गाँव का नाम शांतिपुर था, और यह नाम किसी मज़ाक जैसा लगता था। गाँव के किनारे एक कब्रिस्तान था, जो गाँव से भी पुराना था। उसके बीचोंबीच एक दरवाज़ा खड़ा था। दीवार नहीं थी। कमरा नहीं था। बस एक दरवाज़ा, पत्थर का, जो कहीं नहीं खुलता था। लोग उसके पास से नहीं गुज़रते थे। कोई यह भी नहीं बता पाता था कि वह वहाँ आया कहाँ से।
तिलकू सत्रह का था और उसका काम घास थी। कब्रिस्तान की घास पर किसी का दावा नहीं था। बकरियाँ वहाँ नहीं जातीं और चरवाहे दीवार के भीतर नहीं घुसते, इसलिए जेठ की सूखी दोपहरों में भी वहाँ हरा बचा रहता था। तिलकू सुबह हँसिया लेकर जाता, कब्रों के बीच की पट्टियों से दो गट्ठर काटता, और शाम को उन्हें बस्ती में बेच आता। बारह रुपये गट्ठर। यह काम गाँव में किसी और ने नहीं लिया था, इसीलिए उसे मिला था।
जाड़े की रातों में चौपाल पर सबसे ज़्यादा वही बोलता था। लड़के उससे कहानियाँ सुनने बैठते और वह सुनाता, बिना रुके, आधी रात तक। उसे डर नहीं लगता था और वजह मामूली थी। जिस जगह से पूरा गाँव डरता था, वह वहाँ रोज़ जाता था।
फिर भी एक काम वह भी नहीं करता था। दरवाज़े को छूता नहीं था। यह नियम कहीं लिखा हुआ नहीं था, पर वह भी उसके पास से दो क़दम हटकर निकलता था, बाक़ी सबकी तरह। पत्थर की उस बाहरी सतह पर कुछ नहीं था। न नक्काशी, न नाम, न कोई खरोंच।
शब-ए-बरात से दो दिन पहले कासिम चाचा उसे बुलाते थे। साल में वही एक काम था जिसमें घास काटी नहीं, हटाई जाती थी, क्योंकि उस रात हर कब्र नंगी दिखनी चाहिए और उस पर दिया रखने की जगह होनी चाहिए। तिलकू दो दिन लगाता और डेढ़ सौ रुपये पाता। उस रात कब्रिस्तान साल भर में एक बार भरता था। औरतें मोमबत्तियाँ लातीं, आदमी दीवार के पास बैठे रहते, बच्चों में हलवा बँटता। दियों की क़तार दीवार से शुरू होती और बीच तक पहुँचकर रुक जाती। दरवाज़े तक कोई दिया नहीं जाता था।
आधी रात के बाद लोग लौटने लगे। तिलकू रुका रहा, क्योंकि उसका हँसिया दीवार के पास पड़ा था और सुबह गट्ठर भी उठाने थे। जाते-जाते एक लड़का, जो उससे तीन साल छोटा था, पीछे मुड़कर बोला कि उसके दादा कहते थे कि वह दरवाज़ा खुलता है, बस खींचने वाला चाहिए। तिलकू हँस दिया। चौपाल पर वह इस दरवाज़े की कहानी छह बार सुना चुका था और छहों बार अलग सुनाई थी। यह बात अब तक किसी के मन में नहीं आई थी कि सुनाने वाले ने उसे ख़ुद कभी छुआ है या नहीं। उस रात आ गई।
दिये अब भी कहीं-कहीं जल रहे थे और उतनी रोशनी काफ़ी थी। तिलकू बीच तक गया। दरवाज़ा उसकी छाती जितना चौड़ा था और उससे एक हाथ ऊँचा। उसने दोनों हथेलियाँ पत्थर पर रखीं और खींचा। वह खुल गया। इतनी आसानी से कि तिलकू का अपना वज़न पीछे चला गया और वह ख़ुद को सँभालने में लगा रहा। दरार एक बालिश्त की थी।
उसमें से हवा आई, ठंडी नहीं, बासी, और उसमें एक गंध थी जो उसे पहचानी लगी। पुराने काग़ज़ पर जमी धूल। फिर पत्थर उसके हाथों के नीचे भारी हो गया, जैसे दूसरी तरफ़ किसी ने उसे थाम लिया हो। तिलकू ने हाथ छोड़े और भागा। दरवाज़ा वहीं रह गया, उतना ही खुला।
