जैकी नामक एक युवा साहसी लड़का अपने दोस्तों के साथ एक नई साहसिक यात्रा पर निकलने का सपना देखता था। जैकी का दिल हमेशा रोमांचक यात्राओं के लिए धड़कता था। एक दिन उसे एक पुराने खजाने के बारे में एक रहस्यमयी मानचित्र मिला, जिसे उसने अपने दादा की अलमारी में छुपा हुआ पाया। मानचित्र पर एक द्वीप की तस्वीर थी, जो बहुत दूर समुद्र के बीचों-बीच स्थित था। यह द्वीप रहस्यों से भरा हुआ था और मानचित्र पर दी गई जानकारी के अनुसार, वह खजाना किसी के लिए जीवन बदल सकता था।
जैकी ने अपने दो सबसे अच्छे दोस्तों, रिया और समीर को इस बारे में बताया। तीनों को यह खजाना मिलने की उम्मीद थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चिंता भी थी, क्योंकि मानचित्र का रहस्य इतना साधारण नहीं था। उन्होंने मिलकर तय किया कि वे इस साहसिक यात्रा पर निकलेंगे। सभी ने अपनी यात्रा की तैयारी की, नावें किराए पर लीं, और अपने साथ आवश्यक सामान लिया। यह सफर खतरनाक था, लेकिन तीनों को यकीन था कि वे इस चुनौती को पार कर सकते हैं और कुछ महान हासिल कर सकते थे।
सफ़र के तीसरे दिन तूफ़ान आया। लहरें नाव से ऊँची थीं। जैकी पतवार पर था, रिया पानी उलीचती रही, और समीर ने सामान को रस्सी से बाँधकर बीच में दबा दिया। रात कब हुई, किसी को पता नहीं चला। सुबह हवा बैठ गई और सामने ज़मीन दिख रही थी। वह वही द्वीप था। किनारे पर उतरकर तीनों बहुत देर रेत पर बैठे रहे। द्वीप जंगल से भरा था और कहीं कोई आदमी नहीं दिखता था। नक़्शा यहीं तक का था। आगे का रास्ता उन्हें ख़ुद खोजना था।
खतरों से भरा कदम
तीनों ने जंगल में खोजबीन शुरू की। पहले कुछ किलोमीटर आसान थे। फिर जंगल घना होता गया और रास्ता ख़त्म हो गया। दोपहर में समीर के पैर के पास से एक साँप निकला और तीनों बहुत देर तक हिले नहीं। शाम होने से पहले उन्हें छाँव में एक पुराना मंदिर दिखा। दरवाज़ा बंद था। उस पर एक पत्थर जड़ा हुआ था जिस पर कुछ लिखा था, और लिखावट किसी पहेली जैसी थी। रिया उसके सामने बैठ गई।
रिया उस पहेली पर दो घंटे बैठी रही। फिर उसने कहा कि यह पहेली नहीं है, गिनती है। पत्थर पर बने निशान तीन समूहों में थे, और तीनों समूह बराबर नहीं थे। उसने दरवाज़े के तीन कुंडों पर उसी क्रम में हाथ रखवाए, एक जैकी से, एक समीर से, और एक अपना। दरवाज़ा खुल गया। भीतर कमरा छोटा था और उसमें बोरियाँ रखी थीं, सोने और चाँदी की। तीनों कुछ देर दरवाज़े पर ही खड़े रहे। किसी ने पहला क़दम नहीं रखा। फिर समीर भीतर गया और एक बोरी खोलकर देखी।
वे तीन दिन तक बोरियाँ नाव तक ढोते रहे। सब कुछ नहीं ले जा सके, क्योंकि नाव उतनी बड़ी नहीं थी, इसलिए जो सबसे भारी था वही छोड़ना पड़ा। लौटते वक़्त समुद्र शांत था और तीनों ज़्यादातर चुप रहे। रिया ने बीच में एक बार पूछा कि इसका करेंगे क्या। किसी के पास जवाब नहीं था। जैकी ने कहा कि गाँव पहुँचकर सोचेंगे। बाक़ी रास्ता उन्होंने इसी सवाल के साथ काटा।
गाँव लौटकर तीनों ने खजाना बाँटा नहीं, उसका हिसाब बनाया। रिया ने कागज़ पर लिखा कि क्या क्या हो सकता है। सूची लंबी थी और पैसा उतना नहीं था। आख़िर में उन्होंने एक ही चीज़ चुनी। गाँव में स्कूल की इमारत नहीं थी, बच्चे बरगद के नीचे बैठते थे, और बारिश में छुट्टी हो जाती थी। तीनों ने ज़मीन ख़रीदी, ईंट और चूना ख़रीदा, और दो कमरे बनवाए। छत पक्की डलवाई, हालाँकि उसी में सबसे ज़्यादा पैसा लगा और समीर इसके ख़िलाफ़ था। जैकी ने कहा कि छत ही असल चीज़ है। बाक़ी सब बाद में हो जाएगा।
तीन साल में गाँव को इसकी आदत पड़ गई। स्कूल में अब दो मास्टर आते थे, एक सरकार का और एक जिसकी तनख़्वाह तीनों देते थे। खजाने का पैसा घटता जा रहा था। रिया ने एक कॉपी में हिसाब रखा हुआ था और वह जानती थी कि यह और कितने बरस चलेगा। लोग उन्हें रास्ते में रोककर धन्यवाद देते, और तीनों को यह अजीब लगता। उन्होंने कोई बड़ा काम किया हो, ऐसा उन्हें लगता नहीं था। उन्होंने बस दो कमरे बनवाए थे।
रात खुले में
चौथे बरस सावन में नदी चढ़ गई। पानी रात में आया, जैसे हमेशा आता है, और सुबह तक निचली बस्ती के घरों में कमर तक भर चुका था। लोग जो सामान उठा सकते थे उठाकर ऊँची जगह की तरफ़ भागे। गाँव में सबसे ऊँची और सबसे पक्की जगह वही दो कमरे थे। उस रात स्कूल में इकसठ लोग थे, और सात बकरियाँ, और किसी ने किसी से जगह के लिए नहीं कहा। पानी तीन दिन में उतरा। तीनों ने बचा हुआ पैसा उन्हीं तीन दिनों में ख़र्च कर दिया। तिरपाल, दवा, और चूल्हे का सामान। उसके बाद कॉपी में लिखने को कुछ नहीं बचा और रिया ने उसे बंद करके रख दिया। सितंबर में स्कूल फिर खुला। दीवारों पर कमर तक की ऊँचाई पर एक भूरी लकीर रह गई थी, और वह कई साल तक नहीं गई।