दो बजकर नौ मिनट पर खिड़की बजी और गाड़ी दो बजकर दस पर आई। विमला ने आँख खोलकर छत की तरफ़ देखा और गिनती की। इटारसी में रात की गाड़ियों से घड़ी मिलाई जा सकती है।
यह जंक्शन है और इस पर से रात भर कुछ न कुछ निकलता रहता है। कॉलोनी में रहने वाले हर आदमी को यह याद हो जाता है कि कौन-सी कब गुज़रती है, बिना याद करने की कोशिश किए। दो बजकर दस वाली मालगाड़ी सबसे भारी होती है।
वह खाली रैक लेकर उत्तर की तरफ़ जाती है और उसके निकलने पर पूरी कॉलोनी की खिड़कियाँ एक साथ खड़खड़ाती हैं। यह डेढ़ मिनट चलता है और उसके बाद फिर सन्नाटा हो जाता है। विमला को उस क्वार्टर में आए पाँच हफ़्ते हुए थे।
रामअवतार गुड्स गार्ड था और महीने में बीस रातें बाहर रहता था। क्वार्टर उसकी वरिष्ठता पर मिला था, दो कमरे का, कॉलोनी की तीसरी लाइन में, और उस पर सामने वाले दरवाज़े पर अभी भी पिछले किराएदार का नाम पुती हुई परत के नीचे से हल्का-सा झलकता था।
जून में सब लोग छत पर सोते हैं।
उनके हिस्से की छत की सीढ़ी ऊपर वाले क्वार्टर के अंदर से जाती थी और उस पर ताला रहता था। इसलिए विमला और उसकी लड़की अंदर ही सोती थीं, पंखे के नीचे। शीला सात बरस की थी और पीछे वाले कमरे में सोती थी।
वह कमरा ठंडा रहता था। उसकी खिड़की पश्चिम की तरफ़ नहीं थी, इसलिए दोपहर की धूप उसमें नहीं आती थी और शाम तक दीवारें तपती नहीं थीं। पहली बार विमला ने वह फ़र्क़ तीसरे हफ़्ते सुना।
वह उठकर पानी लेने गई थी और पिछले कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थी, जब वहाँ की खिड़की बजी। लकड़ी के पल्ले चौखट में हिले और कुंडी की ज़ंजीर ने दो बार आवाज़ की।
उसने सोचा कि गाड़ी आ गई।
गाड़ी नहीं आई थी। गाड़ी उसके बाद आई, और तब सामने वाले कमरे की खिड़की भी बजी, और रसोई की भी, और बाहर पूरी लाइन की। बीच में जितना वक़्त था वह उसने अगली रात गिना। चार सेकंड। उसने पहले वही सोचा जो कोई भी सोचेगा।
आवाज़ हवा में धीरे चलती है और ज़मीन में तेज़। भारी गाड़ी की कँपकँपी पटरी से ज़मीन के रास्ते पहले पहुँचती है और उसकी आवाज़ बाद में। यह उसने अपने बाप से सुन रखा था, जो ख़ुद रेलवे में था।
पर उसमें एक बात है।
अगर कँपकँपी ज़मीन से आ रही हो तो वह पूरे मकान में एक साथ आएगी। नींव एक है और दीवारें एक ही नींव पर हैं। अगली रात विमला सामने वाले कमरे में जागती रही और दोनों खिड़कियों पर ध्यान रखा।
सामने वाली खिड़की गाड़ी के साथ बजी। पिछले कमरे वाली उससे पहले बजी। उसने यह चार रात तक जाँचा और चारों बार यही निकला। छठे दिन उसने शीला से पूछा कि रात में डर तो नहीं लगता। लड़की ने कहा कि नहीं लगता, और फिर उसने यह भी बता दिया कि उसने कुछ दिन से खिड़की वाली तरफ़ पीठ करके सोना शुरू कर दिया है।
विमला ने उसी दिन बिस्तर बदल दिए। शीला सामने वाले कमरे में आ गई, पंखे के नीचे, और विमला पिछले कमरे में चली गई। उसने यह रामअवतार को नहीं बताया, क्योंकि वह उस हफ़्ते नागपुर की तरफ़ था और बताने से कुछ बदलता भी नहीं।
पहली रात उसे नींद ही नहीं आई और खिड़की दो बजकर नौ पर बजी। दूसरी रात भी ऐसा ही हुआ। तीसरी रात को वह दो बजे उठी और खिड़की के पास जा बैठी।
कमरा अँधेरा था। बाहर लाइन के खंभे की पीली बत्ती जल रही थी और उसकी रोशनी पल्लों की दरार से एक पतली लकीर बनाकर फ़र्श पर पड़ रही थी। कहीं दूर शंटिंग चल रही थी और डिब्बे आपस में टकराने की आवाज़ें आ रही थीं।
उसने अपनी हथेली खिड़की की चौखट पर रख दी। लकड़ी ठंडी थी। वह वहीं बैठी रही और उसने अपनी घड़ी नहीं देखी, क्योंकि उसे मालूम था कि कब है। फिर चौखट उसकी हथेली के नीचे हिली। एक बार। बाहर की तरफ़।
जैसे पल्ले को किसी ने अंदर से, कमरे की तरफ़ से, बाहर की तरफ़ धकेला हो, और फिर छोड़ दिया हो। विमला ने हाथ नहीं हटाया। यह उसने बाद में ख़ुद भी नहीं समझा कि क्यों नहीं हटाया। चार सेकंड बाद मालगाड़ी आई और सब कुछ हिलने लगा, खिड़की, दरवाज़ा, अलमारी के काँच, और डेढ़ मिनट तक हिलता रहा।
जब वह गुज़र गई तो विमला उठी, दूसरे कमरे में गई, और सुबह तक शीला के पास ही बैठी रही।
अगली सुबह उसने बढ़ई नहीं बुलाया।
उसने ख़ुद रामअवतार के औज़ारों में से पेचकस निकाला और बाज़ार से चार पेच लाई। उसने दोनों पल्लों को चौखट में पेच से कस दिया, ऊपर दो और नीचे दो, इस तरह कि वह खिड़की अब खुल ही न सके।
उसने कमरा नहीं बदला। वह उसी कमरे में सोती रही। खड़खड़ाहट उसके बाद भी होती रही, हर रात, चार सेकंड पहले, पर अब वह बहुत हल्की थी, क्योंकि कसी हुई खिड़की में हिलने की जगह नहीं बचती। तबादला अठारह महीने बाद हुआ और वे भोपाल चले गए।
उस क्वार्टर में अब दूसरा परिवार रहता है और उनका लड़का उसी पिछले कमरे में सोता है, क्योंकि वह ठंडा रहता है। खिड़की अब भी बंद है। उस पर पिछली बार जब कॉलोनी में रंगाई हुई तो चारों पेच भी रंग के नीचे आ गए, और अब वहाँ सिर्फ़ चार छोटे उभार दिखते हैं, जिनके बारे में किसी ने कुछ पूछा नहीं।