अगले दिन वह हँसिया लेने भी नहीं गया। तीसरे दिन गया, दोपहर में, और दरार वहीं थी। एक बालिश्त। न ज़्यादा, न कम, जबकि बीच में एक रात ऐसी आँधी चली थी जिसने बस्ती के दो पेड़ गिरा दिए थे। घास भी बदल गई। दीवार के भीतर बकरियाँ पहले भी नहीं जाती थीं, पर अब वे बाहर वाली पट्टी भी छोड़ने लगीं, और चालीस साल से बकरियाँ चराने वाला आदमी इसकी कोई वजह नहीं बता सका। तिलकू के कपड़ों में से हफ़्ते भर वही गंध आती रही। उसकी माँ ने दो बार पूछा कि उसने संदूक कहाँ खोला था।
तिलकू गाँव के बुज़ुर्गों के पास गया। ज़्यादातर ने बात टाल दी। सिर्फ़ बदलू काका इतना बोले कि उनके दादा के ज़माने में भी वह दरवाज़ा वहीं खड़ा था, और तब भी कोई उसके पास नहीं जाता था। इससे आगे वे उठकर अंदर चले गए।
अगली दोपहर तिलकू दिन के उजाले में कब्रिस्तान गया। इस बार उसने दरवाज़े को ध्यान से देखा। कब्ज़े अंदर की तरफ़ थे। दरवाज़ा बाहर से बंद किया गया था, अंदर से नहीं। और पत्थर की भीतरी सतह पर खरोंचें थीं। बहुत सारी। सब एक ही ऊँचाई पर, जहाँ किसी के हाथ पहुँचते हैं।
रात भर तिलकू को नींद नहीं आई। खरोंचें आँखों के सामने घूमती रहीं। दरवाज़ा किसी को बाहर रखने के लिए नहीं बनाया गया था। वह किसी को अंदर रखने के लिए बनाया गया था। और उसने उसे खोल दिया था। सुबह वह फिर बदलू काका के घर पहुँचा। इस बार दरवाज़ा नहीं खुला। खिड़की के पीछे से उनकी आवाज़ आई, ‘जो खोला है, वही बंद करेगा।’ उसके बाद खिड़की भी बंद हो गई।
उस रात तिलकू अकेला निकला। घर में कह गया कि गट्ठर बाँधने हैं। हाथ में एक लालटेन थी और वह भी काँप रही थी। कब्रिस्तान पहुँचकर उसने देखा कि दरवाज़ा उतना ही खुला था जितना वह छोड़कर गया था। एक बालिश्त। न ज़्यादा, न कम। उसने लालटेन ज़मीन पर रखी और दोनों हाथ पत्थर पर टिका दिए। दरवाज़ा हिला नहीं। वह पहले से कहीं ज़्यादा भारी था, जैसे दूसरी तरफ़ से कोई उसे थामे खड़ा हो।
फिर वह एक इंच पीछे गया। तिलकू के हाथों के नीचे पत्थर ठंडा नहीं था, गीला था। दूसरी तरफ़ से ज़ोर बढ़ा और दरार चौड़ी हो गई। उसमें से हवा आई, और हवा में वही गंध थी। पुराने काग़ज़ पर जमी धूल। लालटेन बुझ गई। अँधेरे में उसे अपनी कलाई पर उँगलियाँ महसूस हुईं, पतली और बहुत ठंडी, और वे उसे अपनी तरफ़ खींच रही थीं।
तिलकू ने खिंचाव की तरफ़ ही धक्का दिया। एक क़दम आगे, दरवाज़े के अंदर की ओर। पकड़ ढीली पड़ गई, जैसे उसकी उम्मीद कुछ और रही हो। उसी पल तिलकू पीछे गिरा और उसने पूरे शरीर का वज़न पत्थर पर डाल दिया। दरवाज़ा बंद हुआ। उसकी बाईं हथेली बीच में आ गई और तीन उँगलियाँ चटक गईं। वह वहीं ज़मीन पर बैठा रहा, बुझी लालटेन के पास, जब तक उजाला नहीं हुआ।
हड्डियाँ जुड़ गईं, पर बाईं मुट्ठी पूरी तरह कभी बंद नहीं हुई, और हँसिया उसने दाएँ हाथ में पकड़ना सीखा। चौपाल पर कहानियाँ सुनाना उसने उसी जाड़े में छोड़ दिया। लड़के दो-तीन साल पूछते रहे, फिर उन्होंने भी पूछना छोड़ दिया। अब वह साल में तीन बार कब्रिस्तान जाता है, बरसात के बाद, कातिक में, और शब-ए-बरात से पहले, और दरवाज़े के चारों तरफ़ की घास साफ़ कर देता है, बिना कहे और बिना पैसे के, ताकि वह रास्ते से दिखता रहे। पहली ही बार साफ़ करते हुए उसने देख लिया था कि बाहर वाली सतह अब सादी नहीं है। उसके बाद से वह घास काटते हुए दरवाज़े की तरफ़ पीठ किए रहता है।