नंबर चार के उस हिस्से की पत्ती फिर से पलटी हुई थी और एतवा वहाँ अभी पहुँचा नहीं था। वह ट्रफ़ के बीचोंबीच खड़ा था, हाथ पत्ती में डूबे हुए, और उसने गिनकर देखा कि वह हिस्सा उससे कोई अठारह फ़ुट आगे है।
मई का आख़िरी हफ़्ता था और दूसरी फ़सल चल रही थी।
असम में साल की सबसे अच्छी पत्ती इन्हीं दिनों की होती है। मई के आख़िर से जून तक, और कोई वक़्त नहीं। बाग़ान इसी पर टिका रहता है और फ़ैक्ट्री इन्हीं हफ़्तों में रात-दिन चलती है।
एतवा विदरिंग लॉफ़्ट में था।
तोड़ी हुई पत्ती सीधे मशीन में नहीं जाती। पहले उसे सुखाना पड़ता है, पर धूप में नहीं। उसे एक लंबे ट्रफ़ में जाली के ऊपर आठ इंच मोटा बिछाया जाता है और नीचे से पूरी रात पंखे हवा मारते हैं।
इसमें चौदह से अठारह घंटे लगते हैं और कम में नहीं होता।
पत्ती में जो नमी अठहत्तर पर होती है, वह घटकर बासठ पर आनी चाहिए। कम रह जाए तो पत्ती मशीन में लुगदी बन जाती है। ज़्यादा उतर जाए तो वह भुरभुरी होकर टूट जाती है और चाय की क़ीमत गिर जाती है।
इसीलिए बीच-बीच में पत्ती को हाथ से पलटना पड़ता है, ताकि नीचे वाली ऊपर आ जाए। यह काम रात भर चलता है और अकेले आदमी का होता है। एतवा उस बाग़ान में सोलह बरस से था। उसका बाप भी इसी फ़ैक्ट्री में था और उससे पहले उसका बाप।
पलटी हुई पत्ती को पहचानना मुश्किल नहीं होता।
बिछाते वक़्त सारी पत्ती एक तरफ़ मुड़ी रहती है और ऊपर से देखने पर पूरा ट्रफ़ एक ही रंग का दिखता है, गहरा हरा। पलटने के बाद वह हल्की पड़ जाती है, क्योंकि पत्ती का नीचे वाला हिस्सा ऊपर आ जाता है।
नंबर चार के उस तीन फ़ुट में रंग हमेशा हल्का रहता था। पहली बार उसने इसे नौ दिन पहले देखा था और अपने आप को समझा लिया था कि वहाँ नीचे वाला पंखा तेज़ चल रहा होगा। उसने पंखा देखा। वह बाक़ी जैसा ही था।
फिर उसने सोचा कि लखिंदर ने पलटी होगी, जो दूसरी पाली में आता था और कभी-कभी जल्दी आ जाता था। उसने लखिंदर से पूछा और लखिंदर ने कहा कि वह नंबर चार को हाथ नहीं लगाता। उसने वजह नहीं पूछी।
नौ रात तक वह हिस्सा हर बार पलटा हुआ मिला।
एक बार वह उधर से शुरू करके देख चुका था। उस रात उसने ट्रफ़ के उसी सिरे से पलटना शुरू किया और तीन फ़ुट का वह हिस्सा उसने सबसे पहले किया।
उस रात वही हिस्सा दूसरी बार, अपने आप, दोबारा पलट गया। उसने शुभ्रा मैडम को बताया।
वे फ़ैक्ट्री की सहायक प्रबंधक थीं, तीस के आसपास की, और साल भर पहले आई थीं। उन्होंने ध्यान से सुना और फिर कहा कि लॉफ़्ट की हवा में जगह-जगह फ़र्क़ होता है, और छत के टीन में कहीं सूराख़ होगा जिससे बरदैसिला वाली हवा सीधी उस जगह पर पड़ती होगी।
'हवा से पत्ती पलटती नहीं है, मैडम,' एतवा ने कहा। 'उड़ती है।' उन्होंने कहा कि दिन में देख लेंगे। दिन में कुछ नहीं दिखा। छत में सूराख़ नहीं था। उन्नीस तारीख़ की रात एतवा ने पंखे बंद किए। यह उसने किसी से पूछकर नहीं किया।
