दादा की अलमारी उनके जाने के बाद छह महीने तक बंद पड़ी रही। खोलने पर उसमें वही सब निकला जो ऐसी अलमारियों में निकलता है। दवा की पर्चियाँ। एक टूटा चश्मा। एक ख़ाली डिबिया। चिट्ठियाँ, जिनमें से आधी कभी भेजी नहीं गईं। सबसे नीचे, अख़बार में लपेटा हुआ, एक नक़्शा था। कागज़ मोटा था और किनारों से भूरा पड़ चुका था, और उस पर बीच में समुद्र बना था, और समुद्र के बीच एक द्वीप, जिसका कोई नाम नहीं लिखा था।

जैकी ने वह नक़्शा दो लोगों को दिखाया। सरिता उसके साथ पढ़ी थी और मंगेश उसके साथ काम करता था। तीनों ने उसे तीन शामें देखा। तीसरी शाम सरिता ने पूछा कि नाव कहाँ से आएगी, और असल सवाल यही था। नाव तेरह हज़ार में मिली, जिसमें आठ जैकी के थे, और वह पैसा उसने दादा की ही जमा-पूँजी में से निकाला। निकलने से पहले तीनों ने घर पर यह नहीं बताया कि वे किधर जा रहे हैं।

वे मंगल की सुबह निकले। नाव पुरानी थी। इंजन बीच-बीच में बैठ जाता था। इसलिए साथ में चप्पू भी रखे गए। सरिता ने खाने का सामान गिनकर रखा, नौ दिन का, जबकि जाना चार दिन का था। मंगेश ने पूछा कि इतना क्यों रख रही हो। सरिता ने कहा कि जाने का हिसाब अलग होता है और लौटने का अलग।

सफ़र के तीसरे दिन तूफ़ान आया। लहरें नाव से ऊँची थीं। जैकी पतवार पर था, सरिता पानी उलीचती रही, और मंगेश ने सामान को रस्सी से बाँधकर बीच में दबा दिया। रात कब हुई, किसी को पता नहीं चला। सुबह हवा बैठ गई और सामने ज़मीन दिख रही थी। वह वही द्वीप था। किनारे पर उतरकर तीनों बहुत देर रेत पर बैठे रहे। द्वीप जंगल से भरा था और कहीं कोई आदमी नहीं दिखता था। नक़्शा यहीं तक का था। आगे का रास्ता उन्हें ख़ुद खोजना था।

तीनों ने जंगल में खोजबीन शुरू की। पहले कुछ किलोमीटर आसान थे। फिर जंगल घना होता गया और रास्ता ख़त्म हो गया। दोपहर में मंगेश के पैर के पास से एक साँप निकला और तीनों बहुत देर तक हिले नहीं। शाम होने से पहले उन्हें छाँव में एक पुराना मंदिर दिखा। दरवाज़ा बंद था। उस पर एक पत्थर जड़ा हुआ था जिस पर कुछ लिखा था, और लिखावट किसी पहेली जैसी थी। सरिता उसके सामने बैठ गई।

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हिमालय की ऊँचाइयों में खजाने की खोज

सरिता उस पहेली पर दो घंटे बैठी रही। फिर उसने कहा कि यह पहेली नहीं है, गिनती है। पत्थर पर बने निशान तीन समूहों में थे, और तीनों समूह बराबर नहीं थे। उसने दरवाज़े के तीन कुंडों पर उसी क्रम में हाथ रखवाए, एक जैकी से, एक मंगेश से, और एक अपना। दरवाज़ा खुल गया। भीतर कमरा छोटा था और उसमें बोसरिताँ रखी थीं, सोने और चाँदी की। तीनों कुछ देर दरवाज़े पर ही खड़े रहे। किसी ने पहला क़दम नहीं रखा। फिर मंगेश भीतर गया और एक बोरी खोलकर देखी।

वे तीन दिन तक बोसरिताँ नाव तक ढोते रहे। सब कुछ नहीं ले जा सके, क्योंकि नाव उतनी बड़ी नहीं थी, इसलिए जो सबसे भारी था वही छोड़ना पड़ा। लौटते वक़्त समुद्र शांत था और तीनों ज़्यादातर चुप रहे। सरिता ने बीच में एक बार पूछा कि इसका करेंगे क्या। किसी के पास जवाब नहीं था। जैकी ने कहा कि गाँव पहुँचकर सोचेंगे। बाक़ी रास्ता उन्होंने इसी सवाल के साथ काटा।

गाँव लौटकर तीनों ने खजाना बाँटा नहीं, उसका हिसाब बनाया। सरिता ने कागज़ पर लिखा कि क्या क्या हो सकता है। सूची लंबी थी और पैसा उतना नहीं था। आख़िर में उन्होंने एक ही चीज़ चुनी। गाँव में स्कूल की इमारत नहीं थी, बच्चे बरगद के नीचे बैठते थे, और बारिश में छुट्टी हो जाती थी। तीनों ने ज़मीन ख़रीदी, ईंट और चूना ख़रीदा, और दो कमरे बनवाए। छत पक्की डलवाई, हालाँकि उसी में सबसे ज़्यादा पैसा लगा और मंगेश इसके ख़िलाफ़ था। जैकी ने कहा कि छत ही असल चीज़ है। बाक़ी सब बाद में हो जाएगा।

तीन साल में गाँव को इसकी आदत पड़ गई। स्कूल में अब दो मास्टर आते थे, एक सरकार का और एक जिसकी तनख़्वाह तीनों देते थे। खजाने का पैसा घटता जा रहा था। सरिता ने एक कॉपी में हिसाब रखा हुआ था और वह जानती थी कि यह और कितने बरस चलेगा। लोग उन्हें रास्ते में रोककर धन्यवाद देते, और तीनों को यह अजीब लगता। उन्होंने कोई बड़ा काम किया हो, ऐसा उन्हें लगता नहीं था। उन्होंने बस दो कमरे बनवाए थे।

चौथे बरस सावन में नदी चढ़ गई। पानी रात में आया, जैसे हमेशा आता है, और सुबह तक निचली बस्ती के घरों में कमर तक भर चुका था। लोग जो सामान उठा सकते थे उठाकर ऊँची जगह की तरफ़ भागे। गाँव में सबसे ऊँची और सबसे पक्की जगह वही दो कमरे थे। उस रात स्कूल में इकसठ लोग थे, और सात बकसरिताँ, और किसी ने किसी से जगह के लिए नहीं कहा। पानी तीन दिन में उतरा। तीनों ने बचा हुआ पैसा उन्हीं तीन दिनों में ख़र्च कर दिया। तिरपाल, दवा, और चूल्हे का सामान। उसके बाद कॉपी में लिखने को कुछ नहीं बचा और सरिता ने उसे बंद करके रख दिया। सितंबर में स्कूल फिर खुला। दीवारों पर कमर तक की ऊँचाई पर एक भूरी लकीर रह गई थी, और वह कई साल तक नहीं गई।