हवा दोपहर बाद चली और ऐसी चली कि मैदान के किनारे वाले पीपल के सारे पत्ते एक ही तरफ़ हो गए। बच्चे तब तक आ चुके थे। मैदान गाँव के बीचोंबीच था और शाम का यही एक ठिकाना था, इसलिए कोई मौसम देखकर नहीं आता था। किसी के हाथ में पतंग थी, किसी के हाथ में गुब्बारा, और सबसे छोटी वाली तनु के हाथ में सिर्फ़ एक रस्सी, क्योंकि उसका झूला दादी ने अभी बाँधा नहीं था।

निखिल ने अपनी पतंग हवा में छोड़ी और चरखी से डोर देनी शुरू की। पतंग सीधी ऊपर गई, फिर एक झटके में इतनी दूर चली गई कि डोर उसकी हथेली जलाने लगी। "रोक इसे, रोक!" पीछे से नया ने कहा। निखिल ने चरखी को पेट से दबाया और रोकने की कोशिश की। तभी हवा का दूसरा झोंका आया और नया के हाथ से उसका लाल गुब्बारा छूट गया।

गुब्बारा सीधा ऊपर नहीं गया। वह मैदान के ऊपर तिरछा तैरता हुआ पीपल की तरफ़ बढ़ने लगा। उसके पीछे दो गुब्बारे और उड़े, फिर किसी का काग़ज़ का हवाई जहाज़, और फिर तनु की रस्सी, जो उसकी मुट्ठी से खिंचकर साँप की तरह हवा में लहराने लगी। थोड़ी ही देर में मैदान के ऊपर आधा दर्जन चीज़ें तैर रही थीं। नीचे खड़े बच्चे ऊपर देख रहे थे और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि अब करना क्या है।

पहले तो सबको मज़ा आया। बच्चे उछलकर तालियाँ बजाने लगे और एक-दूसरे को दिखाने लगे कि किसका खिलौना सबसे ऊपर है। फिर हवा और तेज़ हुई और चीज़ें पीपल के ऊपर से निकलकर खेतों की तरफ़ जाने लगीं। तालियाँ बंद हो गईं। तनु ने अपनी ख़ाली मुट्ठी देखी और फिर आसमान की तरफ़ देखा।

गाँव के दादा जी उधर से गुज़रे। उन्होंने ऊपर देखा, फिर बच्चों को देखा, और कहा, "हवा शाम को थम जाएगी।" इतना कहकर वे आगे बढ़ गए, क्योंकि उन्हें कहीं और पहुँचना था। तनु रोने लगी। शाम तक उसकी रस्सी न जाने कहाँ पहुँच चुकी होती।

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मिठास भरी हवा

पहले बच्चों ने उछलकर पकड़ने की कोशिश की, जो बेवकूफ़ी थी और सबको पता था। फिर एक लड़के ने डंडा फेंका। डंडा गुब्बारों से बहुत नीचे रह गया और वापस आकर तनु के पैर के पास गिरा। इसके बाद सबसे लंबे लड़के, बंटी ने पीपल पर चढ़ना शुरू किया। वह तीसरी डाल तक पहुँचा और वहीं रुक गया, क्योंकि आगे की डालें पतली थीं और गुब्बारे पेड़ से भी ऊपर थे। नीचे से नया ने चिल्लाकर कहा कि उतर आओ। बंटी उतर आया और अपनी हथेलियाँ पैंट पर पोंछने लगा। किसी ने उसे कुछ नहीं कहा।

निखिल ने अपनी चरखी की तरफ़ देखा। पतंग अब भी हवा में थी और गुब्बारों से ऊपर थी। उसने डोर ढीली छोड़ी और पतंग को धीरे-धीरे नीचे लाना शुरू किया, ठीक उस जगह जहाँ लाल गुब्बारा तैर रहा था। दो बार पतंग बग़ल से निकल गई। तीसरी बार उसकी डोर गुब्बारे की डोरी से जा उलझी। "खींच!" नया चिल्लाई। निखिल ने खींचा। गुब्बारा पतंग के साथ नीचे आने लगा।

फिर सब बच्चे काम पर लग गए। नया नीचे से बताती रही कि किस तरफ़ खींचना है, क्योंकि ज़मीन से उसे साफ़ दिख रहा था कि कौन सी डोरी कहाँ है और निखिल को नहीं दिख रहा था। तीन बच्चे पीपल के नीचे खड़े हो गए कि जो नीचे आए उसे लपक लें। निखिल पतंग को बार-बार ऊपर भेजता और नीचे लाता रहा, और उसकी हथेली पर डोर की लाल लकीर पड़ गई। बीच में एक बार डोर ढीली पड़ने लगी, तो नया ने चरखी तनु को थमा दी और कहा कि इसे कसकर पकड़े रहे और छोड़े नहीं। तनु ने रोना बंद कर दिया। उसने चरखी को छाती से लगा लिया और दोनों पैर ज़मीन में जमा दिए, जैसे उसे कोई खींच रहा हो। एक-एक करके गुब्बारे उतरे। तनु की रस्सी सबसे आख़िर में मिली, पीपल की एक डाल में फँसी हुई, और उसे उतारने के लिए नया को चढ़ना पड़ा।

आख़िर में एक गुब्बारा बचा। सफ़ेद वाला। वह इतना ऊपर जा चुका था कि पतंग भी उस तक नहीं पहुँच सकती थी। बच्चे मैदान के बीच खड़े होकर उसे जाते हुए देखते रहे, जब तक वह एक सफ़ेद बिंदु न रह गया, और फिर वह भी नहीं दिखा। किसी ने उसे वापस लाने की ज़िद नहीं की।

हवा सचमुच शाम को थम गई, जैसा दादा जी ने कहा था। तब तक सारे खिलौने नीचे आ चुके थे। लौटते वक़्त तनु अपनी रस्सी को दोनों हाथों से पकड़े हुए चल रही थी और बीच-बीच में ऊपर देख लेती थी। निखिल ने पूछा, "क्या देख रही हो?" तनु ने कहा, "वो सफ़ेद वाला कहाँ तक जाएगा?" निखिल ने भी ऊपर देखा। आसमान अब ख़ाली था और उसका रंग बदलने लगा था। "पता नहीं," उसने कहा। "बहुत दूर।" दोनों थोड़ी देर वहीं खड़े रहे, फिर घर की तरफ़ चल दिए।