परदे के पीछे बैठने वाले को सामने बैठे लोग कभी नहीं दिखते। यह इस काम की पहली बात है और बालकिशन ने इसे बत्तीस साल जिया था।
वह चमड़े की कठपुतलियों का खेल दिखाता था। सफ़ेद कपड़े का एक परदा, उसके पीछे तेल का दीया, और दीये और परदे के बीच में कठपुतलियाँ। सामने बैठे लोग सिर्फ़ परछाईं देखते हैं। यही पूरा खेल है।
इसमें सबसे मुश्किल काम कठपुतली को परदे के पास रखना है। दीये से जितनी दूर, छाया उतनी बड़ी और उतनी धुँधली। जितनी पास, उतनी छोटी और साफ़। एक ही कठपुतली को आगे-पीछे करके आदमी को दूर से आता हुआ दिखाया जाता है। यह हाथ का काम है और इसमें कलाई तीन घंटे में जवाब देने लगती है।
उसकी पेटी में चौबीस कठपुतलियाँ थीं और सात कहानियाँ। सातों उसे उसके बाप से मिली थीं और उसने उनमें कुछ नहीं जोड़ा था। बदलने की ज़रूरत भी नहीं पड़ती, क्योंकि हर गाँव में वह दो साल में एक बार जाता है।
अगहन से फागुन तक का मौसम उसका होता है। शादियाँ, मेले, और फ़सल के बाद वाली रातें, जब लोगों के पास बैठने का वक़्त होता है।
उस बरस वह ककरही गया, जहाँ वह पहले भी दो बार जा चुका था।
खेल रात नौ बजे शुरू हुआ। भीड़ ठीक थी, सत्तर-अस्सी लोग, और सामने बच्चे बैठे थे।
तीसरी कहानी वह हमेशा तीसरे नंबर पर करता है, क्योंकि उसमें सबसे ज़्यादा बोलना पड़ता है और गला तब तक खुल चुका होता है। कहानी पुरानी है। एक राजा, उसका छोटा भाई, और एक कुआँ।
उस कहानी के बीच में एक जगह आती है जहाँ छोटे भाई को कुएँ में उतारा जाता है और रस्सी ऊपर से काट दी जाती है।
बालकिशन ने वह लाइन बोली और कठपुतली नीचे की।
उसके बाद जो हुआ, उसे उसने देखा नहीं। परदे के पीछे बैठा आदमी सामने नहीं देख सकता।
उसने सुना। पहले एक आवाज़ आई, किसी चीज़ के गिरने की, जैसे कोई उठते हुए बैठने की चटाई गिरा दे। फिर पैरों की आवाज़ें। फिर बहुत सारे पैरों की आवाज़ें।
वह बोलता रहा, क्योंकि खेल बीच में नहीं रोका जाता। दो मिनट बाद उसने कठपुतली नीचे रखी और परदे के किनारे से झाँका।
मैदान ख़ाली था। दीये के तेल में अभी बाती जल रही थी।
सामने की क़तार में चार बच्चे रह गए थे, जिन्हें कोई लेने नहीं आया था, और वे भी घबराए हुए थे।
चारों को उसने बिठाए रखा और उनके लिए वह खेल चलाता रहा, बिना कठपुतली के, सिर्फ़ बोलकर। थोड़ी देर में उनके घर वाले आ गए और उन्हें ले गए। आते वक़्त किसी ने उसकी तरफ़ नहीं देखा।
रात को गाँव के दो आदमी उसके पास आए। उन्होंने बदतमीज़ी नहीं की। उन्होंने कहा कि गाड़ी सुबह से पहले निकाल लो, और पैसे उन्होंने पूरे दिए, बल्कि तय से कुछ ज़्यादा दिए।
बालकिशन ने वजह पूछी। दोनों में से किसी ने जवाब नहीं दिया, और दोनों जवाब जानते थे। यह उसे उनके चुप रहने के तरीक़े से मालूम हुआ।
वह सुबह से पहले निकल गया।
अगले दो महीने वह उसी बात पर अटका रहा। कहानी में कुछ भी नया नहीं था। वह उसे बत्तीस साल से कर रहा था और ककरही में ही दो बार कर चुका था।
उन दो महीनों में उसने ग्यारह गाँव किए और हर जगह वही सात कहानियाँ कीं, तीसरी भी। कहीं कुछ नहीं हुआ। लोग हँसे, ताली बजाई, और आख़िर में पैसे दिए। इससे उसका मन और उलझा, क्योंकि इसका मतलब यह था कि दिक़्क़त कहानी में नहीं थी।
फिर उसे यह ख़याल आया कि उसे यह भी नहीं मालूम कि लोग किस लाइन पर उठे थे।
परदे के पीछे से सामने नहीं दिखता। पर परदा दोनों तरफ़ से परदा है। जब कोई सामने उठकर खड़ा होता है और दीये और परदे के बीच में नहीं, बल्कि परदे के उस पार होता है, तब भी उसकी छाया परदे पर पड़ती है, धुँधली, बड़ी, उलटी तरफ़ से।
बालकिशन को वह छाया याद थी। एक आदमी बीच वाली क़तार से उठा था और वह दाहिनी तरफ़ से निकला था।
और उसे यह भी याद था कि वह किस लाइन पर उठा था। रस्सी वाली लाइन पर नहीं। उससे एक लाइन पहले, जहाँ बड़ा भाई कहता है कि कुएँ में गिरने वाले का हिसाब कौन रखता है।
बालकिशन ने ककरही के बारे में कुछ पता नहीं किया। वह उस तरफ़ दोबारा नहीं गया, और उसने यह क़िस्सा कभी किसी को नहीं सुनाया।
पता करना मुश्किल भी नहीं था। ककरही में उसके जान-पहचान वाले थे और एक चिट्ठी से काम चल जाता। उसने चिट्ठी नहीं लिखी। जो आदमी उस रात उठकर गया था वह अब भी वहीं रहता होगा, और उसे यह मालूम नहीं है कि उस रात परदे पर उसकी अपनी छाया भी पड़ी थी।
उसने सिर्फ़ एक काम किया। तीसरी कहानी उसने पेटी से निकाल दी।
अब वह छह कहानियाँ करता है और किसी को यह फ़र्क़ मालूम नहीं पड़ता, क्योंकि गिनती कोई नहीं रखता।
उस कहानी वाली कठपुतलियाँ पेटी में सबसे नीचे रखी हैं। चमड़े की कठपुतली को हाथ लगते रहना चाहिए, वरना वह अकड़ जाती है और फिर मुड़ने पर चटक जाती है। बालकिशन उसे साल में एक बार निकालकर तेल लगाता है। इतने से नहीं होता। छोटे भाई वाली कठपुतली अब मुड़ती नहीं।