उस सुरंग की लंबाई तीन किलोमीटर आठ सौ मीटर है और वह रत्नागिरी से थोड़ा उत्तर में पड़ती है। भीतर हर सौ मीटर पर दीवार में एक ताक़ कटी है, जिसे रिफ़्यूज कहते हैं। आदमी के खड़े होने भर की। ट्रेन आने पर उसी में घुसना होता है।

गैंग में छह आदमी थे और उनका काम रात के ब्लॉक में होता था, जब डेढ़ घंटे के लिए लाइन ख़ाली मिलती थी। सखाराम गैंगमैन था और गिनती उसकी ज़िम्मेदारी थी। छह भीतर, छह बाहर। यह नियम था और वह इसे हर बार निभाता था।

उस रात ब्लॉक साढ़े बारह से दो का था।

वे उत्तर वाले मुहाने से घुसे। पटरी के किनारे-किनारे चलते हुए, टॉर्च नीचे रखते हुए, क्योंकि भीतर टॉर्च ऊपर करने से कुछ दिखता नहीं, बस भाप जैसी चीज़ चमकने लगती है।

सुरंग के भीतर की हवा बाहर से अलग होती है। वह ठंडी नहीं होती, गीली होती है, और उसमें एक बू रहती है जो पत्थर और तेल और चूहों की मिलीजुली होती है। कोंकण की सुरंगों में पानी दीवारों से रिसता है और नीचे नाली में बहता रहता है, और उस बहने की आवाज़ रात भर बंद नहीं होती। नए आदमी को इसी आवाज़ से दिक़्क़त होती है, क्योंकि उसमें कुछ भी सुनाई दे सकता है।

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काम बाईसवें और तेईसवें रिफ़्यूज के बीच था। एक जगह पटरी के नीचे की गिट्टी बैठ गई थी।

इस काम में मशीन नहीं लगती। गिट्टी हाथ से भरनी होती है और फिर उसे लोहे की छड़ से स्लीपर के नीचे ठूँसना पड़ता है, जिसे पैकिंग कहते हैं। छह आदमी इसे चालीस मिनट में निपटा सकते हैं और उस रात उन्होंने यही किया। इस पूरे वक़्त शोर होता रहता है, लोहे पर लोहा, और सुरंग में वह शोर दोनों तरफ़ जाकर लौटता है।

उन्होंने चालीस मिनट काम किया। फिर वे दक्षिण वाले मुहाने की तरफ़ बढ़े, क्योंकि वहाँ से निकलना पास पड़ता था। बाहर निकलकर सखाराम ने गिना। गिनती सात निकली। उसने रुककर दोबारा गिना और इस बार छह निकले। उसने तीसरी बार गिना और तब भी छह निकले।

उसने नाम लेकर पुकारा, एक-एक करके, और छहों ने जवाब दिया।

गिनती की ग़लती इस काम में सबसे बड़ी बात मानी जाती है। रेलवे में इसके लिए अलग रजिस्टर होता है और ब्लॉक ख़त्म होने पर उस पर दस्तख़त होते हैं। सखाराम ने उन्नीस बरस में कभी ग़लत गिनती नहीं की थी और उसे अपनी गिनती पर उससे ज़्यादा भरोसा था जितना अपनी आँखों पर।

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यह बात वहीं ख़त्म हो जाती, अगर भिवा ने आधे घंटे बाद यह न कहा होता कि सुरंग के भीतर उसे अपनी परछाईं के साथ एक और परछाईं दिखी थी, दीवार पर, और वह उसकी अपनी नहीं थी क्योंकि वह तब खड़ा था और दूसरी चल रही थी।

किसी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। एक बजकर पचास मिनट पर सखाराम ने आख़िरी गिनती की, जो लौटने से पहले होती है। इस बार पाँच। विठ्ठल नहीं था और यह पहली गिनती में ही साफ़ हो गया।

ब्लॉक दो बजे ख़त्म होना था और उसके बाद पहली गाड़ी दो बजकर चार मिनट पर थी। यह मालगाड़ी थी और उसकी रफ़्तार सुरंग में साठ के आसपास रहती है।

सखाराम ने घड़ी देखी और उस पर एक बजकर छप्पन मिनट थे, यानी उसके पास आठ मिनट थे और उन आठ मिनट में तीन सौ मीटर भीतर जाना और वापस आना था। उसने बाक़ी चारों से कहा कि वे बाहर रहें और उसने अपनी टॉर्च ली।

भिवा ने उसका हाथ पकड़ा और कहा कि विठ्ठल शायद पहले ही निकल गया हो, दूसरे मुहाने से। सखाराम ने कहा कि हो सकता है, और उसने यह मानकर नहीं कहा। फिर वह भीतर चला गया और उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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उसे विठ्ठल उन्नीसवें रिफ़्यूज में मिला।

उन्नीसवाँ रिफ़्यूज दक्षिण वाले मुहाने से लगभग उन्नीस सौ मीटर भीतर है, यानी सुरंग के बीच के आसपास। वहाँ से दोनों तरफ़ के मुहाने बराबर दूर पड़ते हैं और दोनों में से कोई दिखता नहीं। वह सुरंग की सबसे अँधेरी जगह होती है, इस मायने में नहीं कि वहाँ रोशनी कम है, बल्कि इस मायने में कि वहाँ खड़े होकर देखने पर दोनों तरफ़ एक जैसा दिखता है।

वह उसमें खड़ा था, दीवार से चिपका हुआ, और उसकी टॉर्च बुझी हुई थी। वह ठीक था। उसे कुछ नहीं हुआ था। सखाराम ने उसका हाथ खींचा और दोनों भागे। वे दक्षिण वाले मुहाने से बाहर आए और उसके इक्यावन सेकंड बाद गाड़ी भीतर घुसी।

बाहर आकर विठ्ठल कुछ देर बोल नहीं पाया। बाद में उसने बस इतना कहा कि उसे किसी ने रोका था। "किसने?" "पीछे से आवाज़ आई।" "क्या कहा?" "नाम लिया।" "किसका नाम?" विठ्ठल ने इसका जवाब नहीं दिया, उस रात भी नहीं और बाद में भी नहीं।

गैंग में इसके बाद यह तय हुआ कि गिनती दो आदमी करेंगे, अलग-अलग, और दोनों की गिनती मिलनी चाहिए। विठ्ठल ने सात महीने बाद वह काम छोड़ दिया और वह घर लौट गया। उन्नीसवें रिफ़्यूज पर उसके बाद किसी ने चॉक से एक निशान बना दिया, और वह निशान अब भी वहीं है, क्योंकि सुरंग के भीतर बारिश नहीं पड़ती।