नहीं मिलता। उसे ज़मीन मिलती है, बिस्तर के नीचे वाली, और वहीं वह अपनी चादर बिछाकर सोता है। निर्मला की यह चौथी रात थी। इतनी रातों में आदमी को ज़मीन की आदत पड़ जाती है, पर आवाज़ों की नहीं पड़ती।
औरतों के वार्ड में चौदह बिस्तर थे और सब भरे हुए थे। सिरे पर नर्स की मेज़ थी और उसके ऊपर एक ट्यूबलाइट, जो रात भर जलती रहती थी। बाक़ी वार्ड में रोशनी उतनी ही आती जितनी उस एक ट्यूब से आ सकती है। पूस का महीना था और खिड़कियों पर पर्दे नहीं थे।
माँ को चार दिन पहले लाया गया था। बुख़ार उतर चुका था, पर कमज़ोरी थी और डॉक्टर ने दो दिन और रखने को कहा था। रात में वे गहरी नींद सोती थीं, दवा की वजह से, और निर्मला हल्की नींद सोती थी, आदत की वजह से।
वार्ड में रात की अपनी आवाज़ें होती हैं और चौथी रात तक निर्मला उन्हें पहचानने लगी थी। किसी की खाँसी। लोहे के स्टैंड का पहिया। बाहर बरामदे में चप्पलों की आवाज़, जो पास आकर मुड़ जाती है। इन सबके बीच जो एक चीज़ नहीं होती, वह पूरी ख़ामोशी है। अस्पताल कभी पूरा चुप नहीं होता।
बिजली जाती है तो जनरेटर चालू होने में कुछ सेकंड लगते हैं। तीस, चालीस, कभी उससे भी कम। इतनी देर के लिए वार्ड पूरा अँधेरा हो जाता है और फिर रोशनी लौट आती है। यह हर रात एक-दो बार होता था और अब किसी को इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता था।
उस रात बिजली गई और जनरेटर नहीं आया।
पहले तीस सेकंड तक निर्मला लेटी रही। फिर एक मिनट। फिर उसने अंदाज़ा लगाना छोड़ दिया, क्योंकि अँधेरे में समय का हिसाब लगाना मुश्किल है। वार्ड में कोई हिला नहीं। किसी ने आवाज़ नहीं लगाई। चौदह औरतें और उनके तीमारदार, सब चुप।
उसकी आँखें अँधेरे में खुलीं तो सबसे पहले उसे बिस्तर के पाए दिखे। फिर बिस्तर का किनारा। फिर उस किनारे पर कोई बैठा हुआ था, माँ की तरफ़ झुका हुआ, और उसकी पीठ निर्मला की तरफ़ थी।
उसने पहला ख़याल यही किया कि नर्स होगी। रात में नर्स आती है, चादर ठीक करती है, बोतल देखती है। निर्मला ने बिना उठे कहा कि दीदी, टॉर्च ला दीजिए। जवाब नहीं आया। वह हिला भी नहीं।
उसने दोबारा कहा, ज़रा ज़ोर से। इस बार बग़ल वाले बिस्तर की तीमारदार ने करवट ली और पूछा कि क्या हुआ। यानी उसने आवाज़ सुनी थी। पर उसने यह नहीं पूछा कि तुम किससे बात कर रही हो।
निर्मला उठकर बैठ गई। बैठने पर उसकी आँखें बिस्तर के तल से ऊपर आ गईं और अब उसे वह साफ़ दिखना चाहिए था। वह नहीं दिखा। उसने हाथ बढ़ाकर बिस्तर के किनारे को छुआ। वहाँ कोई नहीं था। चादर वहाँ से दबी हुई भी नहीं थी।
बाद में उसने कई बार यह सोचा कि उस वक़्त उसे चीख़ना चाहिए था। पर वार्ड में चौदह बीमार औरतें सो रही थीं और आदमी वहाँ चीख़ता नहीं, चाहे कुछ भी हो। यह बात उसने उसी रात सीखी। डर आदमी को चुप भी करा देता है, सिर्फ़ भगाता नहीं।
इसके चार-पाँच मिनट बाद जनरेटर चालू हो गया। ट्यूबलाइट जली और वार्ड वैसा ही था जैसा हर रात होता है। माँ सो रही थीं। बग़ल वाली तीमारदार करवट लेकर फिर सो चुकी थी। निर्मला बाक़ी रात बैठी रही और उसने माँ के पैरों पर हाथ रखे रखा।
सुबह चाय के वक़्त माँ ने आँख खोली और पहली बात यह पूछी कि वह कौन थी जो रात में उनका नाम पूछ रही थी।
निर्मला ने पूछा कि आपने बताया क्या। माँ ने कहा कि उन्हें ठीक से याद नहीं, नींद में थीं, पर शायद बता दिया। फिर उन्होंने पूछा कि तुम इतनी घबरा क्यों रही हो। निर्मला ने कहा कि वह घबरा नहीं रही।
उस दिन वह वार्ड में किसी से कुछ नहीं पूछ पाई। पूछती भी तो क्या पूछती। रात में यहाँ कोई नाम पूछने आता है क्या, यह सवाल दिन के उजाले में अपने आप बेवक़ूफ़ी लगता है। शाम तक उसने ख़ुद को यही समझाया कि माँ ने सपना देखा होगा और उसने अँधेरे में किसी की परछाईं देख ली होगी।
अगली रात बिजली उसी वक़्त के आसपास गई। इस बार निर्मला जाग रही थी और उसने उसी तरफ़ देखा। वह वहीं था, उसी तरह झुका हुआ। इस बार दूसरे बिस्तर के किनारे पर। जिस बिस्तर पर उसी दोपहर एक नई मरीज़ आई थी।
निर्मला ने माँ को जगाया और उनके कान में कहा कि कोई कुछ भी पूछे, आप जवाब मत दीजिए। माँ ने कहा कि क्यों। उसने कहा कि बस मत दीजिए। यह उसने इतनी सख़्ती से कहा कि माँ चुप हो गईं, और चुप रहीं।
चार बजे वह डॉक्टर के आने का इंतज़ार किए बिना नर्स के पास गई और कहा कि वह माँ को ले जा रही है। नर्स ने काग़ज़ पर दस्तख़त कराए और कहा कि अपनी ज़िम्मेदारी पर ले जाइए। निर्मला ने दस्तख़त कर दिए। माँ को उसने रिक्शे तक ख़ुद चलाकर पहुँचाया, क्योंकि स्ट्रेचर के लिए रुकना पड़ता।
माँ ठीक हो गईं, घर पर ही, और उन्हें दोबारा अस्पताल जाने की ज़रूरत नहीं पड़ी। उस रात की बात निर्मला ने आज तक किसी से नहीं कही, माँ से भी नहीं। सिर्फ़ एक चीज़ बदल गई। राशन की दुकान पर, बैंक में, किसी सरकारी काग़ज़ पर, जब भी कोई माँ का नाम पूछता है, निर्मला पहले बोल पड़ती है। माँ को यह बुरा लगता है और वे कहती हैं कि मुँह में ज़बान है मेरे भी। निर्मला माफ़ी माँग लेती है और अगली बार फिर पहले बोल पड़ती है।