साढ़े ग्यारह बजे संतोष ने जाली साफ़ की और उस पर कुछ नहीं था। उसने रेक वहीं टिका दी। फिर पानी की तरफ़ देखता रहा। मुंबई में बरसात का पानी अपने आप समुद्र में नहीं जाता।
जब ज्वार ऊँचा हो, तो समुद्र नालों के मुँह से ऊपर आ जाता है और शहर का पानी बाहर नहीं निकल पाता। तब पंप चलते हैं। नाले का पानी पहले एक बड़े हौज़ में आता है, जिसे सम्प कहते हैं, और वहाँ से पंप उसे उठाकर दीवार के उस पार फेंक देते हैं।
सम्प के मुँह पर लोहे की जाली लगी रहती है। मोटी सलाखों वाली।
यह जाली इसीलिए है कि नाले का कचरा पंप में न चला जाए। मुंबई के नाले जो लाते हैं वह हर आदमी जानता है। थैलियाँ, बोतलें, चप्पलें, कपड़े, नारियल, और वह सब जो शहर सड़क पर छोड़ देता है। बरसात की रात में यह जाली हर पंद्रह-बीस मिनट पर भर जाती है।
उसे साफ़ करना ही उस नौकरी का असली काम है। रेक से खींचो, कचरा चबूतरे पर डालो, और अगली बार के लिए तैयार रहो। रात भर यही चलता है। संतोष यह काम छह बरस से कर रहा था।
उस रात उसके साथ दूसरा आदमी नहीं था। काशीनाथ को आना था, पर हार्बर लाइन बंद थी और वह कुर्ला से आगे नहीं आ पाया। बारिश आठ बजे तेज़ हुई और ग्यारह बजे तक रुक गई। ज्वार का ऊँचा वक़्त बारह बजकर चालीस मिनट पर था।
यह उस काम का सबसे साफ़ हिसाब है। बारिश और ऊँचा ज्वार एक साथ पड़ें तो शहर डूबता है, और बीच के घंटे वही होते हैं जिनमें पंप चलाकर सम्प ख़ाली रखना पड़ता है। साढ़े ग्यारह पर संतोष ने जाली खींची। उस पर कुछ नहीं आया।
उसने सोचा कि बारिश रुक गई है, इसलिए बहाव कम होगा। पर पानी कम नहीं था। बिलकुल नहीं। सम्प का तल हर मिनट चढ़ रहा था और वह उसी रफ़्तार से चढ़ रहा था जिस रफ़्तार से तेज़ बारिश में चढ़ता है।
बारह बजे उसने ध्यान से दोबारा खींची। साफ़। साढ़े बारह पर, फिर एक बजे, फिर डेढ़ बजे। हर बार रेक ख़ाली बाहर आई। यह वह बात थी जो उसे समझ नहीं आ रही थी।
जो पानी शहर की सड़कों से होकर, बस्तियों के बीच से, नाले में गिरकर आता है, वह ख़ाली नहीं आ सकता। पिछले छह बरस में एक भी ऐसी रात नहीं गई थी जब जाली दो घंटे साफ़ रही हो। और पानी बिना रुके आता रहा।
दो बजे उसने तीनों पंप चालू कर दिए, जबकि आम तौर पर दो से काम चल जाता है। तीनों चलने पर भी तल गिरा नहीं। वह वहीं रुका रहा, फिर धीरे-धीरे ऊपर आने लगा। ढाई बजे वह ख़तरे वाली लाल लकीर से चार इंच नीचे था।
उससे ऊपर जाते ही सम्प का पानी उलटकर नाले में लौटता है और नाला पीछे की तरफ़ भरने लगता है। पीछे की तरफ़ नीची बस्ती थी, जिसमें उस वक़्त लोग सो रहे थे। अब एक ही चीज़ बची थी। सिर्फ़ एक।
समुद्र की तरफ़ एक और दरवाज़ा है, जिसे ज्वार वाला गेट कहते हैं। वह हाथ से खोला जाता है और उसका पहिया नीचे के चबूतरे पर लगा है, सम्प के किनारे, पानी से तीन फ़ुट ऊपर। ऊँचे ज्वार में उसे खोलने का मतलब समुद्र को अंदर आने देना है। इसीलिए वह आख़िरी चीज़ है।
पर ज्वार का ऊँचा वक़्त निकल चुका था और पानी उतरने लगा था, इसलिए अब उसे खोला जा सकता था। संतोष टॉर्च लेकर सीढ़ियों से नीचे उतरा।
चबूतरा सँकरा था और गीला था। एक तरफ़ दीवार थी और दूसरी तरफ़ सम्प, जिसमें उस वक़्त तेरह फ़ुट पानी था और वह घूम रहा था, क्योंकि तीनों पंप खींच रहे थे। पहिया कड़ा था। उसे दोनों हाथों से घुमाना पड़ा।
घुमाते वक़्त उसका मुँह दीवार की तरफ़ था और पीठ पानी की तरफ़। आठवें चक्कर पर उसे लगा कि पानी की आवाज़ बदल गई है।
बहते पानी की आवाज़ बराबर होती है। उसमें एक तरह की गड़गड़ाहट रहती है जो चलती रहती है। वह आवाज़ रुकी नहीं थी, पर उसमें एक और चीज़ आ गई थी, जो बीच-बीच में आती थी और जो पानी की नहीं थी।
संतोष ने पहिया घुमाना बंद नहीं किया। एक चक्कर भी नहीं छोड़ा। उसने बारह चक्कर पूरे किए, जितने चाहिए थे, और गेट खुल गया। गेट खुलते ही तल गिरना शुरू हुआ। छह मिनट में वह लाल लकीर से डेढ़ फ़ुट नीचे था।
उसके बाद ही उसने पीछे देखा। पानी वैसा ही घूम रहा था। उस पर कुछ नहीं तैर रहा था और जाली अब भी साफ़ थी। वह ऊपर आया और बाक़ी रात कमरे में बैठा रहा। सुबह पाँच बजे से जाली फिर भरने लगी। जैसे रोज़ भरती है।
पहली बार में थैलियाँ आईं, फिर एक चप्पल, फिर वही सब जो रोज़ आता है। छह बजे तक चबूतरे पर उतना ही कचरा जमा हो चुका था जितना ऐसी रात के बाद होना चाहिए। काशीनाथ सात बजे पहुँचा और उसने पूछा कि रात कैसी रही।
संतोष ने कहा कि ठीक रही।
वह उस स्टेशन पर अब भी है और उसकी पाली अब भी रात की है। रेक पहले गेट वाली सीढ़ी के पास टँगी रहती थी, जहाँ से उठाकर सीधे नीचे उतरा जा सकता था। संतोष ने उसे दूसरी दीवार पर टँगवा दिया है, पूरे कमरे के उस पार, और अब जाली साफ़ करने के लिए हर बार पूरा कमरा पार करके रेक लानी पड़ती है और फिर वापस टाँगनी पड़ती है।