गाँव का नाम शांतिपुर था, और यह नाम किसी मज़ाक जैसा लगता था। गाँव के किनारे एक कब्रिस्तान था, जो गाँव से भी पुराना था। उसके बीचोंबीच एक दरवाज़ा खड़ा था। दीवार नहीं थी। कमरा नहीं था। बस एक दरवाज़ा, पत्थर का, जो कहीं नहीं खुलता था। लोग उसके पास से नहीं गुज़रते थे। कोई यह भी नहीं बता पाता था कि वह वहाँ आया कहाँ से।

गाँव में एक युवा लड़का था, जिसका नाम सुमित था। सुमित की उम्र लगभग सत्रह वर्ष थी और वह अपने साहसी स्वभाव के लिए जाना जाता था। उसे डरने की बजाय डरावनी चीज़ों में रुचि थी। वह अक्सर अपने दोस्तों को भूत-प्रेत की कहानियाँ सुनाया करता था और उनके साथ डरावने खेल खेला करता था। एक दिन उसने सुना कि कब्रिस्तान के पास एक रहस्यमय दरवाजा है, जो रात में किसी अजनबी आवाज़ से खुलता है। सुमित ने तय किया कि वह इस दरवाजे का रहस्य जानने के लिए कब्रिस्तान जाएगा। उसके दोस्तों ने उसे बहुत समझाया और डराया भी, लेकिन सुमित ने उनकी बातों को नजरअंदाज कर दिया।

एक रात, जब चाँद पूरी तरह से छिपा हुआ था और आसमान में घने बादल थे, सुमित अकेला कब्रिस्तान पहुँचा। वहाँ का माहौल काफी खौफनाक था। कब्रों के ऊपर जाले लगे हुए थे और हवा में एक अजीब सी गंध फैली हुई थी, जैसे किसी पुराने कागज़ पर लगी धूल की गंध। सुमित ने डर के बावजूद उस पुरानी कब्र पर बने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाए। जैसे ही उसने दरवाजे के पास कदम रखा, उसे ऐसा महसूस हुआ कि कोई उसे घूर रहा है। उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।

रोशनी बुझने से पहले

सुमित ने दरवाजे को खींचा और वह चुपचाप खुल गया। जैसे ही दरवाजा खुला, एक ठंडी हवा का झोंका सुमित के चेहरे पर पड़ा। उस हवा में कोई आवाज़ थी, जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। अचानक, सुमित को कुछ दिखाई दिया: एक धुंधली सी आकृति जो धीरे-धीरे दरवाजे से बाहर आ रही थी। वह आकृति किसी महिला की थी, और उसका चेहरा बिलकुल सफेद था, जैसे किसी मृत व्यक्ति का। उसकी आँखें बंद थीं, लेकिन उसकी उपस्थिति में एक अजीब सी शक्ति थी।

सुमित को समझ में नहीं आया कि यह क्या था। वह घबराया हुआ पीछे हटने ही वाला था, कि अचानक उस आकृति ने उसकी तरफ बढ़ते हुए जोर से चीख़ मारी। उसकी चीख़ इतनी तेज़ थी कि सुमित के रोंगटे खड़े हो गए। वह चीख़ सुनकर सुमित पीछे भागा, लेकिन उसे महसूस हुआ कि हवा ने उसे पकड़ लिया था। उसके पैरों में जैसे किसी ने जकड़ लिया हो। वह डर से कांपते हुए जितना हो सकता था तेजी से भागने लगा। उसकी सांसें तेज हो गईं और दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

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घर पहुँचते ही सुमित को महसूस हुआ कि वह उस भूतिया आकृति के कब्जे में आ चुका था। वह डर के मारे कांप रहा था और रात भर बिस्तर पर पड़ा रहा। उसके दिमाग में बार-बार वही चीख़ गूंज रही थी। अगले दिन, जब सुमित ने अपने दोस्तों से यह घटना बताई, तो वे सब बहुत घबराए। उन्हें पता था कि कब्रिस्तान में कुछ गड़बड़ है, और अब सुमित पर एक भूतिया आत्मा का साया था। उसके दोस्तों ने उसे समझाया कि उस दरवाजे से दूर रहना ही ठीक रहेगा।

