घर सस्ते में मिल गया था, और केदार को इसी बात पर वह पसंद आया। विमला ने पूछा भी कि इतना सस्ता क्यों है। दलाल ने कहा कि गाँव के बाहर है, इसलिए। यह पूरा सच नहीं था, पर झूठ भी नहीं था। घर के बारे में बातें बहुत थीं, और वे बातें दलाल ने नहीं बताईं। केदार ने बाद में सुनीं और हँसकर टाल दीं।

दिक़्क़त फ़र्श से शुरू हुई और शुरू में वह दिक़्क़त लगी भी नहीं।

पहले जाड़े में बैठक के फ़र्श पर एक दरार आई। वह कोने से चलकर बीच तक गई और वहाँ रुक गई। नए मकानों में यह होता है। सीमेंट बैठता है और दरार आती है, और लोग उसे भर देते हैं।

केदार ने भर दी।

अगली बरसात के बाद वह उसी जगह फिर आ गई। ठीक उसी जगह, उसी लंबाई में।

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दूसरे बरस दो और आईं। एक रसोई में और एक पीछे वाले कमरे में।

केदार मिस्त्री नहीं है, पर वह ठेके पर बिजली का काम करता है और नाप-जोख उसकी आदत है। तीसरे बरस उसने वे दरारें काग़ज़ पर उतारीं।

काग़ज़ पर उतारने पर वे चार सीधी लकीरें थीं और चारों एक ही तरफ़ को जा रही थीं।

यह उसने विमला को नहीं दिखाया, क्योंकि उसे ख़ुद यह समझ नहीं आया था कि इसका मतलब क्या है।

मतलब उसे उस बरस मालूम हुआ जब उसने दरवाज़े की चौखट में लकड़ी की एक फाँक ठोंकी।

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पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा बंद नहीं हो रहा था। ऊपर से अटक रहा था। यह भी आम बात है और इसका इलाज भी आम है, चौखट में फाँक ठोंक दो या दरवाज़े का ऊपरी किनारा छील दो।

केदार ने साहुल लटकाकर देखा।

चौखट सीधी नहीं थी। वह एक तरफ़ को झुकी हुई थी, अँगुली भर।

साहुल उसने पूरे घर में लटकाया। सामने की दीवार सीधी थी। पीछे वाली नहीं थी।

घर आधा बैठ रहा था।

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यह अपने आप में डरावना नहीं है। मकान बैठते हैं। जिस ज़मीन पर वे खड़े होते हैं वह अगर एक जैसी न हो, तो एक हिस्सा दूसरे से ज़्यादा दबता है और दीवारें उसी हिसाब से चलती हैं।

सवाल यह था कि नीचे एक जैसा क्यों नहीं है।

केदार ने पीछे वाले कमरे का फ़र्श तोड़ा। उसने यह अकेले किया, इतवार को, और विमला को उसने बता दिया था।

चार अंगुल सीमेंट, फिर गिट्टी, फिर मिट्टी। दो फुट पर उसकी कुदाल किसी चीज़ से टकराई।

वह पत्थर नहीं था। पत्थर की आवाज़ अलग होती है।

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वह पक्की ईंट का चौकोर चबूतरा था, ज़मीन के भीतर, और उसकी ऊपरी सतह पर पलस्तर था। पलस्तर घिसा हुआ था, पर सीधा था। किसी ने उसे बनाया था और बनाकर छोड़ा था।

उसकी लंबाई उसने नापी। छह फुट से थोड़ी ज़्यादा।

गाँव में इस बारे में पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ी। जिनसे उसने पूछा, उन सबको मालूम था, और किसी को ठीक-ठीक नहीं मालूम था। एक ने कहा कि वहाँ पहले क़ब्रिस्तान था। दूसरे ने कहा कि क़ब्रिस्तान नहीं, बस कुछ क़ब्रें थीं, किसी बीमारी के दिनों की। तीसरे ने बरस बताया और वह बरस पहले दो लोगों के बताए बरसों से अलग था। कितनी हैं, यह किसी ने नहीं बताया, क्योंकि किसी ने गिनी नहीं थीं।

केदार ने मिट्टी वापस डाल दी और उसी दिन डाल दी।

उस रात उसने विमला से कहा कि नीचे ईंट है और वह कुछ पुरानी बुनियाद होगी।

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यह उसने सोचकर कहा था और यह उसके ख़याल से बेहतर बात थी।

जो असल में डराने वाला है, वह इसके बाद वाला हिस्सा है, और वह भूत नहीं है।

वे चबूतरे पूरी ज़मीन के नीचे थे। इसीलिए घर आधा बैठ रहा था। जिस हिस्से के नीचे चबूतरा था वह जमा हुआ था और जिसके नीचे नहीं था वह दब रहा था, और यह हर बरसात के बाद थोड़ा और होता है और कभी रुकता नहीं।

घर में उनकी सारी जमा-पूँजी लगी थी।

इसका हिसाब लगाना मुश्किल नहीं था। ज़मीन का पैसा, चिनाई का पैसा, छत का पैसा, और उसके बाद चार बरस की क़िस्तें। विमला के गहने भी उसी में थे, दो चीज़ें, और वे बिकीं नहीं थीं, गिरवी थीं। घर बिकने पर जो मिलता, उससे क़र्ज़ उतर जाता और उसके बाद जो बचता, उससे किराए के दो कमरे लिए जा सकते थे।

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अब उनके सामने दो ही रास्ते थे।

पहला यह कि वे रहते रहें और हर बरस दरारें भरते रहें, यह जानते हुए कि दस-पंद्रह बरस में पीछे वाली दीवार बाहर की तरफ़ निकल आएगी।

दूसरा यह कि वे बेच दें।

बेचने में एक बात है जो केदार ने उस पूरे बरस सोची। बेचने का मतलब है कि कोई और आएगा, और उसे भी घर सस्ते में मिलेगा, और वह भी यही पूछेगा कि सस्ता क्यों है।

विमला उन्हीं महीनों में रात को उठकर बैठने लगी थी। वह दीवार की तरफ़ देखती रहती। पूछने पर कहती कि कुछ नहीं।

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केदार ने एक बार उसे जगाया था। उसके बाद उसने कभी नहीं जगाया, क्योंकि उस बार जवाब विमला की आवाज़ में नहीं आया था।

उन्होंने घर बेच दिया।

जोगिंदर वही दलाल था जिससे उन्होंने लिया था। केदार ने उसे बुलाकर काग़ज़ दे दिए और दाम बता दिया, और दाम उन्होंने ख़रीद के दाम से भी कम रखा, क्योंकि जल्दी थी।

जोगिंदर ने कोई सवाल नहीं किया। इस तरह के दलाल करते नहीं।

पिछले जाड़े में केदार उसी सड़क से गुज़र रहा था। घर के सामने जोगिंदर खड़ा था और उसके साथ दो लोग थे, एक आदमी और एक औरत, दोनों उम्र में उन्हीं जितने। औरत कुछ पूछ रही थी और जोगिंदर जवाब दे रहा था। केदार ने गाड़ी धीमी नहीं की, पर खिड़की खुली थी और एक वाक्य उस तक पहुँच गया। गाँव के बाहर है, इसलिए।