उस हफ़्ते हवा पूरब से चल रही थी और एक चबूतरे का धुआँ पश्चिम की तरफ़ नहीं जा रहा था। वह नीचे आ रहा था। सीढ़ियों पर। बनारस में सावन के दिनों में गंगा चढ़ जाती है और घाट के निचले हिस्से पानी में चले जाते हैं।
जलाने का काम रुकता नहीं, वह बस ऊपर सरक आता है।
जो चबूतरे साल भर ऊपर ख़ाली पड़े रहते हैं, बाढ़ के उन तीन-चार हफ़्तों में वही सब कुछ होते हैं। नीचे वाले सब डूब जाते हैं और ऊपर वाले पाँच-छह बचते हैं, और उन्हीं पर पूरे शहर का काम चलता है।
उन हफ़्तों में इंतज़ार आठ-आठ घंटे का हो जाता है। लोग बारिश में खड़े रहते हैं, अपनी बारी के लिए, और जिनके साथ अर्थी होती है वे बैठ भी नहीं सकते।
शिवशंकर वहाँ अट्ठाईस बरस से था।
उसका काम लकड़ी नापने का, चबूतरा देने का, और आग का इंतज़ाम करने का था। यही काम उसका बाप करता आया था, और दादा भी। धुएँ के बारे में उसे सब मालूम था।
एक चिता का धुआँ हवा के साथ जाता है। हवा न हो तो सीधा ऊपर उठता है। बारिश में वह नीचे दबता है और फैल जाता है, पर तब भी वह ऊपर की तरफ़ ही चलता है, धीरे-धीरे। वह नीचे कभी नहीं आता।
जिस चबूतरे की बात है, वह ऊपर वालों में सबसे चौड़ा था और सबसे सूखा रहता था। इसीलिए बाढ़ में वह सबसे क़ीमती था। उस पर लकड़ी कम लगती थी, आग जल्दी पकड़ती थी, और काम डेढ़ घंटा कम लेता था।
पहली बार शिवशंकर ने यह चार साल पहले देखा था और उस वक़्त उसने इसे हवा का चक्कर समझा था।
घाट पर हवा सीधी नहीं चलती। दीवारें हैं, गलियाँ हैं, और हर कोने पर हवा मुड़ जाती है। एक जगह का धुआँ किसी और तरफ़ जाए, इसमें कोई अनोखी बात नहीं। पर हवा के चक्कर की एक पहचान होती है।
वह हर बार एक जैसा नहीं होता। हवा का रुख़ बदले तो चक्कर भी बदलता है, और उस चबूतरे के धुएँ को कभी तो पश्चिम जाना चाहिए था। चार बरसों में वह एक बार भी ऊपर नहीं गया। वह हर बार सीढ़ियों पर उतरता था, नीचे की तरफ़, पानी की तरफ़, और पानी के ऊपर पहुँचकर फैल जाता था।
और वह सिर्फ़ बाढ़ के हफ़्तों में ऐसा करता था।
बाक़ी साल वह चबूतरा नीचे वाले चबूतरों की क़तार से ऊपर होने की वजह से ख़ाली रहता था और उस पर काम कम होता था। जब होता था, तब धुआँ ठीक से जाता था। इस बरस पानी बहुत चढ़ा। सबसे ज़्यादा।
नीचे के सब चबूतरे तीसरे दिन डूब गए और चार ही बचे। उसी शाम इंतज़ार दस घंटे का हो गया और गली में अर्थियों की क़तार लग गई। शिवशंकर ने उस चबूतरे पर काम नहीं दिया। पहले ही दिन से नहीं दिया।
उसने वजह नहीं बताई। उसने बस उस पर लकड़ी नहीं चढ़ने दी और उसे ख़ाली रहने दिया, और बाक़ी तीन पर काम चलाता रहा।
इससे क़तार और लंबी हो गई।
लोग उससे लड़े। एक परिवार आठ घंटे से खड़ा था और उनकी माँ की देह उनके साथ थी और बारिश रुक नहीं रही थी। उन्होंने चीख़कर पूछा कि वह चबूतरा ख़ाली क्यों पड़ा है। शिवशंकर ने कहा कि उसका पत्थर हिल गया है।
यह झूठ था और वहाँ खड़े दो-तीन पुराने आदमी जानते थे कि झूठ है। उस रात लगभग दो बजे उसने वह कर डाला जिससे उसे बचना चाहिए था।
क़तार ख़त्म नहीं हो रही थी और उसे नींद नहीं आ रही थी, इसलिए वह अकेला उस चबूतरे पर चढ़ा और उस पर बैठ गया, यह देखने कि उसमें है क्या। पत्थर सूखा था। छूकर देखा, तब भी सूखा था।
यही सबसे पहली बात थी। चारों तरफ़ की सीढ़ियाँ बारिश से भीगी थीं और उन पर पैर फिसल रहे थे। यह पत्थर सूखा था, और गरम भी नहीं था, क्योंकि उस पर दो दिन से आग नहीं जली थी। शिवशंकर वहाँ काफ़ी देर बैठा रहा। उठा नहीं।
नीचे पानी था और उसमें ऊपर की चिताओं की रौशनी हिल रही थी। दूसरी तरफ़ की चिताएँ जल रही थीं और उनका धुआँ ठीक पश्चिम जा रहा था, जैसा जाना चाहिए था। फिर उसे लगा कि उसके पास धुआँ है। बहुत पास।
उसने आँख उठाकर देखा और पास कोई चिता नहीं थी। सबसे नज़दीक वाली अट्ठाईस क़दम दूर थी और उसका धुआँ दूसरी तरफ़ जा रहा था। गंध चंदन और घी की थी, वही जो जलती चिता के पास आती है। वह उसके अपने आसपास थी, उसी चबूतरे पर, जिस पर दो दिन से कुछ नहीं जला था।
शिवशंकर उठा। फिर वह नीचे उतर आया।
उसने उस रात और बाक़ी बाढ़ के दिनों में उस चबूतरे पर काम नहीं दिया, और गालियाँ सुनीं, और उन दिनों में उसकी कमाई भी लगभग आधी रह गई, क्योंकि जितने काम कम हुए उतना ही कम मिला। पानी अगस्त के दूसरे हफ़्ते में धीरे-धीरे उतरा।
नीचे वाले चबूतरे फिर खुल गए और भीड़ बँट गई और सब कुछ पहले जैसा हो गया। वह चबूतरा उसके बाद भी वहीं है।
बाढ़ के हफ़्तों में वह अब भी ख़ाली रहता है और उस पर लकड़ी वाले अपनी लकड़ी चढ़ा देते हैं, क्योंकि वह सबसे सूखी जगह है और लकड़ी सूखी रहनी चाहिए। यह इंतज़ाम शिवशंकर ने ख़ुद करवाया था, और उसने वजह यह बताई थी कि लकड़ी भीग जाए तो काम में देर लगती है, जो सच भी है।