कुसुम ने हाज़िरी रजिस्टर में नाम तीसरी बार गिने और तीनों बार बत्तीस निकले। कक्षा तीन में इकतीस बच्चे थे। यह उसे याद था, क्योंकि पिछले महीने ही उसने यह गिनती दफ़्तर भेजी थी।
जून का दूसरा हफ़्ता था और स्कूल में छुट्टियाँ चल रही थीं। छतरपुर से बारह किलोमीटर दूर इस सरकारी प्राथमिक स्कूल में चार कमरे थे, एक बरामदा था, और अहाते में एक नीम का पेड़ था जिसके नीचे गर्मियों में कक्षा लगती थी। कुसुम वहाँ साल भर का हिसाब पूरा करने आती थी। घर में बिजली शाम को दो घंटे रहती थी और चार बच्चे शोर करते थे।
वह पिछले तीन साल से यहाँ पढ़ा रही थी। स्कूल दस बजे खुलता, चार बजे बंद होता, और बुधई सात बजे ताला लगाकर अपने गाँव चला जाता था। छुट्टियों में वह कुसुम के लिए ताला खुला छोड़ जाता और जाते हुए बता जाता कि पानी की बाल्टी भर दी है।
जब दीवारें बोलने लगीं
बत्तीसवाँ नाम सुखिया था। कुसुम ने यह नाम कभी नहीं सुना था। नाम के आगे पूरे साल की हाज़िरी लगी थी, एक भी दिन नागा नहीं। उसने पन्ना पलटा और अगस्त वाले हिस्से में देखा, जहाँ लगातार नौ दिन स्कूल बंद रहा था, क्योंकि उन दिनों बरसात में छत का पानी कक्षा दो में उतर आया था। उन नौ दिनों में भी सुखिया हाज़िर था।
कुसुम ने रजिस्टर उठाकर खिड़की की रोशनी में रखा। हाज़िरी के निशान उसी की लिखावट में थे। वह अपनी लिखावट पहचानती थी। पी अक्षर की पूँछ वह हमेशा नीचे की तरफ़ मोड़ती थी और यहाँ हर निशान वैसा ही था।
शाम को उसने बुधई से पूछा कि सुखिया कौन है। बुधई की नज़र रजिस्टर पर गई ही नहीं। उसने कहा कि रजिस्टर तो रजिस्टर है, मास्टरनी जी, और फिर वह बाल्टी उठाकर नल की तरफ़ चला गया। उसने न हाँ कहा, न ना।
अगले दिन कुसुम ने दफ़्तर वाली अलमारी खोली। उसमें पिछले सालों के रजिस्टर तह करके रखे थे। उसने पिछले साल का रजिस्टर निकाला और कक्षा तीन का पन्ना खोला। सुखिया वहाँ भी था। लिखावट किसी और की थी।
उसने और पीछे के रजिस्टर देखे। सात साल पहले तक जितने रजिस्टर अलमारी में थे, हर एक में वह नाम था, और हर बार अलग लिखावट में। सात अलग-अलग अध्यापकों ने सात साल तक उस नाम के आगे हाज़िरी लगाई थी और उनमें से किसी ने कहीं कुछ नहीं लिखा था।
आख़िरी दरवाज़ा
उस शाम बिजली छह बजे ही चली गई। कुसुम रजिस्टर समेट रही थी कि उसे बाहर से ताले की आवाज़ सुनाई दी। बुधई भूल गया था। वह बरामदे तक भागी और उसने आवाज़ दी, मगर तब तक साइकिल की घंटी दूर जा चुकी थी।
अहाते की दीवार छह फुट ऊँची थी और उसके ऊपर काँच जड़ा था, जो पिछले साल ही चुनवाया गया था, जब गाँव के लड़के रात में अहाते में घुसकर नीम के फल तोड़ने लगे थे। कुसुम वापस दफ़्तर में आ गई। उसने लालटेन जलाई और सोचा कि सुबह छह बजे तक की ही तो बात है।
पौने आठ बजे कमरा नंबर चार में कुर्सियाँ खिसकने की आवाज़ आई। कमरा नंबर चार में कक्षा नहीं लगती थी। उसमें टूटा फ़र्नीचर और पुरानी किताबें रखी रहती थीं और उस पर सालों से ताला पड़ा था।
आवाज़ रुकी, फिर आई, फिर रुक गई। कुसुम लालटेन लेकर बरामदे में खड़ी रही और उसने ख़ुद से कहा कि चूहे हैं। तभी उसे एक बच्चे के रोने की आवाज़ सुनाई दी, बहुत धीमी, जैसे कोई मुँह दबाकर रो रहा हो। वह आवाज़ चूहों की नहीं थी।
वह दफ़्तर में लौट सकती थी और कुंडी लगाकर सुबह का इंतज़ार कर सकती थी। उसने ऐसा नहीं किया। वह लालटेन आगे किए कमरा नंबर चार तक गई, और दरवाज़े पर पहुँचकर उसने देखा कि ताला खुला हुआ है और कुंडी नीचे लटक रही है।
भीतर कोई नहीं था। धूल की मोटी परत पर चलने के निशान नहीं थे। ब्लैकबोर्ड पर, नीचे की तरफ़, जहाँ तक एक छोटा बच्चा हाथ पहुँचा सकता है, खड़िया से एक ही नाम बार-बार लिखा था। कुसुम ने गिना नहीं। बाईं दीवार के पास वाली खिड़की की चिटकनी भीतर से खुली हुई थी, और उसके नीचे धूल में एक हथेली का छोटा सा निशान था।
कुछ नहीं हुआ। न आवाज़, न हवा, न रोशनी का हिलना। कुसुम उलटे पाँव बाहर आई, दफ़्तर में बैठी रही, और सुबह जब बुधई ताला खोलने आया तो उसने उससे कुछ नहीं पूछा। बुधई ने माफ़ी माँगी और कहा कि उसे शाम को याद ही नहीं रहा कि भीतर कोई है।
जाने से पहले कुसुम ने रजिस्टर आख़िरी बार खोला। सुखिया के नाम के आगे अगले दिन की तारीख़ में भी हाज़िरी लगी हुई थी। वह तारीख़ अभी आई नहीं थी। निशान उसी की लिखावट में था।
जुलाई में स्कूल खुला। पहले दिन कुसुम ने कक्षा तीन में हाज़िरी ली और नाम एक-एक करके पढ़ती गई। जब वह उस नाम पर पहुँची तो कमरे के पिछले हिस्से से एक बच्चे की आवाज़ आई, और कुसुम ने सिर उठाए बिना अगला नाम पढ़ दिया।