कब्रिस्तान के पास वाला रास्ता शाम के बाद सूना हो जाता था। दिन में लोग उधर से आते-जाते रहते, बात करते, हँसते। सूरज ढलते ही वही रास्ता ऐसे बदल जाता, जैसे किसी ने उसे उठाकर कहीं और रख दिया हो। जो लोग मजबूरी में उधर से गुज़रे थे, वे सब एक ही बात बताते थे। एक सफ़ेद साया, कब्रों के बीच, जो हिलता नहीं था।

फकीरा उसी रास्ते से लौटता था, क्योंकि उसका काम रात में ख़त्म होता था। वह बैंड में ढोल बजाता था। ब्याह के मौसम में रोज़ रात एक-डेढ़ बजे बाजा बंद होता, बाजे वाले पैसे लेकर निकलते, और गाँव तक का आख़िरी टुकड़ा वही रास्ता था। वे हमेशा साथ चलते थे। छह-सात आदमी, कंधे पर पेटी और ढोल, और कोई न कोई बोलता ही रहता।

साया हर बार नहीं दिखता था। महीने में दो बार, तीन बार। बाईं तरफ़, कब्रों के बीच, एक सफ़ेद चीज़ जो सीधी खड़ी रहती। सब उसे देख लेते और कोई रुकता नहीं था। यह ग्यारह साल से चल रहा था और गाँव में इस पर बहस भी नहीं होती थी, जैसे बरसात में मेंढक बोलने पर बहस नहीं होती।

एक बात सब मानते थे। वह हिलता नहीं। न पास आता, न दूर जाता, न किसी के पीछे लगता। इसीलिए लोग उधर से गुज़र जाते थे। जो चीज़ आपका पीछा नहीं करती, उससे आदमी एक हद तक निभा लेता है।

साथ चलने के अपने तरीक़े थे। सबसे छोटा लड़का बीच में चलता था, यह किसी ने तय नहीं किया था पर हमेशा ऐसा ही होता था। जिस रात वह दिखता, कोई न कोई वही पुराना मज़ाक़ करता कि आज बुआ खड़ी हैं, और सब हँस देते, और हँसी थोड़ी ज़्यादा तेज़ होती। बाईं तरफ़ कोई टॉर्च नहीं मारता था। यह भी किसी ने तय नहीं किया था।

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कब्र का दरवाजा

फागुन की एक रात बाजा जल्दी बंद हो गया, क्योंकि बारात दूर से आई थी और उन्हें लौटना था। बाक़ी लोग ट्रैक्टर पर बैठकर सीधे निकल गए। फकीरा रुक गया, क्योंकि उसकी ढोल की डोरी टूट गई थी और उसे बाँधना था। जब वह निकला, तब सवा बारह बजे थे और वह अकेला था। ग्यारह साल में पहली बार।

रास्ते पर पहुँचकर उसने बाईं तरफ़ देखा। वह वहीं था।

फकीरा तेज़ चलने लगा, फिर धीरे हो गया, फिर रुक गया। रुकने की वजह वह आज तक नहीं बता पाता। शायद यह कि साथ कोई नहीं था और इसलिए कोई खींचकर आगे नहीं ले जा रहा था। उसने ढोल ज़मीन पर रखा और कब्रिस्तान के भीतर चला गया।

बीस क़दम अंदर जाकर उसे दिख गया कि वह क्या है। एक नई कब्र थी और उस पर बाँस की खपच्चियों का ढाँचा बना था, और उस पर सफ़ेद चादर तनी हुई थी। यह वहाँ का चलन था। गोवर्धन, जो कब्रिस्तान देखता था, हर नई कब्र पर चालीस दिन तक चादर रखता था और फिर उतार लेता था।

फकीरा को हँसी आ गई। हँसी में आवाज़ नहीं थी, पर वह हँसा। ग्यारह साल का डर एक चादर निकला। उसने चादर को छूकर देखा भी, ताकि याद रहे कि उसने छुआ था।

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फिर वह लौटा। ढोल उठाया और चलने लगा। पचास क़दम चलकर उसने एक बार और मुड़कर देखा, किसी डर से नहीं। अब देखने में मज़ा आ रहा था।

चादर वहाँ नहीं थी। साया वहाँ दिखता ही नहीं था।

वह कब्र दाहिनी तरफ़ थी, बड़े पीपल के पास, रास्ते से बहुत आगे। साया हमेशा बाईं तरफ़ दिखता था, पहले वाले हिस्से में, जहाँ पुरानी कब्रें हैं और जहाँ से वह अभी-अभी गुज़रकर आया था। दोनों जगहों के बीच पूरा कब्रिस्तान पड़ता है।

फकीरा वहीं खड़ा रहा। सामने बाईं तरफ़ पुराना हिस्सा था और उसमें कुछ नहीं था। न सफ़ेद, न खड़ा हुआ। कुछ भी नहीं। और यह उसे राहत नहीं दे रहा था, क्योंकि आधा घंटा पहले वहीं कुछ था और उसने उसे देखा था, और आज तक ग्यारह साल में हर बार वहीं देखा था।

उसे दूसरी बार भीतर जाना पड़ा। यह उसने तय किया। किसी ने कहा नहीं। और कोई पूछने वाला भी नहीं था। पुराने हिस्से में क़दम रखते ही ज़मीन नीची पड़ जाती है और घास ऊँची है। वह उसी जगह तक गया जहाँ से, रास्ते पर खड़े होकर, वह चीज़ दिखती है।

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वहाँ जो था, वह उसने आज तक किसी के आगे नहीं खोला। बैंड वालों ने पूछा, गाँव ने पूछा, और सबसे ज़्यादा गोवर्धन ने पूछा, जो चालीस साल से वह जगह देख रहा था और जिसे कभी कुछ नहीं दिखा था। फकीरा ने हर बार यही कहा। चादर थी।

वह घर कैसे पहुँचा, यह उसे याद नहीं। ढोल सुबह दरवाज़े के बाहर पड़ा मिला और डोरी फिर से खुली हुई थी। उस रात उसने कुछ खाया नहीं और लेटा भी नहीं। बीवी ने सुबह पूछा तो उसने कहा कि नींद नहीं आई। यह अधूरा जवाब था और उसने उसे वहीं रोक दिया। दो दिन बाद उसने बैंड मास्टर से कह दिया कि वह अब नहीं आएगा।

ब्याह के मौसम की कमाई साल भर चलती है। उसकी जगह उसे राजमिस्त्री के साथ बेलदारी मिली, जो एक तिहाई थी। यह उसने अपनी बीवी को भी नहीं समझाया, और घर में इस पर लंबे झगड़े हुए।

गोवर्धन ने उस साल के बाद चादर रखनी बंद कर दी। किसी ने उससे कहा नहीं था। नई कब्रों पर अब सिर्फ़ मिट्टी रहती है और चालीस दिन कुछ नहीं तना रहता, और गाँव में अब कोई सफ़ेद चीज़ नहीं दिखती। लोग इसे इसका इलाज मानते हैं। फकीरा उस रास्ते से आज भी नहीं जाता, न रात में, न दिन में।