वह घर पैंतीस साल से बंद पड़ा था और उसका ताला कभी नहीं बदला गया। गली के बच्चे उसके सामने से दौड़कर निकलते थे। बड़े लोग धीरे चलते थे, पर उधर देखते नहीं थे। नौशाद को यह सब बचपन से अखरता था। उसे यक़ीन नहीं था कि वहाँ कुछ है। उसे यह भी यक़ीन नहीं था कि वहाँ कुछ नहीं है। यही बात उसे सबसे ज़्यादा परेशान करती थी।

गली में उस मकान के बारे में जो कहा जाता था, वह हर घर में अलग था। किसी ने कहा कि वहाँ आग लगी थी। किसी ने कहा कि झगड़ा हुआ था और मुक़दमा आज तक चल रहा है। एक बात सब जगह एक जैसी थी। किसी ने यह नहीं कहा कि वह ख़ुद अंदर गया है।

नौशाद पैंतीस साल में पहला आदमी नहीं था जिसने अंदर जाने की सोची हो। पर बाक़ी लोग ताले पर आकर रुक जाते थे। नौशाद ने ताले को हाथ भी नहीं लगाया। पीछे की तरफ़ एक रोशनदान था जिसकी जाली गल चुकी थी, और उसके नीचे नीम का पेड़ खड़ा था। वह उसी से चढ़ा।

अंदर उसे वह नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी। बदबू नहीं थी। जाले थे, पर उतने नहीं जितने पैंतीस साल में हो जाने चाहिए। और सबसे पहली चीज़ जो उसने महसूस की, वह यह थी कि अंदर हवा चल रही है। बंद मकान में हवा नहीं चलती।

फ़र्श पर धूल थी और उस धूल में एक रास्ता बना हुआ था। सामने वाले दरवाज़े से चौके तक, चौके से पिछले कमरे तक, और वहाँ से वापस। रास्ता चौड़ा नहीं था, एक आदमी भर का, और उसके दोनों किनारे साफ़ थे, इस तरह जैसे रोज़ उसी लकीर पर चला गया हो।

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नौशाद उस रास्ते पर नहीं चला। वह उसके बग़ल से चला, धूल में अपने पैर रखते हुए, और उसे यह करते हुए ख़ुद पर हँसी भी आई। फिर हँसी आनी बंद हो गई, क्योंकि उसे समझ में आ गया कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। वह अपने निशान उन निशानों में मिलाना नहीं चाहता था।

चौके में चूल्हा था और चूल्हे में राख। नौशाद ने उसमें उँगली डाली। राख भुरभुरी थी। पैंतीस साल पुरानी राख जमकर पत्थर हो जाती है, ख़ासकर जहाँ ऊपर से पानी टपकता हो। यह राख उँगली से बिखर गई।

लोटे में पानी था और उस पर काई नहीं थी। खाट पर बिछा कपड़ा बीच से दबा हुआ था, उस तरह जैसे कोई उस पर लेटता हो और रोज़ लेटता हो। दीवार में गड़ी खूँटी पर एक कमीज़ टँगी थी। नौशाद ने उसे छुआ नहीं। पर उसे इतना दिख गया कि वह सूखी है।

यहाँ तक उसने अपने आपसे यही कहा कि कोई रहता होगा। कोई बेघर आदमी, कोई मुसाफ़िर, जो रात को यहाँ आ जाता है और सुबह चला जाता है। यह बात हर चीज़ को समझा देती थी। यह अच्छी बात थी और नौशाद उसे मानना चाहता था, इसलिए वह पिछले कमरे तक गया, ताकि वहाँ भी वही मिले।

पिछले कमरे में धूल ज़्यादा थी, क्योंकि वहाँ रोशनदान से आती हवा नहीं पहुँचती। इसलिए वहाँ निशान साफ़ थे। नंगे पैर के निशान। वे कमरे के अंदर आते थे और दीवार के पास जाकर रुक जाते थे।

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नौशाद ने उन्हें गिना। फिर उसने उल्टी तरफ़ से गिना, इसलिए नहीं कि गिनती से कुछ बदलता, बल्कि इसलिए कि उस वक़्त उसे कुछ और करना नहीं आ रहा था। अंदर आने वाले निशान थे। बाहर जाने वाले नहीं थे।

उसने दीवार की तरफ़ देखा जहाँ निशान ख़त्म होते थे। वहाँ कुछ नहीं था। पक्की दीवार थी, उस पर पुराना चूना था, और चूने पर कहीं कोई दरार नहीं थी। उस कमरे में सिर्फ़ एक दरवाज़ा था और वह वही था जिससे वह अभी-अभी अंदर आया था।

उसने भागने के लिए रास्ता सोचा और तभी उसे वह बात याद आई जो उसे पहले ही याद आ जानी चाहिए थी। रोशनदान इसी कमरे के ऊपर था। जिस रास्ते से वह अंदर आया था, वह इसी कमरे में से होकर जाता था, दीवार के पास से, वहीं से जहाँ निशान ख़त्म होते हैं।

वह पीछे हटता हुआ बाहर वाले कमरे में आ गया और उसने उस कमरे की तरफ़ दोबारा नहीं देखा। सामने वाला दरवाज़ा बाहर से बंद था। उसका ताला पैंतीस साल से नहीं खुला था और गली से हर आदमी उसे रोज़ देखता था। नौशाद फिर भी उस तक गया, इस उम्मीद से नहीं कि वह खुलेगा, बल्कि इसलिए कि आदमी बंद दरवाज़े को भी एक बार खींचकर देख लेता है।

दरवाज़ा खुला हुआ था। चौखट से हटा हुआ, अंदर की तरफ़, इतना कि एक आदमी सीधा निकल जाए। बाहर गली में दोपहर की धूप थी और सामने वाले घर की औरत छत पर कपड़े डाल रही थी। नौशाद बाहर निकला और उसने दरवाज़े को हाथ नहीं लगाया।

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उस घर से निकलने के बाद नौशाद कभी वैसा नहीं हुआ जैसा पहले था। वह रात में लालटेन जलाकर सोता था। खाना कम खाता था। लोग पूछते कि अंदर क्या था, और वह सिर हिला देता। एक बार उसकी बहन ने ज़ोर दिया, तो उसने कहा कि अंदर कोई नहीं था। बहन ने पूछा, फिर डर किस बात का। नौशाद चुप रहा। उस घर का दरवाज़ा आज भी खुला पड़ा है, और गाँव में कोई उसे बंद करने नहीं जाता।