नाके पर रजिस्टर सुबह सात बजे खुलता है और रेणु उससे पहले पहुँच जाती थी। उस दिन गाड़ी सवा सात पर आई, सफ़ेद, किराए की, और उसमें तीन लोग थे। परमिट सही था। मुहर सही थी। नीचे लिखा था, वनस्पति सर्वेक्षण, तीन दिन।

रेणु उस बीट पर चार साल से थी। उसके पास एक डंडा था, एक सीटी थी, और एक फ़ोन था जिसमें नाके से आगे सिग्नल नहीं आता। साथ में दो आदमी और जाते थे, दोनों पास के गाँव के। हथियार किसी के पास नहीं होता था। यह बात बाहर से आए लोगों को हमेशा अजीब लगती थी।

उसने तीनों को वही बताया जो हर बार बताती थी। छह बजे तक लौटना है। क्वार में देनवा का नाला शाम को चढ़ जाता है और गाड़ी उस पार नहीं आ पाती। छह के बाद जो इस तरफ़ रह गया, वह सुबह तक इसी तरफ़ रहेगा।

तीनों में से एक ने ज़्यादा बात की। मयंक। उम्र चालीस के आसपास, नए जूते, नया बैग, और गले में कैमरा जो उसने पूरे दिन में सिर्फ़ तीन बार उठाया। बाकी दो चुप रहे और उसके पीछे-पीछे चलते रहे।

शुरू में सब ठीक लगा। वे पगडंडी से चले, रेणु आगे और मयंक उसके पीछे। एक जगह उसने एक पेड़ की तरफ़ इशारा करके पूछा कि यह साल है क्या। रेणु ने कहा, हाँ। मयंक ने कहा, सागौन है। फिर उसने तुरंत जोड़ दिया कि वह तो बस अंदाज़ा लगा रहा था। पेड़ सागौन ही था।

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आधे घंटे बाद रेणु को दूसरी बात दिखी। मयंक हर मोड़ पर पीछे मुड़कर देखता था। यह सब करते हैं, जंगल में रास्ता याद रखने के लिए यही तरीक़ा है। पर वह मुड़कर पगडंडी की तरफ़ नहीं देखता था। वह ऊपर देखता था, पेड़ों के सिरों की तरफ़, जैसे कोई ऐसा निशान ढूँढ़ रहा हो जो दूर से दिख जाए।

वह चार बार नीचे बैठा। हर बार उसने मुट्ठी में मिट्टी उठाई, उसे उँगलियों में मला, और एक छोटी थैली में डाल ली। चारों बार यह उसने ठीक वहीं किया जहाँ पगडंडी मुड़ती थी। पहली बार पर रेणु का ध्यान नहीं गया। चौथी बार पर गया।

दोपहर में रोटी खाते हुए उसने बातचीत में दो सवाल पूछे। पहला, कि रात की गश्त किन दिनों होती है। दूसरा, कि नाके का बैरियर कितने बजे गिरता है। दोनों सवाल उसने ऐसे पूछे जैसे बस बात करने के लिए पूछ रहा हो, और दोनों के बीच में उसने मौसम की बात की।

रेणु ने रोटी का आख़िरी टुकड़ा चबाते हुए हिसाब जोड़ा। मोड़ों पर मिट्टी। पेड़ों के सिरे। गश्त के दिन। बैरियर का समय। यह आदमी जंगल पढ़ने नहीं आया था। यह आदमी रास्ता बना रहा था, और रास्ता ट्रक के लिए बनाया जाता है।

दिन में एक बार उसने अपने साथ आए आदमियों में से एक को मयंक के पास खड़े देखा था। दोनों बात नहीं कर रहे थे। पर वह आदमी ठीक वहीं खड़ा था जहाँ मयंक नीचे बैठा हुआ था, और वह इधर-उधर देख रहा था, इस तरह जैसे देख रहा हो कि कोई देख तो नहीं रहा। उस वक़्त रेणु ने इसका कोई मतलब नहीं निकाला था। अब निकल आया।

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नाका आठ किलोमीटर पीछे था। फ़ोन में सिग्नल नहीं था। साथ में दो आदमी थे, दोनों निहत्थे, और दोनों उसी गाँव के जिसमें मयंक जैसे लोगों के जानने वाले रहते हैं। अगर उसने अभी कुछ कह दिया, तो बात वहीं, उसी जगह, उसी वक़्त तय हो जाती।

रेणु चुप रही। यह उसने डर के मारे नहीं किया। उसने इसलिए किया कि जो चीज़ उस आदमी के पास थी, वह काग़ज़ पर नहीं थी। वह उसके सिर के अंदर थी। और सिर के अंदर रखी चीज़ ज़ब्त नहीं की जा सकती, उसे मिटाना पड़ता है।

साढ़े चार बजे उसने कहा कि अब लौटते हैं। मयंक ने कहा कि अभी तो समय बचा है। रेणु ने आसमान की तरफ़ देखकर कहा कि आज नाला जल्दी चढ़ेगा। यह झूठ नहीं था। यह पूरा सच भी नहीं था।

वह उन्हें उस पगडंडी से नहीं लौटाई जिससे वे आए थे। वह दूसरी तरफ़ से ले गई, जो देनवा के साथ-साथ नीचे उतरती है और फिर घूमकर ऊपर चढ़ती है। इसमें चालीस मिनट ज़्यादा लगते हैं। इस रास्ते में वे चारों मोड़ नहीं आते जिन पर मयंक बैठा था।

एक जगह मयंक रुक गया और उसने चारों तरफ़ देखा। रेणु उसका चेहरा देखती रही। फिर उसने पूछा कि क्या हम इधर से ही आए थे। रेणु ने कहा कि जंगल में सब जगह एक जैसी लगती है, ख़ासकर शाम के वक़्त। मयंक ने सिर हिलाया और आगे चल दिया। बाकी रास्ते उसने फिर ऊपर की तरफ़ नहीं देखा।

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गाड़ी छह बजकर दस मिनट पर नाके के इस पार निकल गई। नाला उस वक़्त घुटने तक आ चुका था। जाते-जाते मयंक ने उतरकर हाथ मिलाया और कहा कि अगले मौसम में वे फिर आएँगे। रेणु ने कहा कि जंगल तो यहीं रहेगा।

गाड़ी चली जाने के बाद वह वापस अंदर गई। टॉर्च साथ थी और तब तक पूरा अँधेरा था। वह सीधे उन्हीं चार मोड़ों पर गई जहाँ दिन में मयंक नीचे बैठा था।

हर मोड़ पर, पगडंडी के किनारे से ज़रा हटकर, ज़मीन में एक खूँटी ठुकी हुई थी। लकड़ी की, छोटी, ऊपर से सपाट, इतनी नीचे गड़ी हुई कि पत्ते हटाए बिना दिखाई न दे। रेणु ने चारों उखाड़ीं और उन्हें अपनी बाँह में इकट्ठा कर लिया। लौटते वक़्त नाला जाँघ तक आ चुका था, और उसने डंडा एक हाथ में और खूँटियाँ दूसरे हाथ में ऊपर उठाकर उसे पार किया।