कोसी की बाढ़ हर बरस नहीं आती, पर जिस बरस आती है उस बरस पूरा गाँव उठकर बाँध पर चला जाता है। उस बरस पानी आठ अगस्त की रात आया और गाँव को निकलने में चार घंटे मिले। बाँध पर लगभग दो हज़ार लोग थे और वे उन्नीस दिन वहाँ रहे।

बाँध पर रहना अपने आप में एक इंतज़ाम होता है। तिरपाल तनते हैं, चूल्हे बनते हैं, और गाँव वहाँ भी उसी क्रम में बस जाता है जिस क्रम में वह नीचे बसा था। पड़ोसी वहाँ भी पड़ोसी रहते हैं। इन उन्नीस दिनों में दो बच्चे पैदा हुए और एक बूढ़ा गुज़रा, और दोनों बातें वहीं निपटाई गईं।

पानी उतरने में नौ दिन लगे।

जब लोग लौटे तो जो मिला वह गाद थी। घुटने तक। गलियों में, आँगन में, कमरों में। उसमें बरतन धँसे हुए थे और चारपाइयाँ आधी दबी हुई थीं। यह हर बाढ़ में होता है और गाँव इसे जानता है। सफ़ाई में हफ़्ता लगता है और उसके बाद ज़िंदगी लौट आती है।

इस बार एक चीज़ अलग थी।

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पानी का टैंक

जगदेई के घर के पिछवाड़े में एक कुआँ था, पुराना, जो बीस बरस से बंद पड़ा था और जिसके ऊपर पत्थर की सिल रख दी गई थी।

सिल हट चुकी थी। पूरी।

यह बाढ़ में हो सकता है। पानी का बहाव पत्थर सरका देता है और यह हैरत की बात नहीं। हैरत की बात यह थी कि सिल कुएँ से आठ क़दम दूर पड़ी थी और उसके नीचे की गाद दबी हुई नहीं थी।

गाद तब दबती है जब कोई चीज़ पानी के साथ आकर उस पर गिरे। अगर वह चीज़ पानी उतरने के बाद वहाँ रखी गई हो, तो नीचे की गाद दबेगी। यहाँ गाद ऊपर से साफ़ थी और सिल उस पर पड़ी थी।

जगदेई ने यह किसी को नहीं बताया, पहले दिन।

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उसकी उम्र अड़सठ थी और उसने अपनी ज़िंदगी में सात बाढ़ें देखी थीं। वह जानता था कि बाढ़ के बाद गाँव में अफ़वाहें उड़ती हैं और उनसे कोई फ़ायदा नहीं होता। पहले तीन दिन उसने वही किया जो बाक़ी सब कर रहे थे, यानी गाद निकाली, और शाम को वह पिछवाड़े जाकर खड़ा हो जाता था।

दूसरे दिन उसने कुएँ में झाँका।

उसमें पानी था, ऊपर तक, क्योंकि पूरा इलाक़ा भरा हुआ था। पानी काला था और उस पर तेल जैसी परत तैर रही थी, जो बाढ़ के पानी पर हमेशा रहती है। उसे नीचे कुछ नहीं दिखा। पानी ऊपर तक था।

तीसरे दिन गाँव में यह ख़बर आई कि ऊपर से पानी दोबारा छोड़ा जा रहा है और दूसरी लहर तीन दिन में आ सकती है। गाँव को फिर बाँध पर जाना था। उसी शाम जगदेई की बहू ने कहा कि उसे कुएँ से आवाज़ आई है।

जगदेई ने पूछा कि कैसी। उसने कहा कि पानी हिलने की। बंद कुएँ में पानी हिलता नहीं, जब तक कोई चीज़ उसे हिलाए नहीं। जगदेई अकेला गया, अँधेरे में, लालटेन लेकर। उसने लालटेन नीचे लटकाई, रस्सी से। पानी की सतह उसे साफ़ दिखी और उस पर कुछ नहीं था।

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पर लालटेन जब नीचे पहुँची तो उसकी लौ एक तरफ़ को झुक गई, जैसे उसमें हवा लगी हो। बीस बरस से बंद कुएँ में, जिसके ऊपर सिल रखी थी, हवा का चलना उतनी ही बड़ी बात है जितनी पानी का हिलना।

उसने रस्सी खींची और लालटेन ऊपर निकाली।

लालटेन ऊपर आते-आते सीधी जल रही थी। उसने उसे दोबारा नीचे उतारा और वही हुआ। तीसरी बार उसने उसे आधे रास्ते पर रोका और वहाँ लौ सीधी थी, और नीचे जाते ही झुक गई। इसका मतलब यह था कि हवा किसी एक जगह से आ रही है, और कुएँ की गोल दीवार में ऐसी कोई जगह नहीं होनी चाहिए।

उसके सामने अब एक बात तय करनी थी।

अगर वह इसे किसी को बताता, तो गाँव उस रात बाँध पर नहीं जाता, क्योंकि लोग रुककर देखना चाहते। और दूसरी लहर तीन दिन में नहीं, कभी-कभी दो दिन में आ जाती है। उसने किसी को नहीं बताया। उसने ऊपर वाला रास्ता चुना।

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उसने सिल वापस कुएँ पर चढ़ाई। यह अकेले नहीं हुआ, उसने अपने लड़के को बुलाया और दोनों ने मिलकर की, और लड़के ने पूछा कि यह अभी क्यों, और उसने कहा कि बाढ़ में बच्चा गिर सकता है। यह वजह ठीक थी। लड़के ने मान ली।

जाते हुए उसने पिछवाड़े से होकर रास्ता लिया, जो सीधा नहीं पड़ता। सिल अपनी जगह थी और उस पर उसके अपने और लड़के के हाथों के निशान गाद में बने हुए थे। उसने उन्हें पैर से मिटा दिया, और यह उसने क्यों किया, इसका जवाब उसके पास उस वक़्त भी नहीं था।

गाँव अगली सुबह बाँध पर चला गया। दूसरी लहर उस बार नहीं आई। ऊपर से छोड़ा गया पानी रास्ते में ही फैल गया। लोग सात दिन बाद लौट आए और सफ़ाई फिर से शुरू हुई। जगदेई उसके बाद उस कुएँ की तरफ़ नहीं गया।

अगले बरस उसके लड़के ने उस पर पक्की जगत बनवा दी और सिल की जगह सीमेंट का ढक्कन डलवा दिया, और उसमें दो लोहे के कड़े लगवाए ताकि उसे उठाया न जा सके, सिर्फ़ खिसकाया जा सके, और खिसकाने के लिए दो आदमी चाहिए।