हरपाल रोज़ रात पौने दस बजे मोड़ से मुड़ता था, और मोड़ से मुड़ते ही उसका अपना घर दिखता था। बीच वाले कमरे की खिड़की सड़क की तरफ़ है। माघ में वह खिड़की बंद रहती है और उस पर परदा खिंचा रहता है, और भीतर की बत्ती परदे को एक स्क्रीन बना देती है।
दो महीने पहले मोहल्ले में नया खंभा लगा था और उस पर सफ़ेद वाली नई बत्ती। इस पर सब ख़ुश थे। हरपाल भी ख़ुश था, क्योंकि अब मोड़ से घर तक का रास्ता साफ़ दिखता है।
उस पर पहली बार साया उसने दिसंबर के आख़िर में देखा।
एक आदमी का साया था। खड़ा हुआ, सीधा, परदे के बीचोंबीच। हरपाल उस वक़्त सड़क पर था और घर में उसकी पत्नी और दोनों बच्चे थे। बच्चे छोटे हैं और उनका साया इतना लंबा नहीं हो सकता।
साया लंबा था और पतला था। हरपाल ने कई बार यह सोचा कि इतना लंबा आदमी मोहल्ले में है कौन। यह सवाल उसे तंग करता रहा, और इसका जवाब उसे तेरहवें दिन मिला।
वह तेज़ चलकर घर पहुँचा। भीतर तीनों थे। और कोई नहीं था। उसने कमरे देखे, छत देखी, पीछे का दरवाज़ा देखा। कुंडी भीतर से लगी थी।
उसने यह बात घर में नहीं उठाई। ग्यारह दिन तक नहीं उठाई।
अगली रात वह फिर मोड़ से मुड़ा। साया वहीं था। उसने घड़ी देखी। नौ बजकर चालीस मिनट।
इसके बाद वह रोज़ देखने लगा और साया रोज़ था। कभी-कभी वह हिलता भी था, थोड़ा सा, जैसे कोई खड़े-खड़े करवट बदलता है। दस बजे तक वह चला जाता था।
ग्यारह दिन तक हरपाल ने यह अकेले देखा।
इन ग्यारह दिनों में उसने वह सब सोचा जो ऐसे में सोचा जाता है। उसने पुराने महीनों को उलटा-पलटा। उसने यह भी सोचा कि पत्नी अब उससे कम बात करती है, हालाँकि यह भी सच था कि वह ख़ुद देर से लौटता है और लौटकर थका होता है।
आठवें दिन उसने एक काम किया जिसका उसे बाद तक अफ़सोस रहा। वह दोपहर में, बिना बताए, घर आ गया। पत्नी आँगन में कपड़े धो रही थी। उसने उसे देखकर पूछा कि आज जल्दी कैसे। हरपाल ने कहा कि दफ़्तर में काम नहीं था। फिर वह पूरे घर में घूमा, एक-एक कमरे में, जैसे कुछ ढूँढ़ रहा हो। पत्नी उसे देखती रही। उसने दूसरी बार सवाल नहीं किया।
बारहवें दिन उसने बाँस का एक डंडा ख़रीदा और उसे भीतर से दरवाज़े के पीछे खड़ा कर दिया।
डंडा उसने पाँच रुपये का लिया और घर लाते वक़्त उसे कपड़े में लपेटकर लाया। रात को वह कई बार उठा। हर बार उठकर उसने पहले डंडे की तरफ़ देखा, फिर घड़ी की तरफ़।
तेरहवें दिन उसने वह किया जो पहले ही कर लेना चाहिए था। वह नौ बजे ही घर आ गया और भीतर वाले कमरे में जाकर बैठ गया, बत्ती जलाकर, परदा खिंचा हुआ।
पौने दस बजे वह कमरे में अकेला था। पत्नी रसोई में थी और बच्चे सो चुके थे।
नौ बजकर चालीस मिनट पर परदे पर साया आ गया।
हरपाल उठकर परदे के सामने खड़ा हो गया। उसका अपना साया परदे पर पड़ा और वह छोटा था, चौड़ा था, और नीचे की तरफ़ था। दूसरा साया ऊपर था और पतला था और वह वहीं था, उसके अपने साये के बग़ल में।
तब उसे समझ में आया कि साया भीतर से नहीं पड़ रहा।
वह बाहर निकला और सड़क पर खड़े होकर देखा। परदे पर साया अब भी था। उसने पीछे मुड़कर देखा कि रोशनी कहाँ से आ रही है।
रोशनी उसी नए खंभे से आ रही थी। पुराना खंभा नीचा था और नया ऊँचा है, यानी उसकी रोशनी अब उस कोण से आती है जिस कोण से पहले नहीं आती थी। और उस कोण पर, सड़क के उस पार, सामने वाले घर की ऊपर वाली खिड़की पड़ती है।
हरपाल ने वहाँ देखा। खिड़की खुली थी और उसमें एक औरत खड़ी थी, कान पर फ़ोन लगाए। उसका साया गली पार करके सीधे हरपाल के परदे पर पड़ रहा था।
सड़क पर खड़े-खड़े उसे ठंड लगने लगी और वह वहीं खड़ा रहा। ऊपर खिड़की में वह औरत बात करती रही। आवाज़ नीचे तक नहीं आ रही थी। सिर्फ़ हाथ हिलता दिख रहा था, जैसे फ़ोन पर बात करते हुए लोग हाथ हिलाते हैं, जबकि दूसरी तरफ़ वाले को वह दिखता भी नहीं।
वह औरत रोज़ उसी वक़्त वहाँ खड़ी होती है। उसका लड़का बाहर रहता है और वहाँ का वक़्त अलग है। पूरे घर में सिग्नल सिर्फ़ उसी खिड़की पर आता है। यह बात बाद में हरपाल को उसी मोहल्ले के एक आदमी ने बातों-बातों में बता दी, बिना जाने कि वह क्या बता रहा है।
घर लौटकर उसने दरवाज़े के पीछे से डंडा उठाया और उसे बाहर फेंक आने की सोची। फिर नहीं फेंका। फेंकने पर पत्नी पूछती कि डंडा कहाँ गया।
हरपाल उस औरत से कभी नहीं मिला। खंभे के बारे में भी उसने पालिका में शिकायत नहीं लिखवाई। परदा उसने ज़रूर बदल दिया, मोटा वाला लगवा लिया, और उसके बाद परदे पर कुछ नहीं दिखता।
बाँस का डंडा अब भी दरवाज़े के पीछे खड़ा है। उस पर घर के कपड़े टँगते हैं। बच्चे उसे कपड़े वाला डंडा कहते हैं और उन्हें लगता है कि वह हमेशा से वहीं रहा है। पत्नी को आज तक नहीं मालूम कि वह डंडा घर में आया क्यों था।