ज़िला अस्पताल का वह वार्ड पुरानी इमारत में था और उसमें ग्यारह बिस्तर थे। पुरानी इमारत में मरीज़ तभी भेजे जाते थे जब नई वाली भर जाती थी, यानी ज़्यादातर वक़्त। शकीला वहाँ रात की ड्यूटी करती थी, हफ़्ते में चार रात।
रात की ड्यूटी आठ बजे शुरू होकर सुबह आठ बजे ख़त्म होती है और उसमें चक्कर तीन बार लगाने होते हैं। बीच का चक्कर दो बजे का होता है और वही सबसे लंबा लगता है, क्योंकि उस वक़्त तक मरीज़ सो चुके होते हैं और वार्ड में सिर्फ़ मशीनों की आवाज़ बचती है।
उसके साथ एक वार्ड बॉय रहता था, ज़ुबैर, और दोनों मिलकर ग्यारह बिस्तर देखते थे। बिस्तर तीन दरवाज़े से गिनने पर तीसरा पड़ता था, खिड़की के बग़ल में। वहाँ की चादरें रोज़ नहीं बदलतीं। जब मरीज़ जाता है तब बदली जाती है और तब तक वह वैसी ही पड़ी रहती है जैसी छोड़ी गई हो।
तीसरा बिस्तर हमेशा बना हुआ मिलता था। चादर कसी हुई, कोने दबे हुए, तकिया सीधा। यह पहले किसी को अजीब नहीं लगा, क्योंकि उस पर मरीज़ कम आते थे। शकीला ने इस पर ध्यान तब दिया जब उस पर लगातार तीन मरीज़ आए और तीनों के जाने के बाद, अगली सुबह से पहले, वह बना हुआ मिला।
उसने ज़ुबैर से पूछा कि क्या वह बनाता है। ज़ुबैर ने कहा कि नहीं। उसने सफ़ाई वाली से पूछा। उसने भी नहीं कहा। यह इतनी छोटी बात है कि इस पर कोई रुकता नहीं। अस्पताल में रात में बहुत कुछ होता है और चादर बना होना उसमें सबसे कम अजीब चीज़ है।
अस्पताल में काम करने वालों के पास ऐसी बहुत सी बातें होती हैं जिन पर वे रुकते नहीं। दरवाज़ा अपने आप खुल जाना, किसी ख़ाली कमरे से आवाज़ आना, किसी मरीज़ का किसी ऐसे आदमी का नाम लेना जो वहाँ है ही नहीं। इनमें से ज़्यादातर की वजह होती है और जिनकी नहीं होती उन पर बात नहीं की जाती, क्योंकि बात करने से रात की ड्यूटी करना मुश्किल हो जाता है।
फिर वह बात हुई जिसके बाद शकीला ने ध्यान देना शुरू किया।
एक रात दो बजे उसने वार्ड का चक्कर लगाया। तीसरा बिस्तर ख़ाली था और उस पर चादर उखड़ी हुई थी, क्योंकि उस पर शाम को एक मरीज़ था जो शाम को ही चला गया था। वह आगे बढ़ गई और उसने बाक़ी दस देखे।
लौटते वक़्त, उसी रास्ते से, दस मिनट बाद, तीसरे बिस्तर की चादर कसी हुई थी। वार्ड में उस वक़्त सात मरीज़ थे और सब लेटे हुए थे और उनमें से चार को उठने की हालत में नहीं होना चाहिए था।
ज़ुबैर बाहर वाले बरामदे में था और उसे वहाँ से भीतर आने के लिए शकीला के सामने से गुज़रना पड़ता। उसने उस रात किसी से कुछ नहीं कहा। अगले हफ़्ते उसने एक चीज़ आज़माई। उसने रात के चक्कर से पहले उस चादर पर एक चीज़ रख दी। एक ख़ाली शीशी, बीच में।
अगर कोई चादर ठीक करता है तो वह शीशी हटानी पड़ेगी और वह कहीं रखी मिलेगी। वह चक्कर लगाकर लौटी। चादर कसी हुई थी। शीशी चादर के नीचे थी। उसका उभार साफ़ दिख रहा था, बीच में, और चादर उसके ऊपर से खींचकर कसी गई थी।
शकीला उस बिस्तर के पास काफ़ी देर खड़ी रही। चादर के कोने उसी तरह दबे हुए थे जैसे अस्पताल में सिखाया जाता है, यानी नीचे से मोड़कर, और वह तरीक़ा सफ़ाई वाली नहीं जानती थी, क्योंकि उसे यह कभी सिखाया ही नहीं गया था।
शकीला उस रात वहीं रुक गई और उसने वह चादर नहीं छुई। उसने ज़ुबैर को बुलाया और उसे दिखाया। ज़ुबैर ने वह शीशी निकालने के लिए हाथ बढ़ाया और शकीला ने उसका हाथ रोक दिया। उसने कहा कि रहने दो।
यह उसने डर से नहीं कहा। उसने बाद में यही बताया कि उस वक़्त उसे यह ख़याल आया कि जो भी है वह बिस्तर ठीक कर रहा है, और अस्पताल में यह सबसे कम नुक़सान पहुँचाने वाली चीज़ है जो कोई कर सकता है।
शीशी वहाँ तीन दिन रही। चौथे दिन उस बिस्तर पर एक बूढ़ी औरत भर्ती हुई और चादर बदलनी पड़ी। चादर हटाते वक़्त शीशी वहीं मिली, उसी जगह, और वह टूटी हुई नहीं थी। वह औरत उस बिस्तर पर नौ दिन रही और ठीक होकर गई।
उन नौ दिनों में शकीला ने उससे दो बार पूछा कि रात में उसे कोई तकलीफ़ तो नहीं होती। बूढ़ी औरत ने दोनों बार कहा कि नहीं, और दूसरी बार उसने यह भी कहा कि यहाँ नींद अच्छी आती है, घर से भी अच्छी, और वह हँस पड़ी क्योंकि उसे यह बात मज़ाक़ लगी।
शकीला ने उसके बाद यह आज़माना बंद कर दिया।
वह उस वार्ड में और दो बरस रही और उन दो बरसों में उसने रात के चक्कर का रास्ता बदल लिया। वह अब खिड़की वाली तरफ़ से शुरू करती थी और तीसरे बिस्तर से होकर सबसे पहले गुज़रती थी, जिससे उसे लौटते वक़्त वहाँ से नहीं गुज़रना पड़ता था।
पुरानी इमारत चार बरस बाद गिरा दी गई और उसकी जगह नया ब्लॉक बना।
वार्ड का सामान नए में नहीं गया। पुराने लोहे के पलंग कबाड़ में गए और उनके साथ वह भी गया, और किसी ने यह नहीं गिना कि कौन सा कौन था।