धान कटाई से तीन हफ़्ते पहले सबसे ऊँचा होता है और तब वह आदमी की छाती तक आता है। उन तीन हफ़्तों में रखवाली करनी पड़ती है, क्योंकि जंगली सुअर आते हैं और एक रात में आधा खेत रौंद देते हैं।
इसके लिए खेत के बीच मचान बाँधा जाता है, बाँस का, ज़मीन से आठ फ़ुट ऊपर। गोविंदा उस बरस अकेला था। उसका भाई काम पर बाहर गया था।
रखवाली अकेले करने में सबसे बड़ी दिक़्क़त नींद की होती है। दो आदमी हों तो बारी-बारी सो लेते हैं। अकेला आदमी पूरी रात जागता है और सुबह खेत का काम भी उसी को करना होता है, इसलिए तीन हफ़्ते में शरीर टूट जाता है। गोविंदा ने यह पहले भी एक बार किया था और उसे मालूम था कि क्या होने वाला है।
मचान पर बैठे आदमी को नीचे कुछ नहीं दिखता, सिर्फ़ धान की चादर दिखती है, जो हवा से हिलती रहती है। इसीलिए रखवाली आँख से नहीं, कान से होती है। सुअर के आने की आवाज़ अलग होती है। वह भारी होती है और उसके साथ पौधे टूटने की आवाज़ आती है।
आदमी के चलने की आवाज़ अलग होती है। वह पत्तों के सरकने जैसी होती है। पहली रात गोविंदा ने वही दूसरी वाली आवाज़ सुनी।
वह खेत के उत्तरी सिरे से शुरू हुई और सीधी दक्षिण की तरफ़ गई। उसमें कोई जल्दी नहीं थी। वह उसी रफ़्तार से चलती रही जिस रफ़्तार से आदमी चलता है। उसने टॉर्च मारी। टॉर्च की रोशनी धान के ऊपर से जाती है और भीतर नहीं घुसती।
आवाज़ चलती रही और खेत की दूसरी मेंड़ पर पहुँचकर बंद हो गई। उसने चिल्लाकर पूछा कि कौन है।
यह हर रखवाला करता है और इसका मतलब सिर्फ़ यह होता है कि जो भी हो उसे पता चल जाए कि खेत में कोई जाग रहा है। ज़्यादातर बार इतने से ही काम हो जाता है, क्योंकि जो चोरी करने आया हो वह आवाज़ सुनकर लौट जाता है।
जवाब नहीं आया। सुबह वह मेंड़ से मेंड़ तक चला और उसने देखा। धान में कोई रास्ता नहीं बना था।
गोविंदा ने यह दो बार देखा। पहली बार उसने ऊपर से देखा, मेंड़ पर खड़े होकर, जहाँ से पूरे खेत की चादर दिखती है और उसमें कोई लकीर हो तो साफ़ दिखती है। दूसरी बार वह भीतर घुसा और उसी रास्ते पर चला जिससे आवाज़ गुज़री थी, और उसके अपने चलने से जो लकीर बनी वह शाम तक दिखती रही।
यह सबसे बड़ी बात है। खड़े धान में से जो भी गुज़रे, चाहे आदमी हो या जानवर, वह पौधे झुका देता है और वह लकीर सुबह साफ़ दिखती है और दो-तीन दिन तक रहती है। उस खेत में एक भी पौधा झुका हुआ नहीं था।
दूसरी रात वही हुआ, उसी वक़्त के आसपास, उसी दिशा में। तीसरी रात गोविंदा ने अपनी पत्नी सुरजी से कहा कि वह किसी को भेज दे, दूसरा आदमी। सुरजी ने कहा कि किसी को मत बताओ। इसकी वजह उसने बताई। गाँव में यह बात फैलती तो उस खेत की रखवाली के लिए कोई नहीं आता, और तीन हफ़्ते बाक़ी थे, और सुअर सचमुच आते थे।
यह ठीक बात थी। चौथी रात गोविंदा ने कुछ और किया। उसने मचान के नीचे, ज़मीन पर, राख की एक पतली पट्टी बिछा दी, खेत के आर-पार, उस लकीर पर जिससे वह आवाज़ हर रात गुज़रती थी। राख पर निशान बनता है। पैर का, खुर का, कुछ भी।
आवाज़ उस रात भी आई। वह राख वाली पट्टी तक पहुँची और वहाँ रुकी। कुछ देर कुछ नहीं हुआ। फिर आवाज़ फिर चली, पर अब वह पट्टी के साथ-साथ चल रही थी, उसके किनारे-किनारे, जैसे कोई ऐसी जगह ढूँढ़ रहा हो जहाँ से पार जाया जा सके।
वह पूरे खेत की चौड़ाई में गई, एक सिरे से दूसरे सिरे तक, और फिर वापस आई। गोविंदा मचान पर बैठा यह सुनता रहा। उसके हाथ में टॉर्च थी और वह जल रही थी और उसने उसे नीचे नहीं किया।
आवाज़ लगभग एक घंटे तक पट्टी के किनारे चलती रही और फिर बंद हो गई।
उस एक घंटे में गोविंदा एक बार भी मचान से नीचे नहीं उतरा। उसके पास लाठी थी और वह उसके बग़ल में पड़ी रही। उसने बाद में यह माना कि उतरने का ख़याल उसे एक बार आया था, यह देखने के लिए कि पट्टी के पास कौन है, और उसने वह ख़याल छोड़ दिया।
सुबह राख पर कोई निशान नहीं था। न पार जाने का, न किनारे चलने का। गोविंदा ने उस दिन दो काम किए। पहला यह कि उसने अपने भाई को ख़बर भेजी। दूसरा यह कि उसने राख की पट्टी वहीं रहने दी और हर शाम उसे दोबारा बिछाता रहा, कटाई तक।
उन तीन हफ़्तों में आवाज़ रोज़ आई और वह हर रात उसी पट्टी के किनारे-किनारे चलती रही और पार नहीं गई। सुअर उस बरस उस खेत में नहीं आए, जो अपने आप में अच्छी बात थी और जिसका ज़िक्र गोविंदा ने किसी से नहीं किया।
कटाई के बाद खेत ख़ाली हो गया और उसके बाद आवाज़ नहीं आई, क्योंकि ख़ाली खेत में पत्ते नहीं होते और सरकने की आवाज़ बनती ही नहीं।
अगले बरस से गोविंदा हर रखवाली के मौसम में राख की पट्टी बिछाता है, पहली रात से, बिना यह देखे कि ज़रूरत है या नहीं।