वह घर बरसों से बंद था और उसकी छत का आधा हिस्सा गिर चुका था। गाँव में उसके बारे में कहानियाँ थीं, और हर कहानी अलग थी, जो अपने आप में एक बात कह देती थी। कमलेश को इनमें से किसी पर यक़ीन नहीं था। वह रोमांच के पीछे भागने वाला लड़का था। एक शाम उसने कह दिया कि आज रात वह उसी घर में सोएगा, और सुनने वालों को लगा कि वह मज़ाक कर रहा है।
वह उसी रात गया। कोई उसे रोकने नहीं आया, हालाँकि दो लड़के मोड़ तक साथ आए और वहीं से लौट गए।
बात चाय की दुकान पर शुरू हुई थी। किसी ने कहा कि उस घर में रात कोई नहीं काट सकता, और कमलेश ने पूछा कि क्यों नहीं। इस पर तीन आदमियों ने तीन अलग वजहें बताईं, और तीनों आपस में मेल नहीं खाती थीं। कमलेश को यह बात मज़ेदार लगी।
साथ में उसने एक दरी ली, एक कंबल, और टॉर्च। खाना खाकर गया था। यह सब उसने बताकर किया, इसलिए कि बाद में कोई यह न कहे कि वह गया ही नहीं था।
घर के भीतर वही था जो ऐसे घरों में होता है। मलबा, चमगादड़ की गंध, और एक कमरा जिसकी छत पूरी बची हुई थी। बाक़ी आधे हिस्से की छत गिर चुकी थी और वहाँ से आसमान दिखता था।
उसने दरी उसी कमरे में बिछाई जिसकी छत बची थी।
नौ बजे से तीन बजे तक उसने जो सुना, वह सब सुनाई देने लायक़ चीज़ें थीं। चमगादड़ छत के भीतर से निकलते और लौटते रहे। दो बार कोई जानवर बाहर मलबे पर से गुज़रा, शायद बिल्ली। और हवा चलने पर आधी गिरी छत की एक लटकती बल्ली हिलती थी, जिससे मिट्टी झरती रहती थी, रुक-रुक कर, पूरी रात। यह आख़िरी आवाज़ सबसे बुरी थी। डरावनी वह नहीं थी। वह बस रुकती नहीं थी।
रात के तीन बजे तक कुछ नहीं हुआ। यह उसे बाद में बहुत बार दोहराना पड़ा और हर बार लोग इसी जगह पर उससे कुछ और सुनना चाहते थे।
तीन बजे के बाद जो हुआ वह यह था कि छत का एक हिस्सा गिरा।
बचा हुआ हिस्सा भी बचा हुआ नहीं था, बस अभी गिरा नहीं था। पुरानी छत में लकड़ी की बल्लियाँ होती हैं और उन पर मिट्टी। मिट्टी बरसात में भारी हो जाती है और बल्ली धीरे-धीरे झुकती है, और एक रात वह टूट जाती है।
कमलेश उस वक़्त जाग रहा था। आवाज़ पहले आई। चटकने की। वह समझा नहीं कि क्या है, पर उठ खड़ा हुआ, और खड़े होते ही भागा। दरवाज़े से निकलते ही पीछे धमाका हुआ और धूल का एक बादल उसके साथ बाहर आया।
वह मलबे से चार क़दम दूर था। इससे ज़्यादा कुछ नहीं।
बाहर अँधेरा था और धूल में कुछ दिख नहीं रहा था। वह वहीं बैठ गया। साँस लौटने में देर लगी।
सुबह वह गाँव लौटा, धूल में लिपटा हुआ, और उसने सबको बता दिया कि क्या हुआ था। उसने पूरी बात बताई, शुरू से आख़िर तक, बिना कुछ छोड़े।
पहले दिन लोगों ने सुना। दूसरे दिन उनमें से कुछ ने दोबारा पूछा। तीसरे दिन सवाल बदल गए।
अब उससे यह पूछा जाने लगा कि छत गिरने से पहले उसने कुछ सुना था क्या। उसने कहा कि हाँ, बल्ली चटकी थी। पूछने वाले ने कहा कि वह नहीं, उससे पहले कुछ।
कमलेश ने कहा कि उससे पहले कुछ नहीं था। यह जवाब किसी के काम नहीं आया।
कुछ महीनों में गाँव में जो बात चलने लगी वह यह थी कि उस रात छत अपने आप नहीं गिरी। साल भर में इसमें यह भी जुड़ गया कि लड़के ने कुछ देखा था और वह बताता नहीं।
गाँव को उस घर की ज़रूरत थी और यह किसी ने तय करके नहीं किया था। बच्चों को रात में बाहर न निकलने की एक वजह चाहिए। लड़कों को हिम्मत दिखाने की एक जगह चाहिए। और जो ज़मीन बरसों से ख़ाली पड़ी हो, उसके बारे में सवाल न उठें, इसके लिए भी एक कहानी काम आ जाती है।
उसका इनकार भी कहानी का हिस्सा बन गया। यह सबसे अजीब बात थी। जितनी बार वह कहता कि कुछ नहीं हुआ, उतनी बार लोग यह मानते कि ज़रूर कुछ हुआ है।
वह घर उसके तीन साल बाद पूरा गिर गया, एक बरसात में, और उसकी ईंटें कई घरों में लग गईं।
जगह ख़ाली है और वहाँ अब कुछ नहीं है। कहानियाँ फिर भी हैं, और वे बढ़ती जा रही हैं, क्योंकि कहानी को जगह की ज़रूरत नहीं होती।
कमलेश उस वक़्त उन्नीस का था। अब वह उनतालीस का है और उसी गाँव में है। बीच के बरसों में उसने अपनी बात सैकड़ों बार दोहराई, फिर दोहराना छोड़ दिया। दोहराने से एक ही चीज़ पक्की होती जाती थी, और वह उसकी वाली नहीं थी।
पिछले साल एक बाहर से आए आदमी ने कमलेश को चाय की दुकान पर वही कहानी सुनाई। उसमें एक लड़का उस घर में सोया था और उसने रात में कुछ देखा था और उसके बाद वह कभी ठीक नहीं रहा। सुनाने वाले को यह नहीं मालूम था कि वह किसे सुना रहा है। कमलेश ने उसे टोका नहीं। उसने चाय ख़त्म की और पैसे रखकर उठ गया। टोकने का नतीजा उसे बीस साल पहले मालूम हो चुका था।