रात के नौ बजे बिरजू तीसरी बार वही ट्रे बाहर लाया, और तीसरी बार वह वैसी की वैसी थी। रोटी दो, दाल, थोड़ी सब्ज़ी। जितना गया था उतना वापस आया, यहाँ तक कि कटोरी का ढक्कन भी उसी तरफ़ झुका हुआ था।
बिरजू उस नर्सिंग होम में चार महीने से था और यह उसकी पहली नौकरी थी। काम में दिमाग़ नहीं लगाना पड़ता। ट्रॉली खींचो, चादर बदलो, ऑक्सीजन का सिलिंडर लाओ, ट्रे अंदर, ट्रे बाहर। भादों में गलियारे का फ़र्श हमेशा गीला रहता है और चप्पल फिसलती है, यह उसकी सबसे बड़ी शिकायत थी।
आठ नंबर में जो बुज़ुर्ग थे, उन्हें दो दिन पहले लाया गया था। गाँव से। छत से गिरे थे। उनके साथ उनका बेटा नंदकिशोर आया था और नंदकिशोर के अलावा कोई नहीं था, क्योंकि बाक़ी घर देखने के लिए वहीं रुक गए थे।
पहले दिन बिरजू ने उन्हें बोलते हुए सुना था। आवाज़ धीमी थी पर बात साफ़ थी। उन्होंने नंदकिशोर से पूछा था कि भैंस को कौन देख रहा है। नंदकिशोर ने कहा था कि पड़ोस वाले देख रहे हैं। इस पर उन्होंने कहा था कि पड़ोस वाले दाना कम डालते हैं। यही उनकी चिंता थी।
पहले दिन नंदकिशोर को अंदर जाने दिया जाता था। दूसरे दिन शाम से नहीं। उन्हें बताया गया कि अब बाहर से ही देख लीजिए, इन्फ़ेक्शन का ख़तरा है।
बाहर से देखने का मतलब है काँच से देखना, और काँच पर परदा आधा खिंचा रहता है।
नंदकिशोर उस पूरे दिन में सात बार नीचे वाली दुकान पर भेजा गया। हर बार पर्ची, हर बार दवा। बिरजू ने दो बार वे थैलियाँ ख़ुद लेकर अंदर रखी थीं। रखी थीं, लगाई नहीं थीं। वे स्टोर वाली दराज़ में जाती थीं और वहीं रहती थीं।
नंदकिशोर हर बार पर्ची लेकर नीचे भागता और भागते हुए जेब टटोलता। दूसरे दिन उसने बिरजू से पूछा था कि यहाँ पैसे कार्ड से भी लिए जाते हैं क्या। बिरजू ने कहा कि लिए जाते हैं। नंदकिशोर ने कहा कि उसके पास कार्ड नहीं है, वह इसलिए पूछ रहा था कि गाँव से पैसे आने में वक़्त लगता है।
यह कोई अजीब बात नहीं है। दवा लिखवाकर रखवा लेना आम है, क्योंकि रात में ज़रूरत पड़े तो दुकान बंद मिलती है। बिरजू ने चार महीने में यह कई बार देखा था और कभी इस पर रुका नहीं था।
रुका वह मॉनिटर पर। आठ नंबर के मॉनिटर पर तीन आँकड़े थे और बिरजू उन्हें पढ़ना नहीं जानता था। पर वह इतना जानता था कि आँकड़े हिलते हैं। हर मरीज़ के हिलते हैं, थोड़ा ऊपर, थोड़ा नीचे, लगातार।
आठ नंबर के आँकड़े दोपहर से एक जगह खड़े थे।
बिरजू ने ख़ुद को समझाया कि उसे इसका मतलब नहीं पता। यह सही भी था। उसे सचमुच नहीं पता था।
साढ़े नौ बजे नंदकिशोर उसके पास आया और पूछा कि डॉक्टर साहब कब आएँगे। बिरजू ने कहा कि राउंड सुबह है। नंदकिशोर ने कहा कि उसे सुबह तक रुकने को कहा गया है, सुबह बात होगी। फिर उसने यह भी कहा कि कल का पैसा जमा करने के लिए कह दिया गया है, सुबह-सुबह।
बिरजू ने घड़ी देखी। दस बजने में कुछ मिनट थे।
इस नर्सिंग होम में दिन बारह बजे बदलता है। कमरे का किराया, आईसीयू का चार्ज, सब बारह बजे के बाद अगले दिन में गिना जाता है। यह बात उसे किसी ने बताई नहीं थी। यह बात वहाँ काम करने वाले हर आदमी को दूसरे हफ़्ते तक अपने आप मालूम हो जाती है।
अब उसके सामने तीन चीज़ें थीं और तीनों अलग-अलग बेमतलब थीं। लौटी हुई ट्रे। दराज़ में पड़ी दवाइयाँ। एक जगह खड़े आँकड़े। तीनों को साथ रखने पर जो बनता था, वह उसने बनाया, और फिर उसे मिटाने की कोशिश की, और वह मिटा नहीं।
वह बीस साल का था और घर पर उसकी तनख़्वाह चलती थी। वह किसी पर इल्ज़ाम नहीं लगा सकता था। वह गलत भी हो सकता था, और गलत होने की सज़ा भी उसी को मिलती।
पौने ग्यारह बजे वह नंदकिशोर के पास गया। उसने कोई इल्ज़ाम नहीं लगाया। उसने सिर्फ़ इतना कहा कि आप अभी अंदर जाकर उन्हें देख लीजिए। अभी।
नंदकिशोर ने कहा कि मना किया गया है। बिरजू ने कहा कि आप बेटे हैं, आप देख सकते हैं, और आप कहिए कि देखकर ही हटेंगे। इतना कहकर वह ट्रॉली लेकर दूसरी तरफ़ चला गया, क्योंकि उसे वहाँ खड़ा नहीं रहना था।
नंदकिशोर पंद्रह मिनट तक काउंटर पर खड़ा रहा और फिर वह अंदर चला गया। उसे रोकने के लिए जो कहा गया, उससे वह रुका नहीं।
अंदर जो हुआ वह बिरजू ने नहीं देखा। उसने सिर्फ़ आवाज़ सुनी, और फिर आवाज़ें, और फिर काफ़ी देर तक कुछ नहीं।
रात दो बजे के बाद उन्हें ले जाया गया। बिल में से एक दिन कम कर दिया गया, बिना किसी बहस के, और उसे कम करने की कोई वजह काग़ज़ पर नहीं लिखी गई। बिरजू से पूछने की ज़रूरत किसी ने नहीं समझी। किसी को यह ख़याल ही नहीं आया कि वहाँ पूछने लायक़ कोई है।
स्टोर वाली दराज़ अगले हफ़्ते फिर भर गई। दूसरे मरीज़ की दवाइयों से, जो नीचे वाली दुकान से मँगवाई गई थीं और जो लगाई नहीं गईं। बिरजू ने ही उन्हें वहाँ रखा, क्योंकि रखना उसी का काम है। वह उस दराज़ को अब खोलते हुए देखता ज़रूर है, हर बार।