गोपालगंज के उस गाँव में कुत्ते सत्रह-अठारह थे और वे रात में गली में रहते थे।
उनका तरीक़ा तय था। जो भी गली में घुसता, पहले एक भौंकता, फिर बाक़ी सब उठ जाते, और वह आदमी जब तक अपने दरवाज़े तक नहीं पहुँच जाता तब तक साथ चलते रहते। यह हर घर पर होता था। बिना नागा।
एक घर पर नहीं होता था।
वह घर गली के आख़िर में था और वह छह बरस से बंद पड़ा था। उसमें जो परिवार रहता था वह बाहर चला गया था और लौटा नहीं था। दरवाज़े पर ताला था और वह ताला अब जंग खा चुका था।
कुत्ते उस घर के सामने से गुज़रते हुए चुप हो जाते थे। यह किसी को अजीब नहीं लगता था, क्योंकि यह ऐसी चीज़ है जिस पर तब तक ध्यान नहीं जाता जब तक कोई उसे कहकर न बताए। शराफ़त ने पहली बार इस पर ध्यान दिया, जाड़े में।
उसकी उम्र चालीस के आसपास थी और वह उसी गाँव में पैदा हुआ था। उस बंद घर में जो परिवार रहता था उसे वह बचपन से जानता था। उनके यहाँ जाना-आना था और उनका सबसे छोटा लड़का उसके साथ पढ़ा था। वे लोग रोज़गार की वजह से गए थे और उसमें कुछ भी अजीब नहीं था, और यह बात उसने ख़ुद को कई बार याद दिलाई।
उसकी दुकान क़स्बे में थी और वह रात नौ बजे के बाद लौटता था, साइकिल से, और आख़िरी डेढ़ किलोमीटर कच्चा रास्ता था। गली में घुसते ही कुत्ते उठते थे और उसके साथ चलते थे। उसे इसकी आदत थी और यह उसे अच्छा लगता था, क्योंकि अँधेरे में साथ अच्छा लगता है।
बंद घर के सामने वे रुक जाते थे। रुक जाते थे, यह ठीक शब्द नहीं है। वे चलते रहते थे, पर आवाज़ बंद कर देते थे, और घर पार होते ही फिर शुरू हो जाते थे। यह घर तीन घर पहले पड़ता था।
शराफ़त ने एक रात प्रयोग किया। वह बंद घर के सामने रुक गया और उसने देखा कि कुत्ते क्या करते हैं। वे उसके साथ नहीं रुके। वे आगे बढ़ गए और गली के मोड़ पर जाकर बैठ गए, और वहीं से उसे देखते रहे।
वह वहाँ अकेला खड़ा था।
गली उस जगह सबसे सँकरी है और दोनों तरफ़ की दीवारें ऊँची हैं। दिन में भी वहाँ धूप नहीं आती। रात में जो रोशनी होती है वह गली के दूसरे सिरे वाले खंभे से आती है और वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते वह सिर्फ़ इतनी रह जाती है कि ज़मीन दिख जाए।
उसने ऊपर देखा। घर की ऊपरी मंज़िल पर एक खिड़की थी और उसका पल्ला भीतर की तरफ़ खुला हुआ था। छह बरस से बंद घर में खिड़की का पल्ला खुला होना बड़ी बात नहीं है। हवा से खुल जाता है।
अगली रात उसने फिर देखा और पल्ला बंद था। तीसरी रात वह फिर खुला हुआ था।
उसने यह बात दुकान पर एक-दो लोगों से कही और उसे यही जवाब मिला कि हवा है। यह मुमकिन था और वह इसे मान भी लेता, अगर उस गली में हवा चलती होती। गली दोनों तरफ़ से घिरी थी और उसमें जाड़े में हवा नहीं आती थी।
फ़रवरी में एक रात उसकी साइकिल की चेन गली में ही उतर गई। वह बंद घर से दो क़दम आगे था।
उसने साइकिल खड़ी की और नीचे बैठकर चेन चढ़ाने लगा। इसमें दो मिनट लगते हैं और उसके हाथ काले हो जाते हैं और उस दो मिनट में आदमी नीचे देख रहा होता है। उसे तब यह महसूस हुआ कि कुत्ते चुप हैं।
वह उसी जगह था। उसने चेन छोड़ दी और वह उठकर खड़ा हो गया। मोड़ पर सारे कुत्ते बैठे थे। सत्रह-अठारह। सब उसकी तरफ़ देख रहे थे और उनमें से एक भी आवाज़ नहीं कर रहा था। उसे यह तय करना था कि वह साइकिल छोड़कर भागे या चेन चढ़ाकर जाए।
उसने चेन चढ़ाई। उसने भागना नहीं चुना। इसमें उसे उस रात चार मिनट लगे, क्योंकि हाथ काँप रहे थे, और उन चार मिनट में उसने एक बार भी ऊपर नहीं देखा। फिर वह साइकिल लेकर चला और तीन घर पार करके अपने दरवाज़े पर पहुँचा, और उसके पीछे-पीछे कुत्ते फिर से भौंकते हुए आए, जैसे वे हमेशा आते थे।
उसने उस रात के बाद वह रास्ता छोड़ दिया।
यह उसने अपनी पत्नी को बताकर नहीं किया। उसने घर पर इतना कहा कि खेतों वाला रास्ता सूख गया है और अब उधर से आना आसान है। जाड़े भर वह उसी से आता रहा और गर्मी में भी उसने रास्ता नहीं बदला, हालाँकि गर्मी में खेतों वाले रास्ते पर साँप निकलते हैं और यह उसे मालूम था।
वह लंबा रास्ता लेने लगा, जो खेतों के किनारे से जाता है और जिसमें आठ मिनट ज़्यादा लगते हैं और जिसमें कुत्ते नहीं होते। बंद घर वाला ताला अगले बरस टूटा, जब उस परिवार का एक आदमी काग़ज़ात के सिलसिले में आया।
भीतर धूल थी और सामान वैसा ही पड़ा था जैसा छोड़ा गया था। ऊपर वाले कमरे में कुछ नहीं था। खिड़की का पल्ला उस दिन खुला हुआ था और उसकी चूल में दोनों तरफ़ जंग जमी थी, इतनी कि उसे हिलाने में ज़ोर लगाना पड़ा।