नौ नंबर तालाब के उत्तर-पूर्वी कोने में उस रात भी कुछ नहीं था। सत्यनारायण ने टॉर्च वहाँ तीसरी बार घुमाई और पानी ख़ाली था। भीमवरम की उस तरफ़ खेत नहीं, तालाब हैं।
पचास-पचास मीटर के चौकोर तालाब, एक के बाद एक, मेड़ों से बँटे हुए, और हर तालाब में झींगा। दूर तक यही फैला रहता है और रात में हर तालाब पर एरेटर चलते हैं। एरेटर पैडल वाले पहिये होते हैं जो पानी को पीटते रहते हैं।
उनका काम पानी में हवा घोलना है। झींगा पानी की तली में रहता है और तली की हवा सबसे पहले ख़त्म होती है। रात के तीन से छह के बीच वह सबसे कम रहती है, और अगर उन तीन घंटों में एरेटर बंद हो जाए, तो सुबह तक पूरा तालाब मर जाता है।
इसीलिए रात की पाली सबसे ज़रूरी होती है। सत्यनारायण नौ बरस से यही कर रहा था। रात आठ से सुबह छह, चौदह तालाब, और उन्हें देखने का एक ही सस्ता तरीक़ा।
टॉर्च और आँख।
झींगा जहाँ हवा ज़्यादा होती है वहाँ इकट्ठा होता है। एरेटर के आसपास, और उस किनारे पर जिधर हवा पानी को धकेल रही हो। रात में टॉर्च मारो तो उनकी आँखें चमकती हैं, हज़ारों, सुइयों की नोक जैसी। जिस किनारे पर आँखें न दिखें, वहाँ कुछ गड़बड़ है।
नौ नंबर में गड़बड़ उलटी थी। उस तालाब के तीन कोनों में झींगा ठीक-ठाक था और चौथे में, उत्तर-पूर्व वाले में, एक भी नहीं था। यह हवा से नहीं समझाया जा सकता था, क्योंकि जुलाई में वहाँ हवा दक्षिण-पश्चिम से आती है और उसे झींगे को उसी उत्तर-पूर्वी कोने की तरफ़ धकेलना चाहिए था।
यानी जहाँ सबसे ज़्यादा होना चाहिए था, वहाँ कुछ भी नहीं था। पहला शक ऑक्सीजन पर जाता है। सत्यनारायण ने मीटर डालकर देखा। पाँच दशमलव आठ। यह अच्छा नंबर है और बाक़ी कोनों से बेहतर था। दूसरा शक तली पर जाता है।
तली में गंदगी जम जाए या गैस बने तो झींगा वहाँ से हट जाता है। उसने बाँस डालकर तली टटोली और वह साफ़ थी, वैसी ही जैसी बाक़ी जगह। तीसरा शक किसी जानवर पर जाता है। साँप, ऊदबिलाव, या बगुले। पर वे झींगे को खाते हैं और खाने वाले के आसपास झींगा भागता है, ग़ायब नहीं होता, और खाने के निशान भी छूटते हैं।
चौथी रात उसने वह किया जो अकेले आदमी को नहीं करना चाहिए। उसने उस कोने वाला एरेटर बंद किया और पानी में उतरा।
तालाब पाँच फ़ुट गहरा था और तली गाद की थी और उसमें पैर घुटनों तक धँसते थे। चलते हुए एरेटर के पैडल हाथ काट देते हैं और यही वजह है कि उतरने से पहले उसे बंद करना पड़ता है, और यही वजह है कि रात में अकेले कोई उतरता नहीं, क्योंकि बंद एरेटर वाले तालाब में वक़्त गिना जाता है।
उसके पास बीस मिनट थे।
वह कोने की तरफ़ बढ़ा और उसके आगे-आगे झींगा हटता गया। यह होता है और इसमें कुछ नहीं है, क्योंकि आदमी के हिलने से वे हटते ही हैं। कोने से चार क़दम पहले वे रुक गए।
वे उसके साथ आगे नहीं आए और उसके पीछे भी नहीं गए। वे वहीं, उसी लकीर पर, इकट्ठा हो गए और आगे नहीं बढ़े, जबकि उनके पीछे उसकी टाँगें थीं और आदमी की टाँगों से झींगा भागता है। उन्हें कोने से ज़्यादा उससे डर नहीं लग रहा था।
सत्यनारायण चार क़दम और आगे गया। पानी वैसा ही था। ठंडा नहीं, गरम नहीं। तली वैसी ही थी। उसने वहाँ खड़े होकर टॉर्च नीचे पानी में डाली और गाद के उठने का इंतज़ार करता रहा, ताकि नीचे कुछ दिखे। गाद उठी और बैठ गई और नीचे कुछ नहीं था।
फिर उसे एक बात महसूस हुई और वह देखने की नहीं थी। उस कोने में उसे अपनी टाँगों पर पानी का बहाव नहीं लग रहा था।
बाक़ी तालाब में एरेटर बंद होने के बाद भी पानी कुछ देर घूमता रहता है और टाँगों पर उसका दबाव महसूस होता है। यहाँ वह नहीं था। पानी बिलकुल ठहरा हुआ था, जैसे वह उस कोने का हिस्सा ही न हो।
वह उलटा मुड़ा और वापस चला। मेड़ पर चढ़ते-चढ़ते उसने एरेटर चालू कर दिया और उसके बाद देर तक बैठा रहा। उस मौसम की फ़सल पैंसठ दिन बाद निकली। नौ नंबर की पैदावार बाक़ी तेरह तालाबों से कम रही, लगभग पाँचवाँ हिस्सा कम, और हिसाब में यही लिखा गया कि उस तालाब में जमाव ठीक नहीं था।
सत्यनारायण ने मालिक से एक बात कही। उसने कहा कि नौ नंबर चौकोर है और उसका उत्तर-पूर्वी कोना बेकार है, वहाँ मिट्टी डलवा दीजिए और तालाब को थोड़ा छोटा कर दीजिए। मालिक ने वजह पूछी और उसने कहा कि पानी वहाँ घूमता नहीं।
यह सही भी था।
अगले मौसम से पहले उस कोने में मिट्टी डाल दी गई और नौ नंबर चौकोर से आयताकार हो गया। बाक़ी तेरह तालाब आज भी चौकोर हैं और सिर्फ़ वही एक अलग शक्ल का है। सत्यनारायण अब भी वहीं है, और रात के चक्कर में वह चौदहों तालाबों पर टॉर्च घुमाता है, और नौ नंबर पर वह हमेशा उसी तरफ़ से चलता है जिधर से वह भरा हुआ कोना उसके सामने पड़े, पीछे नहीं।