हाइवे वाले पंप पर रात की पाली में एक ही आदमी रहता है। ग्यारह बजे के बाद गाड़ियाँ कम हो जाती हैं और तीन से पाँच के बीच तो घंटे में दो-तीन ही आती हैं। रामधनी यह पाली चार साल से कर रहा था। उसे यह इसलिए पसंद थी कि दिन में उसका लड़का स्कूल से लौटता है और वह उस वक़्त घर पर होता है।

दिन भर का पैसा तिजोरी में जाता है और तिजोरी सुबह छह बजे खुलती है, जब मालिक का आदमी उसे लेने आता है। रात भर वह बंद रहती है और उसकी चाबी रामधनी के पास होती है। यह बात पंप पर काम करने वाले सब जानते थे, और उनसे आगे भी कितने लोग जानते थे, इसका हिसाब किसी के पास नहीं था।

सफ़ेद गाड़ी पहली बार सवा बारह बजे आई। ड्राइवर ने शीशा नीचे किया और सौ रुपये का पेट्रोल डलवाया। रामधनी ने डाल दिया। सौ रुपये में क़रीब एक लीटर आता है और एक लीटर के लिए हाइवे पर कोई नहीं रुकता, पर रुकने वाले रुकते हैं, इसलिए उसने इस पर ध्यान नहीं दिया।

गाड़ी दो बजकर पाँच मिनट पर फिर आई। वही गाड़ी। वही ड्राइवर। इस बार भी सौ रुपये का। रामधनी ने नोट लेते हुए कहा कि अभी थोड़ी देर पहले भी आए थे न। ड्राइवर ने कहा कि नहीं, वह पहली बार आया है, और गाड़ी चला दी।

अब रामधनी का ध्यान गया। उसने याद करके देखा कि पहली बार गाड़ी किस तरफ़ से आई थी और किस तरफ़ गई थी। वह जिस तरफ़ से आई थी, उसी तरफ़ लौट गई थी। हाइवे पर जाने वाला आदमी आगे जाता है। लौटता वही है जो कहीं जा नहीं रहा।

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उसने गाड़ी का नंबर देखने की कोशिश की। आगे वाली प्लेट नहीं थी। पीछे वाली उसने देखी नहीं थी, क्योंकि दोनों बार गाड़ी उसी तरफ़ मुड़ी थी जिस तरफ़ पीछे का हिस्सा अँधेरे में रहता है।

पंप पर कैमरा एक ही है और वह मशीनों की तरफ़ है। दफ़्तर वाला हिस्सा उसमें नहीं आता। यह बात रामधनी को इसलिए याद रही कि दूसरी बार, पैसे देते हुए, ड्राइवर ने ठोड़ी से ऊपर की तरफ़ इशारा किया था और पूछा था कि कैमरा चलता है या दिखाने भर को लगा है।

उसने उस वक़्त हँसकर कहा था कि चलता है, और यह सच था। पर उसने यह नहीं बताया था कि वह किधर देखता है, और अब उसे लग रहा था कि वह सवाल इसीलिए पूछा गया था।

फ़ोन पर सिग्नल एक जगह आता है, पंप के पीछे वाले टीले पर। वहाँ जाने का मतलब है दो मिनट के लिए दफ़्तर और तिजोरी दोनों को छोड़ देना, और यह भी कि टीले पर खड़ा आदमी हाइवे से साफ़ दिखता है। रामधनी ने उस रात दो बार टीले की तरफ़ क़दम बढ़ाए और दोनों बार लौट आया।

उसने हिसाब लगाया। तिजोरी में उस दिन का पैसा था और महीने की पहली तारीख़ थी, इसलिए सामान्य से ज़्यादा था। तिजोरी टूटती नहीं, कटती नहीं, और उसका ताला रात में कोई नहीं खोलता। वह सिर्फ़ एक बार खुलती है। छह बजे।

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यही बात है, उसने सोचा। कोई तिजोरी नहीं तोड़ना चाहता। कोई उस वक़्त का इंतज़ार कर रहा है जब वह अपने आप खुलेगी।

छह बजे मालिक का आदमी आता है, तिजोरी खुलती है, पैसा थैले में जाता है, और थैला उसके स्कूटर पर बँधता है। उस पूरे काम में चार मिनट लगते हैं। उन चार मिनटों में पैसा न तिजोरी में होता है, न बैंक में। वह हाथ में होता है।

रामधनी सवा तीन बजे दफ़्तर में गया और उसने तिजोरी खोल दी। उसने सारा पैसा निकाला, उसे एक पुराने ग्रीस के डिब्बे में डाला, और डिब्बा जाकर सर्विसिंग वाले गड्ढे में रख दिया, नीचे, उस कोने में जहाँ फटे टायर और खाली डिब्बे पड़े रहते हैं। ऊपर उसने दो टायर सरका दिए। फिर उसने तिजोरी बंद की और चाबी अपनी जेब में वापस रख ली।

इसके बाद उसने कुर्सी दफ़्तर के बाहर निकाल ली और हाइवे की तरफ़ मुँह करके बैठ गया, जहाँ से वह दूर तक देख सकता था और जहाँ से उसे भी दूर तक देखा जा सकता था। यह उसने जान-बूझकर किया।

सफ़ेद गाड़ी तीसरी बार पाँच बजकर चालीस मिनट पर आई। इस बार गाड़ी में एक नहीं था, तीन थे। वह मशीन तक नहीं आई, किनारे पर खड़ी हो गई, और उसका इंजन बंद नहीं हुआ। रामधनी कुर्सी पर बैठा रहा और उसने उधर नहीं देखा। उसने अपनी घड़ी देखी।

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छह बजकर दो मिनट पर मालिक का आदमी स्कूटर से आया, जैसे रोज़ आता है। रामधनी उसके साथ दफ़्तर में गया, तिजोरी खोली, और तिजोरी ख़ाली थी। उस आदमी ने उसकी तरफ़ देखा। रामधनी ने उसे कुछ नहीं बताया, बस इतना कहा कि बाहर एक गाड़ी खड़ी है और वह रात से खड़ी है।

दोनों दरवाज़े पर आए। सफ़ेद गाड़ी अब भी वहीं थी। उसमें बैठे आदमी उन्हें देख रहे थे और वे दोनों उन्हें देख रहे थे, और यह चार-पाँच सेकंड चला। फिर गाड़ी चल दी, बिना जल्दी किए, उसी तरफ़ जिस तरफ़ से हर बार आई थी।

पैसा उस दिन आठ बजे गड्ढे से निकाला गया, टायर हटाकर, ग्रीस के डिब्बे में से, और पूरा का पूरा निकला। मालिक ने पूछा कि रात में फ़ोन क्यों नहीं किया। रामधनी ने कहा कि सिग्नल नहीं था, और मालिक इस पर कुछ नहीं बोला, क्योंकि सिग्नल सचमुच नहीं आता।

पंप पर उसके बाद रात की पाली में दो आदमी रहने लगे और तिजोरी का समय बदलकर सवा छह कर दिया गया। रामधनी अब भी वही पाली करता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि जब कोई गाड़ी सौ रुपये का पेट्रोल डलवाती है, तो वह पैसे लेते हुए उसका नंबर देख लेता है, और अगर आगे वाली प्लेट न हो तो पीछे जाकर पीछे वाली भी देख आता है।