कुएँ की सफ़ाई का काम बुधराम करता था और उस इलाक़े में यह काम करने वाला वही एक था।
यह हुनर नहीं है। यह वह काम है जो कोई और नहीं करता, इसलिए किसी एक के पास रह जाता है। बुधराम के बाप ने किया था और उससे पहले उसके बाप ने।
ऊपर खड़े लोगों को लगता है कि नीचे बस अँधेरा है और कीचड़ है।
नीचे जो चीज़ मारती है वह दिखती नहीं और उसकी गंध भी नहीं आती। पुराने कुएँ में, जिसका पानी बरसों से नहीं निकाला गया, तली के पास की हवा बदल जाती है। साँस लेने लायक़ नहीं रहती। आदमी को इसका पता तब चलता है जब उसे पता चलने लायक़ कुछ नहीं बचता।
इसीलिए उतरने से पहले एक चीज़ की जाती है।
रस्सी से एक जलती लालटेन नीचे उतारी जाती है और तली के पास रोककर देखी जाती है। लौ अगर वैसी ही जलती रहे तो हवा ठीक है। लौ अगर छोटी होकर बुझ जाए तो नीचे कोई नहीं जाता, चाहे कुछ भी हो।
यह तरीक़ा बुधराम ने अपने बाप से सीखा था और उसने उसे कभी नहीं छोड़ा था।
उस बरस अगहन में गाँव के बीच वाला कुआँ साफ़ होना था। शादियों का मौसम सामने था और तीन घरों में काम था।
बुधराम के साथ उस दिन उसका बेटा ननकू था। सत्रह का। पहली बार।
पहली बार का मतलब यह नहीं था कि वह देखने आया था। इस काम में दो आदमी चाहिए ही होते हैं। एक नीचे और एक ऊपर, और ऊपर वाले का काम भी कम नहीं है। उसे रस्सी सँभालनी होती है, बाल्टी खींचनी होती है, और सबसे ज़रूरी यह कि नीचे वाले की आवाज़ सुनते रहना होता है। ननकू को ऊपर का काम आता था। उसने अपने बाप के साथ यह चार बरस से किया था। नीचे वह पहली बार जाने वाला था, और उस दिन नहीं गया।
लालटेन उस दिन नहीं थी।
लालटेन पंचायत घर में रहती है और वह दो महीने पहले किसी को दे दी गई थी। किसने ली थी, यह उस सुबह किसी को याद नहीं आया। पूछा गया, दो घरों में देखा गया, और फिर बात आगे बढ़ गई।
बुधराम ने कहा कि वह मशाल से देख लेगा।
उसने एक कपड़े में तेल डालकर उसे रस्सी से बाँधा और नीचे उतारा। वह जलती रही।
इसमें एक ख़राबी है और बुधराम को वह मालूम थी। मशाल की लौ बड़ी होती है और वह अपने साथ ऊपर की हवा खींचती रहती है, इसलिए वह वहाँ भी जल सकती है जहाँ लालटेन की छोटी लौ बुझ जाती।
उसने यह ननकू को बता भी दिया। फिर वह उतरा।
वह चौबीस फुट नीचे गया और वहाँ से उसने एक बार ऊपर देखा और हाथ हिलाया।
इसके बाद नीचे से कोई आवाज़ नहीं आई।
ऊपर खड़े लोगों को यह पहले दो मिनट में समझ नहीं आया, क्योंकि नीचे काम शुरू होने पर आदमी बोलता नहीं, वह खोदता है और आवाज़ कीचड़ की आती है।
तीसरे मिनट में आवाज़ आनी बंद हो गई।
ननकू ने रस्सी हिलाई। जवाब नहीं आया। उसने नाम लेकर पुकारा। जवाब नहीं आया।
फिर वह मुँडेर पर पैर रखकर खड़ा हो गया।
यहाँ पर वह हुआ जो इस कहानी का असली हिस्सा है और जिसके बारे में गाँव में आज तक साफ़-साफ़ कुछ नहीं कहा गया।
ननकू नीचे नहीं गया।
वह मुँडेर पर पंद्रह-बीस सेकंड खड़ा रहा और फिर उतरकर पीछे हट गया, और उसने चिल्लाकर कहा कि रस्सी खींचो।
जो लोग वहाँ खड़े थे, उनमें से चार ने उसे नीचे जाने के लिए कहा था। यह उन्होंने बुरी नीयत से नहीं कहा था। ऊपर खड़े आदमी को नीचे की हवा दिखती नहीं है और उसे यही दिखता है कि एक आदमी नीचे पड़ा है और उसका बेटा ऊपर खड़ा है।
ननकू को जो दिखता था, वह यह था कि उसका बाप बोल नहीं रहा है, और जिस चीज़ ने उसे चुप कराया है वह अभी वहीं है।
ऐसे कुओं में मरने वालों में सबसे ज़्यादा वे होते हैं जो बचाने उतरते हैं। यह बात बुधराम उसे तीन बार बता चुका था।
रस्सी बुधराम की कमर में बँधी थी और यह भी उसके बाप का सिखाया हुआ था।
आठ आदमियों ने खींचा और उसमें चार मिनट लगे, क्योंकि खींचते वक़्त शरीर दीवार से टकराता है और अटकता है।
बुधराम ऊपर आया तो वह बेहोश था। उसके नाक और कान से ख़ून बह रहा था और उसका कुरता सामने से भीगा हुआ था।
ख़ून की वजह भी वही थी। साँस बंद होने पर भीतर का दबाव नाक के भीतर की बारीक नसें तोड़ देता है।
वह उसी रात होश में आ गया। तीन दिन उसे सिर दर्द रहा। उसके बाद वह ठीक हो गया।
गाँव में इसे लेकर ननकू से किसी ने कभी बात नहीं छेड़ी।
सामने किसी ने नहीं छेड़ी। पर उस बरस के बाद जब भी उस रात का ज़िक्र आया, बात एक ही जगह पर आकर रुकी। लड़का ऊपर खड़ा रहा।
बुधराम ने ख़ुद कभी यह बात नहीं उठाई और एक बार, चार-पाँच बरस बाद, किसी ने उसके सामने यह कह दिया। बुधराम ने उस आदमी की तरफ़ देखा और कहा कि लड़के ने ठीक किया, और फिर वह उठकर चला गया।
लालटेन तीन हफ़्ते बाद लौट आई। जिस घर में थी, वहाँ से एक लड़का उसे रखकर चला गया और उसने यह भी नहीं बताया कि किसकी थी।
अब ननकू यह काम करता है और वह लालटेन के बिना नहीं उतरता।
वह कुआँ अगले बरस पाट दिया गया। गाँव में नल आ गया था और खुले कुएँ में बच्चे गिरते हैं, इसलिए पंचायत ने उसे भरवा दिया। ऊपर अब चबूतरा है और उस पर लोग शाम को बैठते हैं।