अगले कुछ दिनों में, सुमित को अजीब-अजीब घटनाएँ होने लगीं। रात में वह किसी की आवाजें सुनता था, जो उसे पुकार रही थीं। उसकी आँखों के सामने वह धुंधली आकृति फिर से दिखाई देती थी। एक दिन, सुमित ने महसूस किया कि वह आत्मा उसकी आत्मा से बदला लेना चाहती थी। यह आत्मा दरवाजे के पीछे दबे हुए रहस्यों से जुड़ी थी और अब सुमित उसकी जाल में फंस चुका था। उसकी नींद उड़ गई थी और वह हमेशा खुद को थका हुआ महसूस करता था।

सुमित गाँव के बुज़ुर्गों के पास गया। ज़्यादातर ने बात टाल दी। सिर्फ़ मंगल काका इतना बोले कि उनके दादा के ज़माने में भी वह दरवाज़ा वहीं खड़ा था, और तब भी कोई उसके पास नहीं जाता था। इससे आगे वे उठकर अंदर चले गए। अगली दोपहर सुमित दिन के उजाले में कब्रिस्तान गया। इस बार उसने दरवाज़े को ध्यान से देखा। कब्ज़े अंदर की तरफ़ थे। दरवाज़ा बाहर से बंद किया गया था, अंदर से नहीं। और पत्थर की भीतरी सतह पर खरोंचें थीं। बहुत सारी। सब एक ही ऊँचाई पर, जहाँ किसी के हाथ पहुँचते हैं।

जब परछाइयाँ जिंदा हुईं

रात भर सुमित को नींद नहीं आई। खरोंचें आँखों के सामने घूमती रहीं। दरवाज़ा किसी को बाहर रखने के लिए नहीं बनाया गया था। वह किसी को अंदर रखने के लिए बनाया गया था। और उसने उसे खोल दिया था। सुबह वह फिर मंगल काका के घर पहुँचा। इस बार दरवाज़ा नहीं खुला। खिड़की के पीछे से उनकी आवाज़ आई, ‘जो खोला है, वही बंद करेगा।’ उसके बाद खिड़की भी बंद हो गई।

उस रात सुमित अकेला निकला। किसी को बताया नहीं। हाथ में एक लालटेन थी और वह भी काँप रही थी। कब्रिस्तान पहुँचकर उसने देखा कि दरवाज़ा उतना ही खुला था जितना वह छोड़कर गया था। एक बालिश्त। न ज़्यादा, न कम। उसने लालटेन ज़मीन पर रखी और दोनों हाथ पत्थर पर टिका दिए। दरवाज़ा हिला नहीं। वह पहले से कहीं ज़्यादा भारी था, जैसे दूसरी तरफ़ से कोई उसे थामे खड़ा हो।

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फिर वह एक इंच पीछे गया। सुमित के हाथों के नीचे पत्थर ठंडा नहीं था, गीला था। दूसरी तरफ़ से ज़ोर बढ़ा और दरार चौड़ी हो गई। उसमें से हवा आई, और हवा में वही गंध थी: पुराने कागज़ पर जमी धूल। लालटेन बुझ गई। अँधेरे में उसे अपनी कलाई पर उँगलियाँ महसूस हुईं, पतली और बहुत ठंडी, और वे उसे अपनी तरफ़ खींच रही थीं।

सुमित ने खिंचाव की तरफ़ ही धक्का दिया। एक कदम आगे, दरवाज़े के अंदर की ओर। पकड़ ढीली पड़ गई, जैसे उसकी उम्मीद कुछ और रही हो। उसी पल सुमित पीछे गिरा और उसने पूरे शरीर का वज़न पत्थर पर डाल दिया। दरवाज़ा बंद हुआ। उसकी बाईं हथेली बीच में आ गई और तीन उँगलियाँ चटक गईं। वह वहीं ज़मीन पर बैठा रहा, बुझी लालटेन के पास, जब तक उजाला नहीं हुआ।

हड्डियाँ जुड़ गईं, पर बाईं मुट्ठी पूरी तरह कभी बंद नहीं हुई। सुमित ने वह रात किसी को नहीं सुनाई, दोस्तों को भी नहीं, और भूत-प्रेत की बातें सुनाना उसने छोड़ दिया। साल में एक बार वह दोपहर के उजाले में कब्रिस्तान जाता है और दरवाज़े को देखकर लौट आता है। बाहर वाली सतह पहले बिलकुल सादी थी। अब उस पर खरोंचें हैं। हर बार पिछली बार से कुछ ज़्यादा।