नदी के भीतर पुल का पाया बनाने का तरीक़ा पुराना है और वह डरावना लगता है, हालाँकि वह डरावना नहीं है।

लोहे का एक बड़ा कुआँ नदी में उतारा जाता है, ऊपर से बंद और नीचे से खुला। उसके भीतर हवा भरी जाती है, दबाव के साथ, और वह दबाव पानी को नीचे से भीतर आने नहीं देता। उस हवा की वजह से नीचे एक सूखी जगह बन जाती है, नदी की तली पर, और आदमी उसमें उतरकर खुदाई करते हैं।

इसे केसन कहते हैं और सोन पर उस पुल के लिए चार बने थे। माणिक और केशव दोनों उसी टीम में थे जो नीचे जाती थी।

नीचे जाने वालों की मज़दूरी बाक़ियों से डेढ़ गुना थी और इसकी वजह ख़तरा नहीं, तकलीफ़ थी। दबाव में डेढ़ घंटा काटने के बाद ऊपर आकर आदमी को कुछ देर बैठना पड़ता है और उसके बाद भी कान में कई घंटे भारीपन रहता है। जो लोग यह काम बरसों करते हैं उनके जोड़ों में दिक़्क़त शुरू हो जाती है।

उतरने का रास्ता एक लोहे का पाइप होता है जिसमें सीढ़ी लगी रहती है, और उसके बीच में दो दरवाज़े होते हैं जो एक साथ नहीं खुलते, वरना दबाव निकल जाए। नीचे की हवा भारी होती है। कान बंद होते हैं, आवाज़ अलग सुनाई देती है, और आदमी जल्दी थकता है। इसीलिए वहाँ शिफ़्ट डेढ़ घंटे की होती है।

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उस रात वे छह लोग नीचे थे। तली की मिट्टी बालू वाली थी और उसमें फावड़ा आसानी से चलता था। एक घंटे बाद केशव ने काम रोक दिया। उसने कहा कि कोई खटखटा रहा है। बाक़ी पाँच ने सुना और उन्हें भी सुनाई दिया।

आवाज़ लोहे पर लोहे की थी और वह केसन की दीवार से आ रही थी।

उस जगह की दीवार आधा इंच मोटी लोहे की चादर है और उसके बाहर नदी की तली की मिट्टी है, जो वहाँ लगभग तीन फ़ुट है, और उसके ऊपर पानी। मिट्टी में से आवाज़ लोहे तक पहुँचने के लिए किसी ठोस चीज़ का उससे टकराना ज़रूरी है, और नदी की तली में इतनी नीचे ठोस चीज़ें नहीं होतीं।

यह अजीब नहीं है। ऊपर से इसी तरह इशारा किया जाता है, ठोंककर, क्योंकि उस दबाव में आवाज़ ठीक से नहीं जाती। इशारे तय होते हैं। दो बार का मतलब है ऊपर आओ। तीन बार का मतलब है ख़तरा। यह आवाज़ न दो बार थी न तीन। वह लगातार थी।

और वह ऊपर से नहीं आ रही थी।

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वह बग़ल से आ रही थी, दीवार के उस हिस्से से जो नदी की तली में धँसा हुआ था और जिसके बाहर मिट्टी थी और उसके ऊपर बीस फ़ुट पानी। माणिक ने सबको रोका और वह दीवार के पास गया।

उसने कान लगाया। आवाज़ वहीं से थी। उसमें कोई क्रम नहीं था और वह रुकती नहीं थी। उसने अपने हथौड़े से दीवार पर दो बार ठोंका। आवाज़ बंद हो गई। छह आदमी वहाँ खड़े रहे और उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ नहीं देखा, क्योंकि उस रोशनी में चेहरा साफ़ नहीं दिखता।

फिर आवाज़ फिर शुरू हुई। इस बार वह दो बार आई। रुकी। फिर दो बार। वही जवाब जो माणिक ने दिया था। केशव ऊपर जाने के लिए मुड़ा।

माणिक ने उसे रोका, और उसने ठीक किया, क्योंकि ऐसे दबाव में तेज़ी से ऊपर जाना ख़तरनाक होता है और उसमें आदमी मरते हैं। ऊपर जाने में तय वक़्त लगता है और वह वक़्त कम नहीं किया जा सकता। उसने सबसे कहा कि काम पूरा करो।

यह उसने इसलिए कहा कि उसके पास कोई और रास्ता नहीं था। तय वक़्त से पहले ऊपर बुलाने के लिए तीन बार ठोंकना पड़ता है, और वह इशारा उस रात उस दीवार को भी सुनाई देता। इससे बचने का एक ही तरीक़ा था, यानी शिफ़्ट पूरी करना और तय तरीक़े से ऊपर जाना।

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बाक़ी तीस मिनट उन्होंने वहीं काटे।

आवाज़ उस पूरे वक़्त आती रही और वह हर बार वही दोहराती रही जो कोई ठोंकता था, और थोड़ी देर बाद उन्होंने ठोंकना बंद कर दिया, और तब वह भी बंद हो गई।

ऊपर आकर उन्होंने बताया।

इंजीनियर ने कहा कि यह होता है। दबाव में लोहे की चादर सिकुड़ती-फैलती है और उसमें आवाज़ बनती है, और यह जाना-पहचाना है। यह वजह ठीक थी और उसे सुनकर तीन आदमियों को तसल्ली हो गई। माणिक को नहीं हुई, क्योंकि सिकुड़ती चादर जवाब नहीं देती।

वह उस केसन में उसके बाद तीन बार और उतरा, क्योंकि यह उसका काम था और छोड़ने का मतलब था कि उस महीने का पैसा नहीं मिलता। उन तीनों बार आवाज़ नहीं आई। केसन दो हफ़्ते बाद भर दिया गया।

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उन दो हफ़्तों में वहाँ काम चलता रहा और बाक़ी टीमें भी उतरीं। किसी और ने कोई आवाज़ नहीं सुनी। माणिक ने यह दो लोगों से पूछा और दोनों ने कहा कि कुछ नहीं हुआ, और उन दोनों को इस सवाल पर कोई हैरत भी नहीं हुई, क्योंकि नीचे उतरने वाले आपस में ऐसी बातें करते रहते हैं।

यह तय काम है। खुदाई पूरी होने के बाद उसमें कंक्रीट भरा जाता है, ऊपर तक, और उसी पर पुल का पाया खड़ा होता है। भरते वक़्त माणिक वहीं था और उसने पूरा भरते देखा, जिसमें दो दिन लगे। पुल अगले बरस बन गया और उस पर गाड़ियाँ चलने लगीं।

माणिक उस रास्ते से कई बार गुज़रा है। वह पुल पर रुकता नहीं और उसने कभी नीचे नहीं देखा, और यह उसने तय करके किया है, क्योंकि उसे यह मालूम है कि तीसरा पाया कौन सा है।