जून में अजय की किताब में ताले बढ़ जाते थे। मीटर रीडर की किताब में हर घर की एक लाइन होती है: नंबर, पिछली रीडिंग, आज की रीडिंग। जिस घर पर ताला मिले, उसकी लाइन के कोने में वह छोटा सा 'ता' लिख देता था। 'ता' यानी ताला। गर्मी की छुट्टियों में इटावा के मोहल्ले आधे ख़ाली हो जाते हैं। लोग गाँव चले जाते हैं। ननिहाल चले जाते हैं। बच्चों को लेकर महीने भर के लिए निकल जाते हैं। जून की किताब में कभी कभी तीस ताले होते थे।
उसके ज़िम्मे दो सौ चौदह मीटर थे। चार मोहल्ले। वह छह बजे निकलता था, क्योंकि दस बजे के बाद इटावा में सड़क पर खड़े रहना मुश्किल हो जाता है। जेठ की लू में लोहे का मीटर बॉक्स इतना गरम हो जाता है कि उसे कपड़ा लपेटकर खोलना पड़ता है। शाम को वह किताब दफ़्तर में जमा कर देता था। वहाँ से रीडिंग बिल में चढ़ती और किताब आलमारी में चली जाती। यह काम उसने नौ साल किया था और इसमें सोचने को कुछ नहीं था।
पहली बार उसने उसे मई के आख़िरी हफ़्ते में देखा। एक आदमी, साइकिल पर, सफ़ेद शर्ट, गली के मोड़ पर रुका हुआ। अजय ने चार घरों की रीडिंग ली और जब मुड़ा तो वह आदमी उसी मोड़ पर था। अगले दिन वह दूसरी गली में मिला। तीसरे दिन तीसरी में। अजय ने सोचा कि विभाग का कोई जाँच वाला होगा, या किसी की शिकायत होगी, या कोई कुंडी वाला होगा जो उस पर नज़र रखे हुए है। दोपहर तक वह इसे भूल जाता था। रात को याद आ जाता था।
परतें उतरने लगीं
जून के दूसरे हफ़्ते में अजय ने एक बात पर ध्यान दिया। वह आदमी उसके आगे कभी नहीं आया। वह हमेशा पीछे रहता था, दो गली पीछे, और उन्हीं गलियों में घूमता था जिनसे अजय निकल चुका होता। एक सुबह अजय एक मकान की छत पर मीटर देखने चढ़ा और मुँडेर से नीचे नज़र डाली। उसने साफ़ देखा। सफ़ेद शर्ट वाला दो घरों के सामने रुका, दोनों के गेट को हाथ से हिलाया, और आगे बढ़ गया। दोनों घरों पर ताला था। अजय आधे घंटे पहले उन दोनों की लाइन में 'ता' लिखकर आया था।
उसे लगा कि यह उसके बारे में है। दो महीने पहले उसने सीपरी की एक दुकान की कुंडी पकड़ी थी और रिपोर्ट लिख दी थी, और दुकानदार ने भरे बाज़ार में कहा था कि देख लेंगे। अजय थाने गया और यही बताया। दरोगा ने नाम लिखा, चाय पिलाई, और कहा कि गर्मी में लोग बहुत घूमते हैं। चार दिन बाद उसने फिर सफ़ेद शर्ट देखी। इस बार आदमी नया था। साइकिल वही थी।
पहली चोरी जून के तीसरे हफ़्ते में हुई। पुरानी बस्ती में एक बंद घर का पिछला दरवाज़ा तोड़ा गया, लोग ग्वालियर में थे, ख़बर उन्हें दस दिन बाद मिली। दूसरी चोरी उसी महीने, तीन गली आगे। तीसरी जुलाई के पहले हफ़्ते में। तीनों घर बंद थे। अख़बार ने तीनों को अलग अलग छापा, कोने में, दो दो लाइन में। तीसरा घर अजय को याद था। चार दिन पहले उसने उसकी लाइन के कोने में 'ता' लिखा था और नीचे तारीख़ डाली थी।
उसका पीछा नहीं हो रहा था। किताब का पीछा हो रहा था। अजय दफ़्तर गया और अपने जूनियर इंजीनियर को सब बताया, तारीख़ों के साथ, तीनों घरों के मीटर नंबर के साथ। इंजीनियर साहब ने पूरी बात सुनी। फिर उन्होंने पूछा कि तुम्हारे पास इसका सबूत क्या है, और क्या तुम यह कह रहे हो कि विभाग का कोई आदमी इसमें शामिल है। अजय ने कहा कि वह कुछ नहीं कह रहा। इंजीनियर साहब ने किताब उसकी तरफ़ सरका दी और कहा कि अभी किसी से कुछ मत कहो।
