स्कूल की छत पर टैंक सीमेंट का था और उसका ढक्कन लोहे की चादर का था, जिस पर पत्थर रखा रहता था ताकि हवा से न उड़े।
झिंगुर उस स्कूल में चपरासी था और पंप चलाना उसी का काम था। सुबह सात बजे वह मोटर चलाता, चालीस मिनट बाद बंद करता, और दिन भर उसी पानी से काम चलता। यह वह उन्नीस बरस से कर रहा था।
रजिस्टर में लिखा था कि टैंक साल में एक बार साफ़ होता है। यह लिखा हुआ था और होता नहीं था। सफ़ाई का जो पैसा आता था वह किसी और मद में चला जाता था और यह बात स्कूल में सबको मालूम थी।
गर्मी में हर साल दो हफ़्ते ऐसे आते थे जब बच्चे कहते थे कि पानी में लोहे का स्वाद है। यह मई के आख़िर में होता था, जब टैंक का पानी नीचे चला जाता था और मोटर को दिन में दो बार चलाना पड़ता था।
बच्चे इसकी शिकायत करते थे और शिकायत का तरीक़ा वही था जो बच्चों का होता है। कोई कहता कि आज पानी अच्छा नहीं है। कोई घर से बोतल लाने लगता। एक-दो हफ़्ते बाद बरसात शुरू हो जाती, टैंक ऊपर तक भर जाता, और बात अपने आप ख़त्म हो जाती। यह उन्नीस बरस में इतनी बार हो चुका था कि अब यह मौसम का हिस्सा लगता था।
किसी ने कभी इसकी जाँच नहीं की। लोहे का स्वाद किसी को अजीब नहीं लगता, क्योंकि छतरपुर की तरफ़ ज़मीन के पानी में लोहा रहता ही है। फ़रज़ाना उस स्कूल में नई आई थी। उसने जून के पहले हफ़्ते में यह सवाल पूछा कि टैंक आख़िरी बार कब खुला था।
हेडमास्टर ने रजिस्टर दिखाया। फ़रज़ाना ने पूछा कि रजिस्टर नहीं, टैंक कब खुला था। इसका जवाब किसी के पास नहीं था।
उसने झिंगुर से पूछा।
झिंगुर ने कहा कि उसने कभी नहीं खोला। उसने यह छिपाकर नहीं कहा। उसने कहा कि खोलने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, कि पानी आता रहा, और कि ढक्कन पर पत्थर उसने ही रखा था, पंद्रह-सोलह बरस पहले।
फ़रज़ाना ने कहा कि खोलना पड़ेगा।
हेडमास्टर ने इसमें दिलचस्पी नहीं ली और मना भी नहीं किया। उसने कहा कि जो करना है कर लो, पर छुट्टी के दिन करना, और मिस्त्री का पैसा स्कूल नहीं देगा। फ़रज़ाना ने वह पैसा अपने पास से दिया, दो सौ रुपये, और यह बात उसने बाद में किसी को नहीं बताई क्योंकि इसका कोई मतलब नहीं था।
यह काम शनिवार को हुआ, छुट्टी के दिन, जब बच्चे नहीं थे। झिंगुर, फ़रज़ाना, और फेंकू, जो गाँव का मिस्त्री था और जिसे सीढ़ी लेकर बुलाया गया था। पत्थर हटा। चादर उठी। भीतर से जो हवा निकली उसे फेंकू ने सूँघा और वह दो क़दम पीछे हट गया।
टैंक में पानी दो फ़ुट था। फेंकू भीतर उतरा, रस्सी बाँधकर, और उसने टॉर्च से नीचे देखा। वह चार मिनट भीतर रहा। बाहर आकर उसने कुछ नहीं कहा। उसने अपने हाथ तीन बार धोए और फिर वह छत के किनारे जाकर बैठ गया।
फ़रज़ाना ने पूछा कि क्या है। फेंकू ने कहा कि निकालना पड़ेगा और उसके लिए दो आदमी और चाहिए। जो निकाला गया उसका वज़न फेंकू ने बताया नहीं और फ़रज़ाना ने पूछा नहीं। वह एक बोरी में गया और बोरी बंद करके नीचे उतारी गई।
झिंगुर उस पूरे वक़्त सीढ़ी के नीचे खड़ा रहा और उसने ऊपर नहीं देखा। पुलिस उसी शाम आई।
जो बात आगे चली वह यह थी कि वहाँ जो मिला वह कितना पुराना था, और इसका जवाब कभी साफ़ नहीं मिला। रिपोर्ट में सात से बारह साल लिखा गया, जो कोई जवाब नहीं है। स्कूल में तीन सौ चालीस बच्चे थे।
फ़रज़ाना के सामने एक सवाल था जिसका जवाब उसे उसी हफ़्ते देना था। अगर बात पूरी तरह बाहर जाती, तो स्कूल का पानी बंद होता और उसके बाद बच्चे आना बंद कर देते, क्योंकि उस गाँव में कोई दूसरा स्कूल नहीं था।
उससे यह सीधे किसी ने नहीं कहा। हेडमास्टर ने उससे इतना कहा कि सोच लेना, और गाँव के दो लोग स्कूल आकर बैठे और उन्होंने बच्चों की पढ़ाई की बात की। किसी ने उसे धमकाया नहीं। सबने उसे वही बात अलग-अलग तरीक़े से समझाई, कि जो हो चुका है वह लौटेगा नहीं और जो आगे है वह इन तीन सौ चालीस बच्चों का है।
उसने बात बाहर जाने दी।
स्कूल छब्बीस दिन बंद रहा। इन छब्बीस दिनों में सत्रह बच्चों ने आना छोड़ दिया और उनमें से नौ अगले सत्र में लौटे। टैंक तोड़ा नहीं गया, क्योंकि उसे तोड़ने पर छत बैठ जाती। उसमें सीमेंट भरकर उसे बंद कर दिया गया और स्कूल के आँगन में एक हैंडपंप गड़ा।
झिंगुर उन्नीस बरस पूरे करके अगले साल रिटायर हो गया और उसे विदाई में एक शॉल दी गई।
छत पर वह ढक्कन वाली जगह अब भी है, पर उस पर उसी रंग का पेंट कर दिया गया है जिस रंग का टैंक है, इसलिए नीचे आँगन में खड़े होकर देखने पर यह नहीं दिखता कि वहाँ कभी कोई ढक्कन था।