पानी की बारी किसी के सोने-जागने के हिसाब से नहीं आती। धनुआ की बारी उस महीने रात एक बजे से चार बजे तक की थी। इसका मतलब यह था कि वह बारह बजे घर से निकलता, कुदाल कंधे पर रखता, और चार बजे तक खेत पर अकेला बैठा रहता। यह काम बैठने का ही होता है। पानी अपने आप चलता है और आदमी सिर्फ़ यह देखता है कि वह कहाँ जा रहा है।
नहर से पानी नालियों में बँटता है और हर खेत के मुँह पर एक कच्चा बाँध होता है। जिसकी बारी हो, वह अपने मुँह का बाँध काट देता है और बाक़ी सबके बंद रहते हैं। पूरा हिसाब इसी पर टिका है। इसीलिए इस पर सबसे ज़्यादा झगड़े भी होते हैं, और गाँव में दो घर ऐसे हैं जो पिछली दो पीढ़ियों से एक-दूसरे से बात नहीं करते।
उस रात कोहरा नहीं था। अगहन की ठंड ज़रूर थी। धनुआ ने अपने खेत का मुँह खोला और पानी चलने लगा। वह मेड़ पर बैठ गया और उसने बीड़ी सुलगाई। पानी की आवाज़ के अलावा कुछ नहीं था। इस काम की यही एक अच्छी बात है और यही एक बुरी बात भी।
आधे घंटे बाद उसे लगा कि पानी कम पड़ रहा है। यह होता है, जब ऊपर कोई अपना बाँध काट ले। धनुआ उठा और नाली के साथ-साथ ऊपर की तरफ़ चला। तीन खेत छोड़कर उसे पता चल गया कि पानी कहाँ जा रहा है।
वह सुकई का खेत था। सुकई नौ साल पहले मर चुका था और उसके बाद उस ज़मीन पर कोई नहीं आया, क्योंकि मुक़दमा चलता रहा और फिर लोग भूल गए। खेत में अब बस झाड़ी थी। उसके मुँह का बाँध कटा हुआ था और पानी अंदर जा रहा था।
धनुआ ने चारों तरफ़ टॉर्च घुमाई। कोई नहीं था। मेड़ पर कीचड़ था और कीचड़ में निशान थे, दो घुटनों के, वहीं जहाँ बैठकर आदमी बाँध काटता है। निशान ताज़े थे। उनमें पानी अभी भरना शुरू ही हुआ था।
उसने बाँध बंद किया। मिट्टी खींचकर। हाथ से दबाकर। जैसे सब करते हैं। फिर वह वापस अपने खेत पर आ गया और बैठ गया। उसका मन कहता रहा कि किसी ने मज़ाक किया है और मज़ाक करने वाला अभी झाड़ी में कहीं छिपा बैठा है।
बीस मिनट बाद पानी फिर कम हुआ।
इस बार वह दौड़कर गया। बाँध फिर कटा हुआ था। उसी जगह से। उसी तरह। कीचड़ में घुटनों के निशान फिर बने हुए थे और इस बार उनके पास हथेली का एक निशान भी था। धनुआ ने अपनी हथेली उसके पास रखकर देखी। वह निशान उसकी हथेली से छोटा था।
धनुआ ने सोचा कि घर चला जाए। बारी छोड़ने का मतलब होता कि पूरे महीने का पानी गया। गेहूँ बोया जा चुका था और पहला पानी सबसे ज़रूरी होता है। बोने के बाद पहला पानी न मिले तो आगे कुछ नहीं बचता। वह नहीं गया।
उसने दोबारा बाँध बंद किया और इस बार वह लौटा नहीं। वह सुकई के खेत की मेड़ पर ही बैठ गया, बाँध से दस क़दम दूर, टॉर्च बंद करके, ताकि जो भी आए उसे दिखाई न दे कि कोई बैठा है।
वह डेढ़ घंटा उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में सबसे लंबा पाया। ठंड बढ़ती गई। पानी अपने रास्ते पर बहता रहा। दो बार कोई जानवर झाड़ी में हिला और दोनों बार वह उछलकर खड़ा हो गया। तीन बजने से कुछ पहले उसे नींद जैसा कुछ आने लगा और उसने अपनी जाँघ पर चिकोटी काटी।
उसी वक़्त पानी की आवाज़ बदली। यह वह आवाज़ थी जो बाँध कटने पर आती है, गिरने की, फैलने की। धनुआ ने टॉर्च जलाई और उसकी रोशनी सीधे बाँध पर डाली। बाँध कट चुका था और पानी अंदर जा रहा था। मेड़ पर कोई नहीं था। घुटनों के निशान ताज़े थे और उनमें अभी पानी नहीं भरा था।
दस क़दम की दूरी है। उसके और बाँध के बीच में न झाड़ी थी, न मोड़, न कुछ और। वह उस तरफ़ देख रहा था, आँख झपकाए बिना, और उसने कुछ नहीं देखा। यही वह चीज़ थी जिसने उसे तोड़ दिया। न आवाज़। न परछाईं। सिर्फ़ यह कि काम हो गया और करने वाला नहीं दिखा।
उसने टॉर्च बंद नहीं की। रोशनी बाँध पर पड़ी रही और पानी उसी रोशनी में चमकता रहा। टॉर्च की रोशनी बाँध पर टिकी नहीं रह पा रही थी, और धनुआ को यह भी मालूम था कि इसकी वजह बाँध नहीं है।
वह वहीं मेड़ पर बैठ गया और उसने बाँध तीसरी बार नहीं बाँधा। पानी उस खेत में जाता रहा। चार बजे उसकी बारी ख़त्म हुई और उसने ऊपर वाले को आवाज़ लगा दी कि पानी ले लो। अपने खेत में उस रात उसे आधा पानी भी नहीं मिला।
घर पहुँचकर उसने यह बात किसी को नहीं बताई, और आज तक नहीं बताई। अगली बारी में वह फिर गया और उसके बाद हर बारी में जाता रहा, क्योंकि पानी की बारी छोड़ी नहीं जाती। हर बार वह अपना बाँध खोलता है और फिर, बिना किसी से पूछे, सुकई वाले खेत का मुँह भी थोड़ा-सा खोल देता है।
उस खेत में अब भी कोई कुछ नहीं बोता। पर वह इलाक़े का अकेला खेत है जो जेठ में भी हरा रहता है, और उसकी झाड़ी बाक़ी सबसे ऊँची हो चुकी है। लोग कहते हैं कि नीचे पानी होगा। धनुआ यह बात सुनता है और सिर हिला देता है।