सिमा के घर की छत पर एक टूटी हुई चारपाई पड़ी रहती थी, जिस पर कोई नहीं बैठता था। सिमा उसी पर बैठती थी, रोज़, खाना खाने के बाद। नीचे घर में बातें होती रहतीं, बर्तन बजते रहते, और वह ऊपर चुपचाप चाँद के निकलने का इंतज़ार करती रहती।

चाँद की मीठी बातें उसने कब सुननी शुरू कीं, यह उसे भी याद नहीं था। पहले वह मन ही मन कहती थी। फिर धीरे-धीरे बोलने लगी। 'चंद्रमा भैया, आप इतने शांत कैसे रहते हो?' वह पूछती। और फिर चुप रहकर जवाब सुनती, जो शायद हवा में था, या शायद उसके अपने भीतर।

'मैं अकेला नहीं होता,' चाँद कहता। 'मेरे आसपास पूरे आसमान के तारे होते हैं। लोग मुझे देखते हैं क्योंकि मैं बड़ा हूँ, पर रोशनी हम सब मिलकर देते हैं।' सिमा ऊपर देखती और तारे गिनने की कोशिश करती, और हर बार गिनती भूल जाती।

एक नन्हा सा विचार

एक बात थी जो सिमा को हमेशा से खटकती थी। चाँद हर रात एक जैसा नहीं होता था। कभी पूरा, कभी आधा, और महीने में कुछ रातें ऐसी भी आतीं जब वह दिखता ही नहीं था। उन रातों में सिमा छत पर जाती और खाली आसमान देखकर लौट आती।

एक बार उसने पूछ ही लिया, 'आप उन रातों में कहाँ चले जाते हो?' 'कहीं नहीं,' चाँद ने कहा। 'मैं वहीं रहता हूँ। बस दिखता नहीं।' 'क्यों?' 'क्योंकि मेरे भी दिन होते हैं जब मेरे पास देने को रोशनी नहीं होती। तब मैं छिप जाता हूँ, और फिर लौट आता हूँ।' सिमा को यह बात उस वक़्त पूरी समझ नहीं आई।

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उस साल गाँव में बड़ा उत्सव था। ढोल बजे, रंगोली बनी, और शाम को सब लोग मैदान में इकट्ठा हुए। सिमा की सहेलियाँ नए कपड़ों में आई थीं और नाच में हिस्सा ले रही थीं। सिमा का नाम नाच वाली सूची में नहीं था। किसी ने जान-बूझकर नहीं छोड़ा था, बस लिखते वक़्त रह गया।

वह भीड़ के किनारे खड़ी रही। कोई उसके पास नहीं आया, क्योंकि सब अपने-अपने काम में थे। थोड़ी देर बाद वह चुपचाप वहाँ से निकल गई और छत पर चली गई।

उस रात चाँद आधा था। सिमा चारपाई पर बैठ गई और देर तक कुछ नहीं बोली। फिर उसने कहा, 'आज मन ठीक नहीं है।'

खुशी का पल

'मुझे दिख रहा है,' चाँद ने कहा। 'आज मैं भी आधा हूँ।' सिमा ने ऊपर देखा। 'तो क्या आपको भी बुरा लगता है?' 'लगता है। पर मैं यह नहीं सोचता कि आधा होना हमेशा रहेगा। यह भी एक रात है। कल थोड़ा और दिखूँगा, परसों और थोड़ा।'

सिमा को शब्द नहीं मिले। फिर उसने कहा कि उसे नाच में नहीं लिया गया। चाँद ने पूछा कि क्या उसने किसी से कहा। सिमा ने कहा नहीं। 'तो वे कैसे जानेंगे?' सिमा के पास इसका जवाब नहीं था।

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अगली सुबह उसने अपनी सबसे पुरानी सहेली से बात की। सहेली हैरान रह गई। 'तुम्हारा नाम है ही नहीं?' उसने कहा, और सीधे जाकर मास्टरनी से पूछ आई। शाम तक सिमा का नाम सूची में जुड़ गया। नाच में अब सिर्फ़ दो दिन बचे थे और सिमा को कुछ भी नहीं आता था।

दोनों दिन उसकी सहेलियाँ उसे सिखाती रहीं। मैदान में, स्कूल के पीछे, और आख़िरी शाम सिमा की छत पर। सिमा बार-बार ग़लत क़दम रखती और सब हँस पड़तीं। उत्सव की रात वह भी बाकी लड़कियों के साथ खड़ी थी। उसके क़दम दो बार ग़लत पड़े। किसी ने ध्यान नहीं दिया।

उस रात छत पर लौटकर उसने ऊपर देखा। चाँद पहले से बड़ा था। 'देखा?' उसने कहा। चाँद बोला कुछ नहीं, पर सिमा को लगा कि वह मुस्कुरा रहा है।

कुछ हफ़्ते बाद अमावस की रात आई और आसमान बिलकुल खाली था। सिमा रोज़ की तरह छत पर गई और चारपाई पर बैठ गई। नीचे से माँ ने आवाज़ लगाई कि आज तो चाँद है ही नहीं, ऊपर क्या कर रही हो। सिमा ने कहा कि वह वहीं है, बस दिखता नहीं। माँ चुप रहीं। थोड़ी देर बाद वे भी छत पर आ गईं और सिमा के पास बैठ गईं। दोनों देर तक उस खाली आसमान को देखती रहीं।

उसके बाद सिमा ने एक आदत बना ली। जब भी कोई बच्चा अकेला खड़ा दिखता, वह उसके पास चली जाती और बात शुरू कर देती। कभी-कभी बात नहीं भी बनती, और बच्चा चुप ही रहता। सिमा फिर भी थोड़ी देर पास खड़ी रहती, और फिर चली जाती।

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गाँव के लोग कहने लगे कि सिमा से बात करके अच्छा लगता है। सिमा को इसकी वजह पता थी, पर उसने किसी को नहीं बताई। रात को वह छत पर जाती, चारपाई पर बैठती, और जिस रात चाँद नहीं दिखता, उस रात भी उतनी ही देर बैठती थी।