बीच में पंखे बंद करने का मतलब यह होता है कि उतनी देर का विदरिंग रुक जाता है और उसकी भरपाई सुबह तक नहीं होती। उस रात ट्रफ़ में साढ़े ग्यारह सौ किलो पत्ती थी और वह दूसरी फ़सल की थी। ख़राब होती तो नाम एतवा का ही आता, और बाग़ान में नाम आने का मतलब हाज़िरी वाली किताब से नाम कटना होता है।
उसने फिर भी बंद किए, एक-एक करके, सोलह के सोलह। और तब लॉफ़्ट में पहली बार सन्नाटा हुआ।
उस इमारत में रात को कभी चुप्पी नहीं होती। नीचे सीटीसी की मशीनें चलती हैं, ड्रायर का पंखा चलता है, और लॉफ़्ट में हवा की लगातार आवाज़ रहती है। सोलह पंखे बंद होने के बाद सिर्फ़ नीचे वाली आवाज़ बची, जो दूर थी।
एतवा ट्रफ़ के सिरे पर खड़ा रहा। वह हिला नहीं। दो मिनट बाद उसे आवाज़ आई। पत्ती की अपनी आवाज़ होती है। मुट्ठी में उठाकर छोड़ो तो वह गिरते वक़्त सरसराती है, बहुत हल्के से, जैसे कोई काग़ज़ को दूर से मसल रहा हो।
वह आवाज़ अठारह फ़ुट दूर से आ रही थी। एक बार आई। फिर थोड़ी चुप्पी के बाद दोबारा आई।
एतवा टॉर्च लेकर उस तरफ़ चला। ट्रफ़ के किनारे पर चलना पड़ता है, लोहे के फ़्रेम पर, क्योंकि बीच में जाली है और जाली पर आदमी का वज़न नहीं जाता। नीचे चौदह फ़ुट का ख़ाली और उसके बाद सीटीसी का फ़र्श।
वह उस हिस्से तक पहुँचा। आवाज़ बंद हो गई। पत्ती पलटी हुई थी। उसने टॉर्च नीचे रखी। फिर दोनों हाथ पत्ती में डाले। पत्ती गरम थी।
सूखती हुई पत्ती कभी गरम नहीं होती। उसमें से पानी उड़ता रहता है और उड़ता हुआ पानी चीज़ को ठंडा रखता है। पूरे ट्रफ़ की पत्ती हाथ को ठंडी लगती है, गीले कपड़े जैसी। यह तीन फ़ुट गरम था, उतना जितनी देर हथेली रखे रहने पर हथेली की अपनी गरमी हो जाती है।
एतवा ने हाथ निकाल लिए और टॉर्च उठाई, और फ़्रेम पर चलते हुए वापस सिरे तक आया। फिर उसने सोलहों पंखे चालू किए। एक-एक करके। उस रात की पत्ती बच गई। सुबह की नमी बासठ की जगह चौंसठ आई, जो चल जाती है, और किसी ने कुछ नहीं पूछा।
अगली रात से एतवा ने नंबर चार में पत्ती बिछाने का तरीक़ा बदल दिया।
वह ट्रफ़ के उस तीन फ़ुट को ख़ाली छोड़ देता था। हर रात लगभग तीस किलो कम पत्ती जाती थी और वह तीस किलो वह दूसरे ट्रफ़ों में बाँट देता था, जहाँ थोड़ी जगह हमेशा बच जाती है। उसने यह किसी को नहीं बताया और किसी ने पकड़ा भी नहीं, क्योंकि दिन में वह हिस्सा भी बाक़ी सबकी तरह ख़ाली और साफ़ रहता है।
एतवा को उस फ़ैक्ट्री में रहते अब सत्ताईस बरस हो चुके हैं और लॉफ़्ट अब भी वैसी की वैसी है। नंबर चार में हर रात तीन फ़ुट ख़ाली छोड़े जाते हैं और यह अब वहाँ का तरीक़ा बन चुका है। जो नया आदमी रात की पाली में आता है उसे पहले ही दिन बता दिया जाता है कि उतनी जगह में पत्ती नहीं डालनी, क्योंकि नीचे जाली कमज़ोर है।