खत सुबह साढ़े नौ बजे आया, जब हलवाई नाश्ते की आख़िरी कड़ाही उतार रहा था। लिफ़ाफ़े पर सिर्फ़ द्वारिका का नाम था और मकान का नंबर, न भेजने वाले का पता, न कोई टिकट। यानी वह डाक से नहीं आया था। किसी ने उसे लाकर गेट के अंदर डाल दिया था।

भीतर एक ही काग़ज़ था और उस पर तीन लाइनें थीं। लिखा था कि इस रिश्ते को रोक लीजिए। लिखा था कि लड़के की पिछली सगाई क्यों टूटी, यह पूछ लीजिए। और आख़िर में लिखा था कि नाम मत खोजिएगा, नहीं मिलेगा।

अगहन की उन तारीख़ों में क़स्बे में चार शादियाँ थीं। नीलम की शादी उनमें सबसे छोटी थी। बरात कल दोपहर आ चुकी थी, फेरे आज रात के थे, और द्वारिका दो दिन से सोया नहीं था, क्योंकि इंतज़ाम उसी के ज़िम्मे था। बड़े भाई से यह सब अब होता नहीं।

बरात उतरते वक़्त मोहल्ले की एक बुज़ुर्ग औरत ने कहा था कि लड़के के मामा नहीं दिख रहे। किसी ने जवाब नहीं दिया और बात भीड़ में दब गई। ऐसी बातें हर बरात पर कोई न कोई कहता है।

पहला ख़याल यही आया कि यह किसी की जलन है। ऐसा हर शादी में कोई न कोई करता है। दूसरा ख़याल यह आया कि जलन वाला आदमी नाम लिखता है, चाहे किसी और का लिखे। इस वाले ने कोई नाम छोड़ा ही नहीं था, न अपना, न किसी और का। यह बात उसे बैठ नहीं रही थी।

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उसने काग़ज़ मोड़कर जेब में रखा और बाहर आ गया। टेंट में नाश्ता चल रहा था। पत्तल, दोने, चाय, और बीच में बच्चे भाग रहे थे। सब कुछ वैसा ही था जैसा होना चाहिए।

इंतज़ाम वाले आदमी की एक सहूलियत यह होती है कि वह हर जगह जा सकता है और किसी को अजीब नहीं लगता। द्वारिका सुबह से चार बार टेंट में घूम चुका था, कभी पानी के लिए, कभी कुर्सियों के लिए, कभी हलवाई को बुलाने। उसे कोई नहीं रोकता।

काग़ज़ जेब में रखने के बाद वह पाँचवीं बार गया। इस बार पानी के लिए नहीं।

वह टेंट के उस हिस्से में गया जहाँ बड़े लोग बैठे थे और एक-एक से पूछने लगा कि आप लड़के के कौन हुए। सवाल में कुछ अजीब नहीं था। शादी में यही पूछा जाता है और इसी से बात शुरू होती है।

पहला बोला कि चाचा। दूसरा ताऊ का लड़का। तीसरा बुआ का। फिर पड़ोसी, फिर पड़ोसी, फिर लड़के के साथ पढ़ने वाला, फिर लड़के के पिता की दुकान पर काम करने वाला, फिर उसी मोहल्ले का एक और।

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द्वारिका पूरी क़तार घूम गया। पूरी बरात में एक भी आदमी लड़के के ननिहाल से नहीं था। एक भी नहीं। न मामा, न मामी, न मौसी, न कोई ममेरा भाई।

अगहन की शादी में लड़के के ननिहाल का न आना वैसा नहीं है जैसे किसी दोस्त का न आना। ननिहाल पूरा आता है और सबसे आगे बैठता है, और उसके आने की तैयारी हफ़्तों पहले से होती है। कल दोपहर से अब तक लड़के वालों में से किसी ने इस पर एक शब्द नहीं कहा था। इतनी बड़ी ग़ैरहाज़िरी पर इतनी चुप्पी अपने आप में एक जवाब थी।

अब उसे कल वाली बात याद आई। लड़के के मामा नहीं दिख रहे। तब वह भीड़ की बात लगी थी और उसने उसे वहीं छोड़ दिया था।

अब घड़ी देखने का वक़्त था। फेरे आठ बजे थे। दस बज रहे थे।

वह लड़के के पिता के पास गया और सामान्य तरीक़े से पूछा कि आपके साले साहब कब पहुँच रहे हैं, कमरे का इंतज़ाम करना है। लड़के के पिता ने कहा कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है। द्वारिका ने पूछा कि किसकी। उन्होंने कहा, बड़े वाले की। द्वारिका ने पूछा कि छोटे वाले भी नहीं आ रहे। वे चुप हो गए और फिर बोले कि आप इंतज़ाम देखिए।

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द्वारिका को अब यक़ीन हो चुका था और यक़ीन के साथ ही डर भी आ गया, क्योंकि उसके पास कुछ भी नहीं था। एक बिना नाम का काग़ज़, और कुछ लोग जो नहीं आए थे। इन दोनों के दम पर वह क़स्बे के बीच में एक शादी नहीं रोक सकता था। रोकता तो नीलम का नाम उम्र भर के लिए ख़राब होता, और अगर वह ग़लत निकलता तो उसका अपना भी।

उसने बड़े भाई को अंदर ले जाकर काग़ज़ दिखाया। उन्होंने उसे दो बार पढ़ा, फिर काग़ज़ मोड़कर वापस दे दिया और कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, बरात आ चुकी है। यही वह जवाब था जिसके लिए ऐसे खत लिखे जाते हैं।

नीलम कमरे में ही थी। उसने दोनों की बात सुन ली थी। उसने काग़ज़ माँगा, पढ़ा, और फिर वह उठकर बाहर आँगन में चली गई, जहाँ लड़के के पिता बैठे थे और आठ-दस लोग और थे।

उसने बहुत साफ़ आवाज़ में एक ही सवाल पूछा। उसने पूछा कि आपके साले साहब कहाँ हैं। आँगन में जितने लोग थे, सब लड़के के पिता की तरफ़ देखने लगे। लड़के के पिता ने नीलम की तरफ़ देखा, फिर ज़मीन की तरफ़, और कुछ देर तक कोई आवाज़ नहीं आई। उस चुप्पी में जो सुनाई देना था वह सुनाई दे गया।

बरात उसी शाम लौट गई। जो हुआ उसे लोग साल भर सुनाते रहे और हर बार अलग तरह से सुनाते रहे। पिछली सगाई की बात बाद में सचमुच निकली, और वह वैसी ही निकली जैसी खत लिखने वाले को मालूम थी। लड़के का छोटा मामा गयादीन बाद में एक बार क़स्बे आया और नीलम के पिता से मिलने चला गया। दोनों ने चाय पी। लिखावट की बात न उसने उठाई, न उन्होंने।

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रह गया खाना। तीन सौ लोगों का बनकर तैयार था और उसे लौटाया नहीं जा सकता था। द्वारिका ने देगें उठवाईं और उन्हें बाँटना शुरू किया, पहले मोहल्ले में, फिर सड़क के उस पार, फिर स्कूल में और मंडी के पीछे वाली बस्ती में। चार दिन तक उस खाने में से कुछ न कुछ किसी न किसी घर में जाता रहा। द्वारिका को आज भी उस शादी की याद देगों से आती है, बातों से नहीं।