मनी की शरारतों की गिनती जंगल में कोई नहीं रखता था। बस इतना सब जानते थे कि जिस पेड़ के नीचे वह बैठा हो, वहाँ से फल गिनकर उठाने पड़ते हैं। वह किसी को नुकसान पहुँचाने के इरादे से कुछ नहीं करता था; उसे लगता था कि हँसी-मज़ाक ही उसकी पहचान है। जंगल के बाकी जानवर इस पहचान से तंग आ चुके थे। पर कहता कोई कुछ नहीं था। मनी तेज़ था, फुर्तीला था, और सबसे ऊँची डाल तक पहुँच सकता था।

शरारतें ज़्यादातर एक ही तरह की थीं। किसी की रखी हुई चीज़ उठाकर दूसरी डाल पर रख देना। पानी पीते हुए किसी के ऊपर से टहनी गिरा देना। सोते हुए साही के काँटों में पत्ते फँसा देना, जो घंटों निकलते रहते।

जंगल इन सबका आदी हो चुका था। नुक़सान बड़ा नहीं होता था, इसलिए कोई पंचायत तक बात नहीं ले जाता था। बस इतना होता था कि जिस तरफ़ मनी दिखता, उस तरफ़ लोग अपना सामान समेट लेते।

एक बात किसी ने नहीं सोची। ऐसी शरारतें करने के लिए यह जानना पड़ता है कि किसका सामान कहाँ है, कौन कब पानी पीने आता है, कौन किस पेड़ के नीचे सोता है, और किस डाल पर हाथ नहीं पहुँचता।

मनी यह सब जानता था। रोज़ जानता था। पूरे जंगल का चक्कर उसे सुबह-सुबह लगाना पड़ता था, वरना दिन भर करने को कुछ रहता नहीं।

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उस बरस जामुन कम आए।

जामुन का बड़ा झुंड नाले के इस पार था और उसी पर आधे जंगल की उम्मीद रहती है। पिछले बरस उसके नीचे ज़मीन दिखती नहीं थी। इस बरस ज़मीन साफ़ थी और ऊपर टहनियों में गिने-चुने गुच्छे लटके थे।

पहला नाम जो लिया गया वह मनी का था। यह अपने आप हुआ, बिना किसी सोच के। जिसने भी सुना उसने यही कहा कि और कौन।

पानी पर एक सांभर ने सामने से कह दिया। उसने कहा कि जो रोज़ सुबह पूरे जंगल का चक्कर लगाता है, वही जानता होगा कि जामुन कहाँ गए। बाक़ी जितने खड़े थे, किसी ने उसे रोका नहीं।

मनी ने पहले हँसी में उड़ाना चाहा। इससे बात और बिगड़ी, क्योंकि जो आदमी हर बात हँसी में उड़ाता है, उसकी बात भी हँसी में उड़ा दी जाती है। उसने कहा कि उसने नहीं लिए। इस पर कोई बोला ही नहीं। सब अपने-अपने रास्ते चले गए। यह चुप्पी इनकार से भारी थी।

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मनी के पास एक आसान रास्ता था और वह उसे साफ़ दिख रहा था। दो-तीन नाम वह उसी वक़्त ले सकता था, क्योंकि उसने उन्हें अपनी आँख से देखा था। एक लंगूर, जो दो बार ऊपर से गुच्छे तोड़कर ले गया था। और गीदड़ों का एक जोड़ा, जो गिरे हुए जामुन बटोरता था।

नाम ले देता तो शक उसी शाम उन पर चला जाता। पर उसे यह भी मालूम था कि वे तीनों मिलकर भी उतने जामुन नहीं ले जा सकते थे जितने कम थे। उतना फ़र्क़ चार जानवरों का नहीं होता। वह झूठ चलता, पर टिकता नहीं।

तो वह चुप रहा और तीन दिन तक नाले के उस पार नहीं गया। तीन दिन में उसने एक भी शरारत नहीं की, और यह बात किसी ने नोट नहीं की।

चौथे दिन वह सुबह-सुबह झुंड में गया और टहनियों को क़रीब से देखा। जो देखना था वह वहीं था और शुरू से वहीं था।

जामुन में पहले फूल आता है, फिर फल बनता है। उस बरस फूल आने के दिनों में दो दिन तेज़ पानी बरसा था, बेमौसम, और बरसकर चला गया था। फूल टहनी पर टिकते नहीं। पानी उन्हें धो ले जाता है, और जो धुल गया उससे फल नहीं बनता।

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टहनियों पर अब भी फूलों की सूखी डंठलें लगी थीं, क़तार से, ख़ाली। जितनी डंठलें थीं, उतने जामुन आने चाहिए थे।

मनी ने सबको बुलाया। बुलाने पर कोई नहीं आता, इसलिए वह ख़ुद एक-एक के पास गया और यही कहता रहा कि एक बार चलकर देख लो। हाथी सबसे बाद में आया और सबसे पहले उसने ही डंठल देखी।

फिर मनी उन्हें ऊँची वाली मेड़ पर ले गया, जहाँ दो जामुन के पेड़ अकेले खड़े हैं। वे झुंड से पहले फूलते हैं, हर साल। उन दोनों में फल भरा हुआ था, इतना कि डालें झुकी थीं।

किसी ने पूछा कि तुम्हें बारिश का दिन इतना ठीक-ठीक कैसे याद है। मनी ने बता दिया। उसी दिन उसने नीलगाय की पीठ पर बैठकर उसे नाले तक दौड़ाया था, और भीगते हुए दौड़ाया था, और उसी बात पर पूरा दिन उसके पीछे शोर मचा था। तारीख़ याद रखने का उसका यही तरीक़ा है।

माफ़ी किसी ने नहीं माँगी। सांभर ने भी नहीं। जंगल में यह होता भी नहीं है।

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पर उस बरस के बाद जंगल मनी से थोड़ा सहमकर रहने लगा, और वजह शरारतें नहीं थीं। वजह यह थी कि अब सबको मालूम हो चुका था कि वह रोज़ सुबह सब कुछ देखता है, और देखी हुई बात उसे याद भी रहती है। शरारती से डर नहीं लगता। याद रखने वाले से लगता है।

अगले बरस जंगल में फलों की कमी हुई, तो बँटवारे का हिसाब रखने का काम मनी को सौंपा गया। किसी ने विरोध नहीं किया। मनी हर सुबह पेड़ों का चक्कर लगाता, गिनती करता, और शाम को सबके सामने हिसाब रखता। जिस पक्षी के बच्चे छोटे थे, उसे थोड़ा ज़्यादा मिलता; जो अकेला था, उसे कम। किसी ने शिकायत नहीं की, क्योंकि हिसाब सबके सामने होता था। और हर शाम, सबसे आख़िर में, मनी अपने लिए उठाता। जितना बचा, उतना।