नीचे वाली मंज़िल में उस रात दो फ़ुट पानी था। आवाज़ ऊपर तक आई और वह सूखे फ़र्श पर चलने की थी। घाघरा उस बरस चौदह जुलाई को बाँध के ऊपर से निकली।

बहराइच की उस तरफ़ यह हर तीसरे-चौथे बरस होता है और लोग जानते हैं कि क्या करना है। ऊँची जगहें गिनी-चुनी हैं और उनमें सबसे बड़ी सरकारी स्कूल की इमारत होती है, जो दो मंज़िल की बनाई जाती है और इसी काम के लिए बनाई जाती है।

स्कूल राहत शिविर बन जाता है। हर बार वही स्कूल। ऊपर की मंज़िल पर लोग रहते हैं, बरामदे में खाना बनता है, और नीचे की मंज़िल जितना पानी आए उतना ले लेती है। उस शिविर की ज़िम्मेदारी राजेश्वरी पर थी।

वह उसी स्कूल में पढ़ाती थी और शिविर प्रभारी का काम सबसे वरिष्ठ अध्यापक को मिलता है। उसके साथ दो और लोग थे और तीन सौ बीस लोग शिविर में थे। पहले दो दिन में ही सब बँट गया। जगह, बर्तन, बारी।

पीने का पानी नीचे रखा था, क्योंकि उसके ड्रम भारी थे और उन्हें ऊपर चढ़ाया नहीं जा सका था। वे कक्षा एक वाले कमरे में, ऊँची बेंचों पर रखे थे और पानी उनसे नीचे था। दिन में दो बार दो आदमी नीचे उतरकर बाल्टी भरकर लाते थे।

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आवाज़ पहली बार तीसरी रात आई। राजेश्वरी सीढ़ी के पास वाले कमरे में थी और वह अभी सोई नहीं थी। नीचे से क़दमों की आवाज़ आई, एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ जाती हुई, धीरे-धीरे। उसने पहले यही सोचा कि कोई पानी लेने उतरा है। ऐसा होता रहता था।

फिर उसने ध्यान दिया। और ध्यान देते ही बात बदल गई।

पानी में चलने पर आवाज़ अलग निकलती है। वह छपाक-छपाक होती है और छिपाई नहीं जा सकती। दो फ़ुट पानी में तो आदमी को घुटने उठाकर चलना पड़ता है और आवाज़ और तेज़ होती है। जो आवाज़ आ रही थी वह सूखे फ़र्श की थी।

चप्पल की नहीं, नंगे पैर की। और वह पूरे कमरे की लंबाई नापकर चलती थी, एक सिरे से दूसरे सिरे तक, फिर वापस। वह लगभग बीस मिनट चली। फिर बंद हो गई। अगली रात फिर आई। उसी वक़्त।

राजेश्वरी ने उन दो आदमियों से पूछताछ की। दोनों का कहना था कि रात में कोई नीचे नहीं गया। उसने यह भी देखा कि सीढ़ी के नीचे वाले पानी पर लहर नहीं थी, और अगर कोई चला होता तो कम से कम एक घंटे तक लहर रहती।

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उसने किसी और को नहीं बताया। एक को भी नहीं।

तीन सौ बीस लोग एक मंज़िल पर बैठे हैं, उनमें बच्चे हैं, बूढ़े हैं, और वे पहले ही सब कुछ खो चुके हैं। ऐसी जगह पर एक बात फैलने में दस मिनट लगते हैं और उसके बाद कोई किसी को रोक नहीं सकता।

छठे दिन एक बच्चा नीचे चला गया।

वह पाँच बरस का था और उसकी गेंद सीढ़ी से लुढ़ककर नीचे चली गई थी। किसी ने उसे उतरते नहीं देखा और पंद्रह मिनट बाद उसकी माँ ने शोर मचाया।

राजेश्वरी टॉर्च लेकर नीचे उतरी। अकेले।

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उसने किसी और को नहीं आने दिया, इसलिए कि सीढ़ी सँकरी थी और नीचे अँधेरा था और भीड़ उतरने पर कोई गिरता। पानी घुटनों से थोड़ा ऊपर था और ठंडा था। बरामदे में मलबा तैर रहा था। बेंचों के टुकड़े, बोरे, एक टूटा हुआ ब्लैकबोर्ड। टॉर्च की रौशनी पानी पर पड़कर छत पर हिलती थी।

बच्चा कक्षा एक वाले कमरे में मिला, ड्रम के पास खड़ा हुआ, और वह ठीक था। उसकी गेंद उसके हाथ में थी। राजेश्वरी ने उसे गोद में उठाया और लौटने के लिए मुड़ी। और तब उसकी टॉर्च कक्षा तीन के दरवाज़े पर पड़ी।

कक्षा तीन बरामदे के आख़िरी सिरे पर था और उसका दरवाज़ा खुला हुआ था। उस कमरे में पानी नहीं था। एक बूँद नहीं।

फ़र्श सूखा था। पूरा सूखा, दीवार से दीवार तक, और उसकी सतह उतनी ही ऊँची थी जितनी बाक़ी कमरों की, क्योंकि वह एक ही मंज़िल थी और एक ही फ़र्श था। बाहर बरामदे में पानी दरवाज़े की चौखट से ऊपर था।

उसे अंदर जाना चाहिए था, क्योंकि पानी को रोकने वाली कोई चीज़ वहाँ थी और वह देखने लायक़ थी। उसने टॉर्च नीची कर ली। फिर सीढ़ी की तरफ़ चल दी। बच्चा उसकी गोद में था और उसने उसका सिर अपने कंधे की तरफ़ कर लिया था, जो उसने बिना सोचे किया।

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ऊपर पहुँचकर उसने बच्चे को उसकी माँ को दिया और यह कहा कि वह ड्रम के पास खड़ा था। उस रात के बाद आवाज़ फिर नहीं आई। एक बार भी नहीं। पानी उन्नीस जुलाई से उतरना शुरू हुआ और छब्बीस तक स्कूल ख़ाली हो गया।

सफ़ाई में तीन हफ़्ते लगे और अगस्त के दूसरे हफ़्ते में स्कूल खुल गया। कक्षा तीन का कमरा अब स्टोर है। बच्चे वहाँ नहीं बैठते।

उसमें मध्याह्न भोजन का सामान रखा जाता है, बोरे और डिब्बे, और वहाँ अब पढ़ाई नहीं होती। रजिस्टर में वजह यह लिखी है कि उस कमरे में सीलन है और बरसात में दीवारें गीली रहती हैं, जो बाक़ी सब कमरों के बारे में भी सच है, और जो राजेश्वरी ने ख़ुद लिखा था।