कोडरमा की तरफ़ अभ्रक की पुरानी खदानें जगह-जगह हैं और उनमें से ज़्यादातर बंद हैं।

बंद होने का मतलब यह नहीं कि उनमें कोई नहीं जाता। ऊपर की परत में अब भी अभ्रक निकल आता है और उसे बीनने वाले लोग हैं, ज़्यादातर औरतें और बच्चे, जो दिन में खुले गड्ढों से चुनते हैं। भीतर जाना अलग बात है।

सतुआ और मैकूलाल भीतर जाते थे।

यह ग़ैरक़ानूनी था और इसे रोकने वाला कोई नहीं था। खदान का पट्टा जिस कंपनी के पास था वह बरसों पहले काम बंद कर चुकी थी और मुहाने पर जो पत्थर चिनवाए गए थे वे भी बरसों पहले हटा दिए गए थे। साल में एक-दो बार कोई सरकारी आदमी आता था, बाहर से देखकर लौट जाता था, और उसमें भी किसी को कोई हैरत नहीं होती थी।

भीतर की सुरंगें बीस-बाईस बरस पहले खोदी गई थीं और उनकी छत लकड़ी के गुटकों पर टिकी थी, जो अब गल चुके थे। वहाँ जो अभ्रक बचा था वह अच्छा था और उसका दाम ऊपर वाले से चार गुना मिलता था।

📚 यह भी पढ़ें पुल
पुल

उनका तरीक़ा तय था। दो आदमी भीतर, एक बाहर। बाहर वाला बैठा रहता था और वह घड़ी देखता रहता था। टॉर्च दो थीं और बैटरी की उम्र लगभग दो घंटे थी। यही उनका असली नाप था। दो घंटे में जितना निकल जाए।

उस दिन बाहर वाला आदमी नहीं आया। उसकी बीवी बीमार थी और उसने ख़बर भिजवा दी थी। सतुआ ने कहा कि आज रहने देते हैं। मैकूलाल ने कहा कि दो आदमी काफ़ी हैं और बाहर बैठने वाला वैसे भी कुछ नहीं करता।

यह बात ग़लत थी और दोनों को मालूम थी। बाहर वाला घड़ी देखता है और यही उसका काम है।

वे दोनों भीतर गए।

भीतर की हवा में धूल हमेशा रहती है और वह बैठती नहीं, क्योंकि हवा चलती नहीं। टॉर्च की रोशनी उस धूल में एक पट्टी की तरह दिखती है और उसके किनारे साफ़ होते हैं। इसी वजह से वहाँ रोशनी सीधी आगे नहीं जाती, वह थोड़ी दूर जाकर घुल जाती है, और चालीस-पचास क़दम से आगे कुछ नहीं दिखता।

📚 यह भी पढ़ें सुरंग
सुरंग

सुरंग शुरू में खड़े होकर चलने लायक़ है और लगभग सौ क़दम बाद झुकना पड़ता है। दो सौ क़दम पर वह बाईं तरफ़ मुड़ती है और वहीं से नीचे को ढलान शुरू होती है।

उन्होंने काम शुरू किया।

छेनी और हथौड़े की आवाज़ भीतर लौटकर आती है और उससे यह अंदाज़ा नहीं लगता कि आवाज़ किधर से आ रही है। यह वहाँ काम करने वाले जानते हैं और उस पर ध्यान नहीं देते। एक घंटा बीस मिनट बाद सतुआ ने अपनी टॉर्च उठाई और उसे दीवार की तरफ़ किया।

उसकी अपनी परछाईं दीवार पर पड़ी। मैकूलाल उसके बाईं तरफ़ बैठा था और उसकी परछाईं भी वहीं थी। तीसरी परछाईं उन दोनों के बीच थी।

वह छोटी नहीं थी और वह धुँधली भी नहीं थी। वह उन दोनों की परछाइयों जैसी ही थी, उतनी ही गहरी, और वह हिल नहीं रही थी। सतुआ ने टॉर्च थोड़ी सी घुमाई और तीनों परछाइयाँ उसी तरह घूमीं, जैसे तीनों के आगे कोई खड़ा हो।

📚 यह भी पढ़ें तीसरा बिस्तर
तीसरा बिस्तर

सतुआ ने टॉर्च नीचे कर ली। उसने मैकूलाल से कुछ नहीं कहा। उसने कहा कि चलो, बैटरी कम है। मैकूलाल ने घड़ी देखी और कहा कि चालीस मिनट और हैं। सतुआ ने दोबारा कहा। इस बार उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था कि मैकूलाल उठ गया।

लौटते वक़्त वे आगे-पीछे चलते हैं, क्योंकि सुरंग सँकरी है। सतुआ आगे था। ढलान चढ़ते वक़्त उसने पीछे रोशनी डाली, यह देखने के लिए कि मैकूलाल आ रहा है या नहीं। मैकूलाल आ रहा था। और उसके पीछे कोई और भी था।

सतुआ ने यह देखा और वह रुका नहीं। उसने रोशनी सीधी कर ली और चलता रहा, और उसने मैकूलाल से कुछ नहीं कहा।

यह उसने सोचकर किया।

उस जगह सुरंग इतनी सँकरी थी कि मुड़ना पड़ता और मुड़ने के लिए दोनों को रुकना पड़ता, और रुकने का मतलब था कि जो पीछे था वह पास आ जाता। वे मुहाने तक पहुँचे। बाहर निकलते ही सतुआ ने पलटकर देखा।

📚 यह भी पढ़ें पुल
पुल

मैकूलाल पीछे था और उसके पीछे सुरंग का अँधेरा था और उसमें कुछ नहीं था। उसने मैकूलाल से पूछा कि उसे रास्ते में कुछ महसूस हुआ। मैकूलाल ने कहा कि नहीं।

फिर उसने कहा कि एक बात हुई थी, कि उसे लग रहा था कि पीछे से कोई उसकी टॉर्च की रोशनी में चल रहा है, और उसने पीछे नहीं देखा क्योंकि उसे लगा कि यह उसका वहम है। दोनों में से किसी ने यह नहीं कहा कि उसने क्या देखा।

वे उस खदान में दोबारा नहीं गए।

इसका कारण उन्होंने आपस में तय नहीं किया। अगले दिन दोनों में इस पर कोई बात नहीं हुई और उसके अगले दिन भी नहीं। तीसरे दिन जब सतुआ ने छेनी और हथौड़ा उठाकर घर के भीतर रख दिया, तब मैकूलाल ने उसे देखा और उसने कुछ नहीं कहा।

मैकूलाल ने छह महीने बाद वह काम छोड़ दिया और वह ईंट भट्ठे पर चला गया, जहाँ मज़दूरी कम थी।

📚 यह भी पढ़ें सुरंग
सुरंग

सतुआ जाता रहा, पर सिर्फ़ ऊपर के खुले गड्ढों तक, दिन में, और उसने अपनी टॉर्च घर के ताक़ पर रख दी, जहाँ वह बरसों पड़ी रही और उसकी बैटरी भीतर ही गलकर बह गई।