उस गाँव में हवा का एक मौसम था, जिसे लोग बाकी मौसमों में नहीं गिनते थे। साल में एक बार, हमेशा उसी हफ़्ते, एक आँधी आती थी। आम आँधी नहीं। उसके आने से पहले दरवाज़े अपने आप खुलने लगते। रात को आवाज़ें आतीं। और कभी-कभी कोई आदमी गायब हो जाता। गाँव वाले उसे भूतिया आँधी कहते थे, और उस हफ़्ते किसी के घर मेहमान नहीं आते थे।

वह आँधी हर बरस उसी हफ़्ते आती थी और यह कोई रहस्य नहीं है।

गाँव एक घाटी के मुँह पर बसा है। ऊपर की तरफ़ पहाड़ी दो हिस्सों में बँटी है और उनके बीच एक दर्रा है। जेठ के आख़िर में जब मैदान की ज़मीन तपकर हल्की हो जाती है और ऊपर की हवा ठंडी रहती है, तो हवा उसी दर्रे से नीचे उतरती है, और उतरते हुए तंग जगह से गुज़रने पर तेज़ हो जाती है।

यह हर बरस होता है, क्योंकि गरमी हर बरस उसी हफ़्ते में उस हद तक पहुँचती है।

गाँव में यह बात इस तरह नहीं कही जाती थी। वहाँ यह कहा जाता था कि आँधी अपने दिन पर आती है।

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दोनों बातों का मतलब एक ही है। एक में वजह है और दूसरी में नहीं, और दोनों से एक ही तैयारी होती है।

तैयारी यह थी कि उस हफ़्ते सब लोग स्कूल में जमा हो जाते।

स्कूल गाँव की इकलौती पक्की इमारत थी। एक लंबा कमरा, ईंट की दीवारें, और ऊपर टीन की चादरें, जो लोहे के गार्डरों पर कसी हुई थीं।

यह तैयारी तीस बरस से चल रही थी और इसमें कभी कुछ नहीं हुआ था।

तीस बरस में कुछ न होना अपने आप में एक चीज़ है और गाँव उसे सबूत मानता है। यह ग़लत भी नहीं है। जो तरीक़ा तीस बरस चला हो, उसे बदलने के लिए तीस बरस से बड़ी कोई वजह चाहिए, और ऐसी वजह किसी के पास कभी नहीं होती।

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स्कूल में जगह भी अच्छी थी। एक सौ बीस लोग बैठ जाते थे और बच्चों के लिए बेंच थीं।

रामसजीवन ने चार बरस पहले छत पर चढ़कर उन चादरों को देखा था, किसी और काम से।

चादरें उन्नीस थीं और उनमें से ग्यारह पर ठोंकने वाले पेच ढीले थे। दो जगह पेच थे ही नहीं और वहाँ तार बाँधा हुआ था।

उसने यह प्रधान को बताया था। प्रधान ने कहा था कि लिखवा दो, और उसने लिखवा दिया, और वह काग़ज़ ब्लॉक तक गया और वहीं रहा।

टीन की चादर हवा में क्या करती है, यह रामसजीवन जानता था, क्योंकि उसके अपने छप्पर की एक चादर छह बरस पहले उड़ चुकी थी।

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वह उड़ती नहीं। वह ऊपर उठती है, क्योंकि उसके ऊपर से बहती हवा नीचे वाली हवा से तेज़ होती है और उसे खींचती है। फिर वह किनारे से मुड़ती है और तब वह चलती है, और चलती हुई टीन की चादर किसी को भी काट सकती है।

उसने अपनी उड़ी हुई चादर बाद में ढूँढ़ी थी। वह अस्सी क़दम दूर, नीम के तने में आधी धँसी हुई मिली थी। तना उतना मोटा था जितना आदमी की कमर।

इस बरस आँधी अपने दिन पर आई।

शाम को दरवाज़े बजने लगे और लोग स्कूल की तरफ़ चलने लगे। रामसजीवन उसी रास्ते पर खड़ा हो गया।

उसने कहा कि भीतर मत जाओ। खेत में चलो।

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खेत गाँव के पीछे है, खुला, और उसमें कुछ नहीं है। न पेड़, न खंभा, न छत।

यह सही बात है और इसे मानना बहुत मुश्किल है।

आदमी आँधी में छत के नीचे जाना चाहता है। यह उसका दिमाग़ नहीं सोचता, यह उसका शरीर करता है। खुले में खड़े रहने के लिए उसे अपने ही भीतर से लड़ना पड़ता है।

तीन आदमियों ने उससे बहस की और उनकी बात में दम था। बारिश भी आ सकती है। बच्चे हैं। बूढ़े हैं। और तीस बरस से कुछ नहीं हुआ।

रामसजीवन के पास तीस बरस का जवाब नहीं था। उसके पास ग्यारह ढीले पेच थे और वह काग़ज़ जो ब्लॉक में पड़ा था।

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उसने वही कहा जो उसके पास था।

आधे लोग खेत गए और आधे स्कूल में रहे।

बँटवारा किसी सोच से नहीं हुआ। जो लोग रामसजीवन के पास खड़े थे, वे उसके साथ चले गए। जो आगे निकल चुके थे, वे भीतर चले गए। उसके अपने घर के लोग स्कूल में थे, क्योंकि वे पहले पहुँच गए थे और उन्हें ख़बर नहीं थी।

आँधी सवा घंटा चली। पूरे सवा घंटे।

स्कूल की छत की सात चादरें उठीं। पाँच पीछे वाले मैदान में गिरीं। दो सामने आईं और उनमें से एक बरामदे के खंभे से टकराकर रुक गई।

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भीतर बैठे लोगों पर कुछ नहीं गिरा, क्योंकि गार्डर अपनी जगह रहे और उनके नीचे कोई नहीं था।

खेत में खड़े लोगों पर भी कुछ नहीं गिरा।

किसी को कुछ नहीं हुआ। एक को भी नहीं।

इस पूरे क़िस्से का वज़न यहीं है।

अगले दिन गाँव में जो बात चली, वह यह थी कि रामसजीवन ने आधे गाँव को सवा घंटा खुले खेत में बारिश और आँधी में खड़ा रखा।

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यह बात झूठी नहीं थी। बिलकुल सच थी।

उसने पेचों की बात कही और लोगों ने सुनी और फिर वे उसी बात पर लौट आए कि कुछ हुआ तो नहीं।

जो नहीं होता, उसका कोई सबूत नहीं होता।

ब्लॉक से आदमी आया और छत की मरम्मत हुई। उस बरस के बाद स्कूल पर पक्की छत डाल दी गई, क्योंकि टीन उड़ चुका था और नई टीन के पैसे और पक्की छत के पैसे में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं था।

अब वह इमारत सचमुच सुरक्षित है। पहले नहीं थी।

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अगले बरस आँधी अपने दिन पर आई और पूरा गाँव स्कूल में गया।

रामसजीवन भी गया। सबके साथ।