चौदह नंबर की चादर सुबह फिर ढीली मिली, उसी जगह से। गुरनाम ने उसे दोबारा खींचकर रेत की बोरी से दबा दिया। मोगा के उस गोदाम में उन दिनों गेहूँ की बत्तीस हज़ार बोरियाँ पड़ी थीं।
सब अंदर नहीं समातीं। जो नहीं समातीं वे बाहर पक्के चबूतरों पर ढेर बनाकर रखी जाती हैं और उन पर तिरपाल चढ़ा दी जाती है। बरसात में यही सबसे बड़ा काम रहता है, क्योंकि एक जगह से पानी घुसे तो नीचे तक चला जाता है।
गुरनाम वहाँ तकनीकी सहायक था और सत्रह बरस से यही देख रहा था। जून के आख़िर में सुमेलन शुरू होता है, जिसे वहाँ धूनी कहते हैं।
अनाज में कीड़ा लगता है और उसे मारने के लिए पूरे ढेर को गैस वाली चादर से ढककर, चारों तरफ़ से रेत की बोरियों से सील करके, सात दिन बंद रखा जाता है। अंदर गोलियाँ रख दी जाती हैं, जिनसे गैस बनती है।
उस गैस के बारे में एक ही बात याद रखने लायक़ है। सात दिन के बाद उस चादर के नीचे कुछ ज़िंदा नहीं बचता।
कीड़ा नहीं। चूहा नहीं। कुछ नहीं।
इसीलिए धूनी वाले ढेरों के चारों तरफ़ लाल झंडी लगाई जाती है और रात को चौकीदार उधर नहीं जाता। चौदह नंबर की धूनी सत्रह जून को चढ़ी थी। अठारह की सुबह चादर ढीली मिली। एक ही जगह से।
यह होता है। हवा चलती है, रेत की बोरी सरक जाती है, और चादर का कोना ऊपर उठ आता है। गुरनाम ने उसे ठीक कर दिया और गैस का नाप लिया। नाप लेने का तरीक़ा यह है कि चादर के नीचे से एक पतली नली निकली रहती है और उसमें मीटर लगाकर देखा जाता है कि अंदर गैस कितनी है।
उन्नीस की सुबह नाप गिरी हुई थी। गैस अपने आप कम नहीं होती। वह या तो बाहर निकल रही होती है, या कोई चीज़ उसे सोख रही होती है। गुरनाम ने पूरी चादर के किनारे दोबारा देखे और कहीं से लीक नहीं मिली।
उसने और गोलियाँ डलवाईं। दुगनी। बीस की सुबह नाप फिर गिरी हुई थी और चादर उसी जगह से फिर ढीली थी। पश्चिम की तरफ़ का कोना, नीचे से तीसरी क़तार के पास। इक्कीस को उसने वहाँ रेत की चार बोरियाँ और रखवा दीं। कुल आठ हो गईं।
बाईस की सुबह चारों बोरियाँ अपनी जगह पर थीं और चादर उनके बीच से उठी हुई थी। गुरनाम उस सुबह देर तक वहीं खड़ा रहा। किसी को बुलाया नहीं।
एक ढेर में साढ़े तीन हज़ार बोरियाँ होती हैं और वह छह क़तार ऊँचा होता है। उसके अंदर हवा के लिए जगह होती है, पर उतनी नहीं कि कुछ हिल सके। बोरियाँ एक-दूसरे पर कसकर चिनी जाती हैं और नीचे वाली पर ऊपर वाली सब का बोझ रहता है।
उसने प्रबंधक को बताया। दोपहर में।
प्रबंधक ने वही कहा जो कोई भी कहता। कि चूहे होंगे, कि नीचे की बोरी फट गई होगी और अनाज खिसक रहा होगा, और कि धूनी सात दिन की है, तेईस को खुलेगी ही, तब देख लेना। तेईस को धूनी खुलनी थी और उससे पहले तीन बजे बारिश शुरू हो गई।
बारिश में चादर नहीं खोली जाती, क्योंकि खुलते ही पानी अंदर चला जाता है। इसलिए खोलने का काम रात नौ बजे तक टलता रहा, जब पानी रुका। गैस निकालने के लिए चादर पहले एक कोने से उठाई जाती है और आधा घंटा हवा लगने दी जाती है।
गुरनाम ने पश्चिम वाला कोना चुना। वही जो रोज़ ढीला मिलता था। मुँह पर कपड़ा बाँधकर उसने चादर उठाई और टॉर्च अंदर की। बोरियाँ वैसी ही चिनी हुई थीं जैसी चढ़ाई गई थीं। एक भी टेढ़ी नहीं थी और एक भी फटी नहीं थी।
पर नीचे से तीसरी क़तार में एक बोरी का मुँह खुला हुआ था।
बोरी सिली हुई आती है और उसका मुँह ऊपर की तरफ़ रहता है। सिलाई कटी हुई नहीं थी। धागा साबुत था और बस खिंचकर ढीला पड़ गया था, जैसे किसी ने उसे उधेड़ने के बजाय खींचकर खोला हो। जो दिख रहा था वह हरा था।
गुरनाम ने टॉर्च और पास की। फिर और पास।
बोरी के मुँह पर, गेहूँ के ऊपर की परत में, अंकुर निकले हुए थे। सफ़ेद जड़ें और उनके ऊपर हरी नोकें, आधा-आधा इंच की, और वे एक-दो नहीं थीं, पूरा मुँह भरा हुआ था। अनाज को उगने के लिए तीन चीज़ें चाहिए। पानी, हवा और गरमी।
उस चादर के नीचे सात दिन से पानी नहीं गया था, हवा की जगह गैस थी, और गैस ऐसी थी जिसमें अंकुर तो दूर, चूहा भी नहीं बचता। उसने हाथ नहीं लगाया। एक उँगली भी नहीं।
उसने चादर वापस गिराई और रेत की बोरियाँ अपनी जगह रख दीं, जो उस हालत में करने वाला काम नहीं था और जिसे उसने बाद में किसी को बताया भी नहीं। फिर वह गोदाम के दफ़्तर में चला गया। सुबह तक वहीं बैठा रहा।
चौबीस की सुबह धूनी दिन के उजाले में खोली गई, चार आदमियों के साथ। उस बोरी का मुँह सिला हुआ था। धागा कसा हुआ था। गुरनाम ने उसे ख़ुद खोलकर देखा। अंदर सूखा गेहूँ था, साफ़, बिना कीड़े का, और उसमें एक भी अंकुर नहीं था।
बाक़ी सब ढेर उस मौसम में ठीक निकले और चौदह नंबर का माल भी ठीक निकला। वह सितंबर में उठकर चला गया। उस चबूतरे पर उसके बाद ढेर नहीं लगा। एक बार भी नहीं।
वजह में यह लिखा गया कि फ़र्श का ढाल ठीक नहीं है और बरसात में पानी वहीं रुकता है, जो सच भी था और सत्रह बरस से सच था। गोदाम के नक्शे में चबूतरों की गिनती अब तेरह के बाद सीधे पंद्रह पर जाती है, और नए आदमी को यह बता दिया जाता है कि चौदह कभी बना ही नहीं था।