अमन को दिन से ज़्यादा रात अच्छी लगती थी। खाना खाकर वह सीधे छत पर चढ़ जाता, चटाई बिछाता, और चाँद के निकलने का इंतज़ार करता। माँ नीचे से आवाज़ लगातीं, पर वह तब तक नहीं उतरता जब तक चाँद पीपल की चोटी से ऊपर न आ जाए। गाँव के बाकी बच्चे उसे इस बात पर चिढ़ाते थे। अमन को कोई फ़र्क नहीं पड़ता था।
गाँव के बच्चे उससे पूछते कि चाँद में ऐसा क्या है जो रोज़ देखा जाए। अमन उन्हें समझाने की कोशिश करता कि चाँद रोज़ एक जैसा नहीं होता। कभी पूरा, कभी आधा, कभी सिर्फ़ एक पतली लकीर। बच्चे हँसकर चले जाते। अमन को बुरा लगता, पर छत पर जाना उसने फिर भी नहीं छोड़ा।
एक शाम वह गाँव के तालाब के पास खेलने गया। खेलते-खेलते अँधेरा हो गया। वह किनारे पर खड़ा था कि उसकी नज़र पानी पर पड़ी। चाँद वहाँ भी था। पानी में झलकता हुआ, पूरा का पूरा, हल्का-हल्का हिलता, जैसे किसी ने चाँदी की चादर बिछा दी हो। अमन कुछ देर हिला ही नहीं। आसमान वाला चाँद बहुत दूर था। यह वाला हाथ भर की दूरी पर था।
सब मिलकर जुट गए
'अगर मैं इसे छू लूँ तो?' उसने सोचा। उसने चप्पल किनारे उतारी और पानी में एक क़दम रखा। ठंडा पानी उसकी पिंडली तक आया। उसने हाथ बढ़ाया। जैसे ही उंगलियाँ पानी से लगीं, चाँद टूटकर सौ टुकड़ों में बिखर गया।
अमन घबराकर पीछे हटा। पानी शांत हुआ और चाँद फिर जुड़ गया, पूरा का पूरा। उसने दोबारा कोशिश की। वही हुआ। तीसरी बार में उसका पैर फिसला और वह घुटनों तक पानी में बैठ गया।
'ऐसे नहीं पकड़ में आएगा, बेटा।' अमन ने चौंककर मुड़कर देखा। किनारे पर एक बूढ़ा आदमी खड़ा था, हाथ में लालटेन लिए। वह गाँव के उस तरफ़ रहता था और रोज़ शाम तालाब तक टहलने आता था। अमन शरमाकर पानी से बाहर निकल आया।
'मैं चाँद को छूना चाहता था,' उसने कहा। बूढ़ा हँसा, पर वह मज़ाक उड़ाने वाली हँसी नहीं थी। 'पानी वाला चाँद असली चाँद नहीं है,' उसने कहा। 'वह सिर्फ़ ख़बर है कि असली चाँद ऊपर मौजूद है।' अमन ने ऊपर देखा। चाँद वहीं था, वैसा ही, शांत।
'तो क्या मैं कभी चाँद तक पहुँच पाऊँगा?' बूढ़े ने लालटेन नीचे रख दी। 'जो चीज़ दूर है, उसे देखते रहने से वह पास नहीं आती,' उसने कहा। 'उसकी तरफ़ चलना पड़ता है। और चलने के लिए ज़मीन चाहिए, पानी नहीं।' अमन को उस वक़्त पूरी बात समझ नहीं आई। पर उसने उसे याद रख लिया।
नन्हे कदम, बड़ा हौसला
'आपको यह सब कैसे पता?' अमन ने पूछा। बूढ़े ने जवाब देने में वक़्त लिया। फिर उसने बताया कि जब वह अमन की उम्र का था, तब वह भी इसी तालाब में उतरा था, और उसके पिता ने उसे यहीं से बाहर निकाला था। 'यह तालाब बहुत बच्चों को भिगो चुका है,' उसने कहा और लालटेन उठा ली। 'और सबको वही एक बात सिखाता है।'
वह भीगे कपड़ों में घर लौटा। माँ ने पहले डाँटा, फिर तौलिया दिया, फिर खाना गरम किया। रात को छत पर चढ़ते वक़्त उसने पहली बार चाँद को थोड़ा अलग तरह से देखा। वह अब भी उतना ही सुंदर था। पर अब वह सिर्फ़ देखने की चीज़ नहीं लग रहा था।
उस शाम से अमन थोड़ा-थोड़ा बदलने लगा। वह सुबह जल्दी उठने लगा। जो सवाल उसे समझ नहीं आते थे, उन्हें छोड़ने के बजाय मास्टरजी से पूछने लगा। शाम को छत पर चटाई अब भी बिछती थी, पर उससे पहले उसका सारा काम पूरा हो चुका होता था।
अगली पूर्णिमा को वह फिर तालाब गया। इस बार वह पानी में नहीं उतरा। वह किनारे पर बैठा रहा और देर तक झलक को देखता रहा। हवा चलती तो चाँद बिखर जाता, फिर हवा रुकती तो जुड़ जाता। अमन को यह देखकर हँसी आई। पहले उसे यह टूटना बुरा लगता था। अब वह जानता था कि टूटने वाला चाँद नहीं है, सिर्फ़ पानी है।
बरसों बाद, जब अमन पढ़ने के लिए गाँव से बाहर गया, उसके बैग में एक छोटी सी चीज़ हमेशा साथ रहती थी: तालाब के किनारे का एक चिकना पत्थर। कोई पूछता कि यह किसलिए है, तो उसने सिर्फ़ इतना कहा कि यह उसे याद दिलाता है। पानी में जो दिखता है वह असली नहीं होता, पर उसका मतलब ज़रूर होता है। छुट्टियों में जब भी वह गाँव लौटता, सबसे पहले तालाब के किनारे जाकर बैठता। बूढ़ा आदमी अब वहाँ नहीं आता था। पर लालटेन की जगह अब अमन के हाथ में एक टॉर्च होती थी, और कभी-कभी कोई छोटा बच्चा पानी में उतरता हुआ दिख जाता। ऐसे मौक़ों पर अमन उसे रोकता नहीं था। वह किनारे पर बैठा रहता और उसके भीगकर बाहर आने का इंतज़ार करता, ठीक वैसे ही जैसे किसी ने कभी उसके लिए किया था।