उसके बाद चीज़ें छोटी छोटी बदलीं। एक शाम अजय ने देखा कि आलमारी की चाबी बाबू के पास नहीं, मेज़ पर पड़ी है। जुलाई की किताब जमा करने पर उससे कहा गया कि रीडिंग दोबारा लिखकर लाओ, साफ़ अक्षरों में। और एक रात, ग्यारह बजे के बाद, उसकी अपनी गली के नुक्कड़ पर साइकिल खड़ी थी। सवार नहीं था। अजय ने छत से उसे बीस मिनट देखा। साइकिल वहीं खड़ी रही। यह उसके घर की गली थी और यहाँ उसकी किताब का कोई काम नहीं था।
जब वक्त कम पड़ने लगा
जो करना था वह अजय जानता था, और उसे यह भी मालूम था कि इसकी क़ीमत क्या है। किताब में झूठी एंट्री, यही एक चीज़ है जिस पर मीटर रीडर की नौकरी सीधे जाती है। सस्पेंशन नहीं, बर्ख़ास्तगी। उसने किसी और के घर के आगे 'ता' लिखने की बात एक बार सोची और छोड़ दी, क्योंकि उस कमरे में कोई सो रहा होगा। इसलिए उसने अपना घर चुना। पत्नी और बेटी को उसने भिंड भेज दिया, छुट्टियों का बहाना बनाकर, और जाते वक़्त बेटी ने पूछा कि आप क्यों नहीं चल रहे।
शुक्रवार की सुबह उसने अपनी किताब में अपने ही मीटर की लाइन के कोने में 'ता' लिखा। फिर घर लौटकर बाहर से ताला लगाया और पिछले दरवाज़े से अंदर आ गया। पंखा नहीं चलाया। जून की उस रात कमरे में साँस लेना भी काम था। वह अँधेरे में ज़मीन पर बैठा रहा, पीठ दीवार से लगाए, और उसके हाथ में लोहे का वह सब्बल था जिससे वह जाम मीटर बॉक्स का ढक्कन खोलता था। पहली रात कुछ नहीं हुआ। दूसरी रात भी नहीं।
तीसरी रात, दो बजे के आसपास, बाहर ताले में कुछ खटका। कोई जल्दी में नहीं था। ताला खुलने में जितना समय लगा, उतने में अजय की पीठ भीग गई। दरवाज़ा खुला और दो लोग अंदर आए, टॉर्च नहीं, सिर्फ़ मोबाइल की रोशनी। अजय ने चिल्लाना शुरू किया, उतनी ज़ोर से जितना उससे हो सका, और मोहल्ले में यही एक चीज़ काम करती है। दरवाज़े खुलने लगे। एक आदमी भागा। दूसरे के हाथ में लोहे की रॉड थी और भागते हुए उसने उसे घुमाया, और वह अजय की दाहिनी कलाई पर पड़ी। वह गली के मोड़ पर पकड़ा गया। तीन लोगों ने पकड़ा।
पकड़ा गया आदमी दो दिन में बोल गया। सफ़ेद शर्ट वाले सिर्फ़ गेट हिलाकर पक्का करते थे कि घर सचमुच बंद है। नाम और पते कहीं और से आते थे। उपकेंद्र के दफ़्तर का एक बाबू हर शाम जमा हुई किताबों में से 'ता' वाली लाइनें उतार लेता था। सब लिखा हुआ था। नौ साल से अजय वही किताब उसी मेज़ पर रखकर घर जाता था। मुक़दमे में उसकी गवाही हुई और उसने सब सच बोला, अपनी झूठी एंट्री समेत।
विभाग की जाँच जल्दी ख़त्म हुई। उसे चोरी से मतलब नहीं था। उसे किताब से मतलब था, और किताब में अजय के हाथ की एक झूठी एंट्री थी। बर्ख़ास्तगी नहीं हुई, पर राउंड चला गया। अब वह उपकेंद्र के काउंटर पर बैठकर बिलों पर मुहर लगाता है, बाएँ हाथ से, क्योंकि दाहिनी कलाई पूरी तरह मुड़ती नहीं। सामने की खिड़की से रीडिंग की किताबें दिखती हैं, गट्ठर में बँधी हुई। घर के दरवाज़े पर वह ताला अब भी लटका रहता है। बेटी ने एक बार पूछा कि इसे हटाते क्यों नहीं। अजय ने कहा कि कुंडी टूटी हुई है।